बरसात का महीना भेड़-बकरियों की देखभाल करने वालों के सामने कई तरह की परेशानियां लेकर आता है। इस अवधि में वातावरण में नमी, हर तरफ कीचड़, गंदगी और विभिन्न प्रकार के परजीवियों के पनपने से पशुओं के बाल और ऊन की सेहत बिगड़ने लगती है। जब ऊन के अंदर नमी काफी समय तक बनी रहती है, तो वह आपस में उलझ जाती है, उसका रंग पीला पड़ने लगता है और उसकी ओवरऑल क्वालिटी गिर जाती है। इन सब कमियों का सीधा असर किसानों और पशुपालकों को बाजार में मिलने वाले मुनाफे पर पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि मानसून के दिनों में पशुओं की विशेष रूप से सुरक्षा और देखभाल की जाए।
बाड़े को सूखा और साफ रखना है बेहद जरूरी
भेड़ के शरीर की ऊन बिल्कुल स्पंज की तरह काम करती है जो आसानी से पानी और नमी को अपने अंदर सोख लेती है। यदि मवेशी किसी गीले या कीचड़ से भरे हुए बाड़े के अंदर बैठते हैं, तो उनकी ऊन में फंगस लगने की आशंका काफी ज्यादा बढ़ जाती है। इस वजह से ऊन पीली पड़कर पूरी तरह खराब हो सकती है। यही कारण है कि पशुओं के रहने वाले शेड का फर्श हमेशा सूखा रखा जाना चाहिए। यदि संभव हो सके तो बाड़े के अंदर लकड़ी या बांस की मचान तैयार करें, ताकि गोबर और पेशाब आसानी से नीचे की तरफ गिर जाए और पशु हमेशा एक सूखी जगह पर आराम कर सकें।
समय पर ऊन की कटाई और स्वच्छता का ध्यान
बहुत अधिक घनी ऊन के अंदर बारिश का पानी लंबे समय तक फंसा रह जाता है। इस स्थिति के कारण पशुओं में निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी और त्वचा से जुड़ी कई प्रकार की समस्याएं होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसलिए हमेशा यह सलाह दी जाती है कि बारिश का मौसम शुरू होने से पहले ही ऊन की कटाई करवा लेनी चाहिए। अगर किसी कारणवश पूरे शरीर की ऊन एक साथ काटना संभव न हो, तो कम से कम पेट के निचले हिस्से की, पूंछ की और पिछले अंगों की ऊन जरूर काट दें। ऐसा करने से वहां कीचड़ और गोबर के चिपकने की समस्या से काफी हद तक राहत मिल जाती है.
परजीवियों से बचाव और खानपान पर नियंत्रण
बरसात के इन दिनों में जूं और किलनी जैसी समस्याओं में अचानक बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इन छोटे जीवों के कारण मवेशियों के शरीर में भयंकर खुजली होती है और वे राहत पाने के लिए दीवारों या पेड़ों से अपना शरीर रगड़ने लगते हैं, जिससे उनके बाल और ऊन टूटने लगते हैं। जैसे ही हल्की धूप निकले, किसी योग्य पशु चिकित्सक की सलाह लेकर परजीवी नियंत्रण वाली दवाओं का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा, बारिश के मौसम में उगने वाले नए हरे चारे में पानी की मात्रा जरूरत से ज्यादा होती है। इसे बहुत अधिक मात्रा में खिलाने से पशुओं को दस्त की शिकायत हो सकती है और पिछला हिस्सा गंदा होने से ऊन खराब हो जाती है। इसलिए हरे चारे के साथ हमेशा सूखा भूसा मिलाकर देना चाहिए, साथ ही संतुलित आहार और मिनरल मिक्सचर का इस्तेमाल करना चाहिए।



















