उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में कृषि क्षेत्र के भीतर एक नया और लाभदायक बदलाव देखने को मिल रहा है। यहां के किसान अब केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित न रहकर सब्जियों की खेती पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। जिले के मोहम्मदी तहसील क्षेत्र सहित कई इलाकों में किसान लौकी की खेती को एक प्रमुख नकदी फसल के रूप में अपना रहे हैं। लौकी की फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बोआई के बाद बहुत ही कम समय में उत्पादन देना शुरू कर देती है। बाजार में लगातार बनी रहने वाली मांग और त्वरित पैदावार के कारण यह खेती किसानों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है।
मचान तकनीक से पैदावार और गुणवत्ता में सुधार
लौकी की खेती में बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए किसान मचान विधि का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। पारंपरिक तरीके में लौकी की बेलें जमीन पर फैली रहती हैं, जिससे फल खराब होने का खतरा बना रहता है। इसके विपरीत मचान विधि में लकड़ी, बांस और तारों के सहारे एक मजबूत ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके ऊपर बेलों को फैलाया जाता है। इस तकनीक से बेलों को पनपने के लिए पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है। इसके अलावा मचान पर लटके फलों की तुड़ाई करना काफी आसान हो जाता है और जमीन से सड़न या कीड़ों का जोखिम भी समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि मचान तकनीक अपनाने वाले किसानों की उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्नत किस्मों का चयन और शोध संस्थानों का योगदान
खेती से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए क्षेत्र और मौसम के अनुकूल सही किस्मों का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। लखीमपुर के किसान काशी बहार, काशी कुंडल, नरेंद्र रश्मि और माधुरी जैसी उच्च पैदावार देने वाली किस्मों का उपयोग कर रहे हैं। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित काशी शुभरा जैसी उन्नत किस्म भी किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है। वैज्ञानिक रूप से तैयार की गई ये किस्में न केवल रोगों के प्रति प्रतिरोधी होती हैं, बल्कि प्रति एकड़ अधिक उत्पादन भी प्रदान करती हैं।
बाजार की मांग और कमाई के आंकड़े
भारतीय रसोई में लौकी का नियमित उपयोग होता है। सब्जी के अलावा लौकी का इस्तेमाल रायता, कोफ्ता और हलवा जैसे विभिन्न व्यंजन बनाने में किया जाता है, जिससे स्थानीय बाजारों में इसकी मांग साल भर बनी रहती है। किसान अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग दिनों में तुड़ाई करके फसल को किस्तों में बाजार भेजते हैं, जिससे उन्हें लगातार नकद आमदनी मिलती रहती है।
लौकी की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे किसान रविल खान लगभग 25 बीघा क्षेत्रफल में इसकी फसल उगा रहे हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में थोक बाजार में लौकी की कीमत लगभग 8 से 10 रुपये प्रति किलो चल रही है। वहीं फुटकर बाजार में यही लौकी 20 से 30 रुपये प्रति किलो के भाव पर बिक रही है। सही समय पर तुड़ाई और बाजार में मिलने वाले बेहतर दाम की बदौलत किसान कम लागत में भी शानदार मुनाफा अर्जित कर रहे हैं।



















