बिहार के छपरा जिले के मांझी प्रखंड में इन दिनों करेले की खेती चर्चा में है। यहां के खेतों में उगने वाला करेला आकार में बड़ा और स्वाद में इतना अच्छा होता है कि गोपालगंज, सीवान, छपरा शहर और उत्तर प्रदेश तक के व्यापारी सीधे किसानों के खेत तक पहुंच जाते हैं। इलाके में हजारों किसान परिवार सालों से हरी सब्जियों की खेती से अपनी आजीविका चला रहे हैं, और करेला इनमें सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों में गिना जाता है।
खेती का तरीका ऐसा जो मुनाफा बढ़ा दे
इस इलाके में जैविक तरीके से बड़े पैमाने पर हरी सब्जियों की खेती होती है और खेतों में दूर-दूर तक करेले की बेलें फैली नजर आती हैं। यहां के लगभग 90 प्रतिशत किसान परंपरागत तरीके की बजाय मचान विधि अपनाते हैं, यानी लता वाली सब्जियों को जमीन पर रेंगने देने के बजाय ऊंचे ढांचे पर चढ़ाया जाता है। इसके पीछे वजह साफ है, बरसात के मौसम में मिट्टी में कीड़े ज्यादा पनपते हैं और अगर करेला मिट्टी के सीधे संपर्क में रहे तो फल खराब होने का खतरा बढ़ जाता है। मचान पर बेल चढ़ाने से फल ऊंचाई पर लटका रहता है, जिससे वह पूरी तरह सुरक्षित रहता है और बारिश का पानी लगने से गलने का डर भी खत्म हो जाता है। पौधे की सिर्फ जड़ मिट्टी में रहती है, जहां मिट्टी चढ़ाकर हल्की ऊंचाई बना दी जाती है। यही वजह है कि किसान इस तरीके को प्राथमिकता देते हैं।
नंदिता वैरायटी और भरुवा का जायका
इलाके के किसान मुख्य रूप से नंदिता वैरायटी के करेले की खेती करते हैं, जिसका फलन बंपर होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस करेले से बना भरुवा यानी भरवां करेला खाने में बेहद स्वादिष्ट लगता है। सालों के अनुभव की वजह से यहां के किसानों को यह भी पता है कि सब्जी को तोड़ने और रखने का सही तरीका क्या हो, जिससे उनकी उपज लंबे समय तक ताजा और खराब हुए बिना टिकी रहती है। इसी वजह से बाजार में इस करेले की मांग हमेशा बनी रहती है और व्यापारी दूर से आकर भी अच्छी कीमत देने को तैयार रहते हैं।
किसान महंत यादव का अनुभव
गांव के किसान महंत यादव ने बताया कि उन्होंने आठ कट्ठा खेत में नंदिता वैरायटी का करेला लगाया है और अब इसका फलन शुरू हो चुका है। उन्होंने बताया, "पिछले 15 वर्षों से मैं करेला की खेती कर रहा हूं." फलन शुरू होने के बाद रोज तोड़कर बेचना जरूरी हो जाता है, क्योंकि एक बार तैयार फल को खेत में ज्यादा देर छोड़ना नुकसानदेह होता है। महंत यादव के मुताबिक हर दिन 80 किलो से लेकर 1 क्विंटल से ज्यादा तक करेला तोड़ा और बेचा जाता है, और यह सिलसिला लगातार 2 से 3 महीने तक चलता है। इतने लंबे समय तक रोजाना उपज मिलने से किसानों को नियमित आमदनी होती रहती है।
बीमारी का खतरा और नजदीकी बाजार में बिक्री
महंत यादव ने यह भी बताया कि करेले की फसल पर लगातार निगरानी जरूरी है, क्योंकि इसमें कई तरह की बीमारियां लग जाती हैं। अगर सही समय पर दवा का छिड़काव और बीमारी का इलाज न किया जाए तो फसल बहुत जल्दी खराब हो सकती है, जिससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। इसी वजह से खेती के दौरान सतर्कता बरतना सबसे जरूरी माना जाता है। उपज तैयार होने के बाद महंत यादव इसे पास के बाजार में ही बेच देते हैं, जहां दूर-दूर से व्यापारी खरीदने के लिए पहुंचते हैं। उनका कहना है कि अगर नंदिता वैरायटी की खेती मचान विधि से की जाए, तो फलन बेहद जबरदस्त होता है, जो इसे मुनाफे का सौदा बना देता है।




















