मानसून का मौसम धान और खरीफ की अन्य फसलों के लिए भले ही जीवनदान साबित होता हो, लेकिन केले के बागवानों के लिए यह साल का सबसे चुनौतीपूर्ण समय होता है। मूसलाधार बारिश और खेतों में पानी भर जाने से कई तरह की बीमारियां और कीट पनपने लगते हैं, जिससे किसानों की मेहनत पर पानी फिरने का खतरा पैदा हो जाता है। इस दौरान पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, तने कमजोर होने लगते हैं और जड़ें सड़ने की समस्या भी सामने आने लगती है।
सिगाटोका रोग और उसकी पहचान
रायबरेली जिले के राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के कृषि रक्षा विशेषज्ञ ऋषि कुमार चौरसिया के अनुसार, बरसात के दिनों में केले के पौधों पर सिगाटोका या लीफ स्पॉट बीमारी का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है। इस रोग की शुरुआत में पत्तियों पर बहुत छोटे-छोटे पीले या फिर भूरे रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। वक्त के साथ ये धब्बे तेजी से फैलकर पूरी पत्ती को सुखा देते हैं। जब बीमारी गंभीर रूप ले लेती है, तो पौधे की प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर फलों के आकार और विकास पर पड़ता है। ऐसे में किसान भाइयों को सलाह दी जाती है कि वे तुरंत संक्रमित पत्तियों को काटकर खेत से बाहर ले जाकर नष्ट कर दें और शुरुआती लक्षण दिखते ही किसी अच्छे फफूंदनाशी का छिड़काव करें।
तना छेदक कीट से बचाव के उपाय
बरसात के इस मौसम में तने में छेद करने वाले कीट भी केले की फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इन कीटों के लार्वा तने के भीतर घुसकर सुरंग बना लेते हैं और पौधे को अंदर से कमजोर कर देते हैं। इस कीट के हमले का पता लगाने के लिए तने पर बने छोटे-छोटे छिद्रों, वहां से रिसने वाले रस या काले रंग के चिपचिपे पदार्थ और पौधे के अचानक मुरझाने के लक्षणों पर बारीक नजर रखनी चाहिए। अगर संक्रमण बहुत ज्यादा फैल जाए, तो कमजोर होकर पौधा नीचे गिर भी जाता है।
खेत की सफाई और जल निकासी का महत्व
इस खतरनाक कीट और अन्य बीमारियों से निपटने के लिए खेत की साफ-सफाई सबसे पहला कदम है। खेतों में कभी भी सूखी पत्तियां या सड़े-गले पौधों के अवशेष जमा न होने दें। जिन पौधों पर कीटों का ज्यादा प्रकोप दिख रहा है, उन्हें तुरंत उखाड़कर सुरक्षित तरीके से ठिकाने लगाएं। वयस्क कीटों पर नजर रखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए तने के टुकड़ों से बने ट्रैप का इस्तेमाल करना भी काफी फायदेमंद साबित होता है। इसके अलावा, बारिश के दौरान सबसे जरूरी काम खेत में पानी को बिल्कुल रुकने न देना है। लगातार जलभराव रहने से जड़ें सड़ने लगती हैं और फ्यूजेरियम विल्ट जैसी घातक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए खेत के चारों ओर नादियां बनाकर अतिरिक्त पानी को तुरंत बाहर निकालना चाहिए और खरपतवारों का सफाया करते रहना चाहिए.



















