बिहार के रोहतास जिले में बरसात के दिनों में लगातार होने वाली बारिश और खेतों में जलभराव किसानों के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर देता है। इस मौसम में नमी की मात्रा अधिक होने के कारण फसलों में कीटों और बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। गलत तरीके से की गई खेती से न सिर्फ सब्जियों की पैदावार गिरती है, बल्कि उनकी क्वालिटी पर भी बुरा असर पड़ता है। इन तमाम समस्याओं से निपटने और बंपर पैदावार सुनिश्चित करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र बिक्रमगंज के कृषि विज्ञानी डॉ. रतन कुमार ने अन्नदाताओं को कई महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव दिए हैं, जिन्हें अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं।
रेतीली मिट्टी और ऊंची क्यारियों का करें इस्तेमाल
डॉ. रतन कुमार के अनुसार बरसात के इस सीजन में सब्जियों की खेती के लिए रेतीली मिट्टी का चुनाव सबसे बेहतर रहता है क्योंकि इसमें पानी बहुत ज्यादा देर तक नहीं रुकता और निकास आसानी से हो जाता है। खेत में बीज बोने या पौधे लगाने से पहले ऊंची क्यारियां या मेड़ तैयार करनी चाहिए ताकि लगातार बारिश होने पर भी खेत में पानी न टिके और पौधों की नाज़ुक जड़ों को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे। खेत में पानी का जमाव होना इस मौसम में फसलों के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होता है, जिससे पौधे सड़ने लगते हैं।
मचान विधि अपनाएं और फलों को सड़ने से बचाएं
वैज्ञानिक ने जानकारी दी है कि इस मौसम में बेल वाली सब्जियों को ज़मीन पर फैलाने के बजाय मचान तकनीक का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद साबित होता है। लौकी, नेनुआ और खीरा जैसी फसलों को मचान के सहारे ऊपर चढ़ाने से बेलें और उनके फल सीधे गीली मिट्टी के संपर्क में नहीं आते हैं। अत्यधिक नमी के कारण अक्सर फल ज़मीन पर सड़ जाते हैं और पौधों में बीमारियां लग जाती हैं, लेकिन मचान विधि से यह जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है। इसके अलावा, बेलों को फैलने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है जिससे उनका विकास बहुत तेजी से होता है।
सीधे बीज बोने के बजाय पहले तैयार करें पौध
डॉ. रतन कुमार का सुझाव है कि बरसात के दिनों में खेत में सीधे बीज डालने की गलती नहीं करनी चाहिए, बल्कि इसके बजाय प्लास्टिक के छोटे गिलासों या कंटेनरों में पौध तैयार करना एक समझदारी भरा विकल्प है। जब पौधे थोड़े बड़े हो जाएं तब उन्हें खेत में लगाना चाहिए, जिससे शुरुआती दौर की भारी बारिश से होने वाले नुकसान से फसलों को बचाया जा सके। खेत में इन पौधों की रोपाई करने से पहले बीजों का उचित उपचार करना भी बेहद जरूरी है ताकि मिट्टी से फैलने वाले फंगस और संक्रमण से फसल सुरक्षित रह सके।
फंगस से बचाव और पौधों के बीच सही दूरी
वैज्ञानिक के दिशा-निर्देशों के अनुसार बुवाई से पहले बीजों को अनुशंसित फफूंदनाशी से उपचारित करना अनिवार्य है ताकि फंगस जनित बीमारियों का खतरा न के बराबर हो। खेत में पौधे लगाते समय इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए कि वे बहुत पास-पास न हों। मचान पर उगाई जाने वाली बेलदार सब्जियों में पौधों और लाइनों के बीच लगभग दो गुणा दो मीटर की दूरी रखनी चाहिए। इतनी दूरी बनाए रखने से पौधों को भरपूर धूप और हवा मिलती है, जिससे नमी के कारण फैलने वाले संक्रमण का खतरा टल जाता है।
कीट नियंत्रण के लिए नीम के घोल का करें प्रयोग
फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर रहने की कोई जरूरत नहीं है। डॉ. रतन कुमार ने किसानों को सलाह दी है कि वे कीट प्रबंधन के लिए नीम आधारित जैविक घोल का छिड़काव करें। इस घोल को तैयार करने के लिए पांच लीटर पानी में ढाई किलोग्राम नीम की ताजी पत्तियां डालकर तब तक उबालना चाहिए जब तक कि पानी आधा यानी लगभग ढाई लीटर न बच जाए। इसके बाद इस मिश्रण को अच्छी तरह छानकर चार से पांच मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर फसलों पर छिड़कना चाहिए। इस जैविक तरीके से फसलों की कीटों से सुरक्षा भी होती है और लागत भी कम आती है।



















