देश में डिजिटल भुगतान के सबसे बड़े माध्यम यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई से जुड़े शुल्क ढांचे में एक अहम बदलाव लागू होने जा रहा है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने व्यापारियों को किए जाने वाले चुनिंदा भुगतानों के लिए 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) व्यवस्था पेश की है। यह नया ढांचा केवल उन्हीं योग्य मर्चेंट लेन-देन पर प्रभावी होगा जिनका मूल्य 2,000 रुपये से अधिक है। इसके विपरीत, सामान्य ग्राहकों के बीच होने वाले आपसी लेन-देन और रोजमर्रा की छोटी खरीदारी को इस नई शुल्क व्यवस्था से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ नहीं डालेगा नया ढांचा
इस व्यवस्था के लागू होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि सामान्य उपभोक्ता जब भी यूपीआई से भुगतान करेगा तो उसे अपनी जेब से अतिरिक्त शुल्क चुकाना होगा। मर्चेंट डिस्काउंट रेट या एमडीआर डिजिटल लेन-देन के प्रसंस्करण से जुड़ी वह लागत होती है जो भुगतान प्रणाली के भीतर मर्चेंट और सेवा प्रदाताओं के बीच तय होती है। जब कोई ग्राहक किसी मर्चेंट को भुगतान करता है, तो इस प्रक्रिया को पूरा करने में बैंक, यूपीआई ऐप्लिकेशन और भुगतान नेटवर्क शामिल होते हैं। एमडीआर के जरिए जुटाई गई राशि इन सभी भागीदारों के बीच परिचालन खर्चों और तकनीकी सेवाओं के वितरण के रूप में बांटी जाती है।
केंद्र सरकार की ओर से 14 सितंबर को जारी की गई अधिसूचना के बाद यह रूपरेखा सामने आई है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि 2,000 रुपये तक के मर्चेंट लेन-देन पर शून्य एमडीआर की छूट पहले की तरह ही बरकरार रहेगी। इस सीमा के ऊपर किए जाने वाले भुगतानों के लिए ही 0.4 प्रतिशत की दर निर्धारित की गई है। उदाहरण के लिए, यदि कोई ग्राहक किसी मर्चेंट को 5,000 रुपये का योग्य डिजिटल भुगतान करता है, तो लागू नियमों के अनुसार उस पर 20 रुपये का एमडीआर बनेगा। यह राशि भुगतान प्रणाली के अंदर की लागत है, जिसे ग्राहक से अलग से नहीं वसूला जाता।
अधिक मूल्य के लेन-देन पर 300 रुपये की अधिकतम सीमा
डिजिटल भुगतानों के मूल्य में बढ़ोतरी के साथ शुल्क को अनियंत्रित रूप से बढ़ने से रोकने के लिए नियमों में एक स्पष्ट ऊपरी सीमा या कैप तय की गई है। बड़े आकार के मर्चेंट भुगतानों के मामले में, जहां लेन-देन 75,000 रुपये या उससे अधिक का होगा, वहां एमडीआर की कुल राशि 300 रुपये प्रति लेन-देन पर सीमित रहेगी। इस अधिकतम सीमा का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि अत्यधिक बड़े बिलों के भुगतान पर प्रतिशत के हिसाब से शुल्क असीमित रूप से न बढ़ता रहे और व्यापारिक इकाइयों पर अत्यधिक वित्तीय भार न पड़े।
वहीं, आम नागरिकों के लिए 2,000 रुपये तक के मर्चेंट भुगतानों पर शून्य एमडीआर की सुविधा जारी रहने से किराना सामान, फल-सब्जियां, दूध, भोजन, स्थानीय परिवहन, दवाएं और अन्य दैनिक आवश्यकताओं की खरीदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकारी अनुमानों के मुताबिक, इस संशोधित शुल्क व्यवस्था का दायरा व्यापारियों को होने वाले कुल यूपीआई भुगतानों के केवल 4 प्रतिशत हिस्से तक ही सीमित रहेगा, क्योंकि मर्चेंट को किए जाने वाले अधिकांश यूपीआई लेन-देन 2,000 रुपये की सीमा के भीतर ही होते हैं। यह ढांचा रोजमर्रा के छोटे लेन-देन को सुरक्षित रखते हुए बड़े व्यापारिक भुगतानों को अलग श्रेणी में रखता है।
पर्सन-टू-पर्सन ट्रांसफर पूरी तरह शुल्क मुक्त
नए एमडीआर नियमों का आम लोगों द्वारा एक-दूसरे को भेजे जाने वाले पैसों यानी पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) ट्रांसफर पर कोई असर नहीं होगा। दो व्यक्तियों के बीच सीधे बैंक खाते में भेजे जाने वाले पैसे पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, चाहे लेन-देन की राशि कितनी भी बड़ी क्यों न हो। यदि कोई व्यक्ति अपने किसी मित्र को 5,000 रुपये भेजता है या परिवार के किसी सदस्य को 50,000 रुपये ट्रांसफर करता है, तो उस पर शून्य प्रतिशत शुल्क रहेगा और 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू नहीं होगा।
यह छूट बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अधिसूचना के आंकड़ों के अनुसार, कुल यूपीआई लेन-देन की संख्या में पर्सन-टू-पर्सन ट्रांसफर की हिस्सेदारी लगभग 37 प्रतिशत है, जबकि कुल लेन-देन मूल्य में इसका योगदान करीब 70 प्रतिशत है। इस बड़े हिस्से को निशुल्क बनाए रखने से आम जनता के बीच डिजिटल भुगतान का दायरा और विश्वास निर्बाध रूप से बना रहेगा।
छोटे विक्रेताओं और रेहड़ी-पटरी वालों को विशेष राहत
अनौपचारिक क्षेत्र के छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं की सुरक्षा के लिए पर्सन-टू-पर्सन-मर्चेंट यानी पी2पीएम श्रेणी के तहत सुरक्षात्मक उपाय जारी रखे गए हैं। इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाले छोटे विक्रेताओं के लिए प्रति माह 1 लाख रुपये तक के लेन-देन पर शून्य एमडीआर लागू रहेगा।
यह प्रावधान खास तौर पर उन सड़क किनारे दुकान लगाने वाले या छोटे कामगारों के लिए बनाया गया है जो क्यूआर कोड या यूपीआई के माध्यम से डिजिटल भुगतान तो स्वीकार करते हैं, लेकिन उनके पास बड़े उद्यमों जैसी आधुनिक मर्चेंट बिलिंग प्रणालियां मौजूद नहीं होतीं। इन भुगतानों को निशुल्क रखकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि छोटे कारोबारी अपने दैनिक कामकाज में बिना किसी अतिरिक्त लागत के डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित होते रहें।
रेलवे, ईंधन और अन्य अनिवार्य सेवाओं के लिए निर्धारित दरें
उच्च मूल्य के सभी मर्चेंट भुगतानों पर एक समान 0.4 प्रतिशत की दर लागू नहीं की जाएगी। कुछ आवश्यक और जनोपयोगी क्षेत्रों के लिए एक विशेष ढांचा तैयार किया गया है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा और ईंधन जैसी अनिवार्य सेवाओं के लिए 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 5 रुपये प्रति लेन-देन का एकमुश्त फ्लैट एमडीआर लागू होगा।
फ्लैट दर होने के कारण इन क्षेत्रों में बिल की राशि चाहे कितनी भी बढ़ जाए, शुल्क 0.4 प्रतिशत की दर से बढ़ने के बजाय केवल 5 रुपये पर ही स्थिर रहेगा। इससे लंबी दूरी के रेल टिकट, वार्षिक बीमा प्रीमियम या ईंधन भरवाने जैसे आवश्यक खर्चों पर अनुचित लागत वृद्धि नहीं होगी।
वित्तीय बाजार और प्रतिभूतियों के लिए अलग व्यवस्था
म्यूचुअल फंड, प्रतिभूतियों, स्टॉक ब्रोकरों और वित्तीय डीलरों से जुड़े डिजिटल लेन-देन के लिए और भी कम दर तय की गई है। इस श्रेणी में आने वाले भुगतानों के लिए केवल 0.02 प्रतिशत का एमडीआर लागू किया जाएगा। इसके साथ ही, इस वर्ग में भी प्रति लेन-देन अधिकतम शुल्क की सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।
शेयर बाजार और वित्तीय परिसंपत्तियों के सौदों में सामान्य खुदरा भुगतानों की तुलना में काफी बड़ी रकम शामिल होती है। यदि इन पर सामान्य प्रतिशत दर लगाई जाती, तो प्रसंस्करण लागत बहुत अधिक बढ़ सकती थी। 0.02 प्रतिशत की न्यूनतम दर और 300 रुपये की कैप यह सुनिश्चित करती है कि बड़े निवेश और व्यापारिक लेन-देन की डिजिटल प्रोसेसिंग बेहद किफायती बनी रहे।


















