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रासायनिक खाद का सस्ता तोड़: गोबर और कचरे से 'इंदौर विधि' से बनाएं देसी खाद, मिट्टी रहेगी जवान और जेब भी बचेगीव्यापार
17 जून 2026, 7:21 am (88 दिन पहले)· 2

रासायनिक खाद का सस्ता तोड़: गोबर और कचरे से 'इंदौर विधि' से बनाएं देसी खाद, मिट्टी रहेगी जवान और जेब भी बचेगी

चंबल संभाग के किसानों के लिए कृषि विभाग के उप-संचालक पान सिंह ने गोबर और जैविक अवशेषों से 'इंदौर विधि' द्वारा देसी खाद बनाने का तरीका बताया, जो लागत को लगभग शून्य कर मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती है।

खेत में फसल जल्दी बढ़ाने की चाह में अगर आप लगातार DAP और NPK जैसी रासायनिक खादों पर ही टिके हुए हैं, तो थोड़ा रुककर सोचने की जरूरत है। ये खादें न सिर्फ हर सीजन आपकी जेब पर भारी पड़ती हैं, बल्कि साल-दर-साल इस्तेमाल से खेत की मिट्टी की जान भी धीरे-धीरे निकलती जाती है और जमीन बंजर होने की ओर बढ़ने लगती है। चंबल संभाग के किसानों के लिए इसका हल बहुत पास, बल्कि उनके अपने पशुओं के बाड़े और घर के कचरे में ही मौजूद है।

जानकारी किसने दी और क्यों मायने रखती है

कृषि विभाग के उप-संचालक पान सिंह ने TrendKia से खास बातचीत में बताया कि गोबर और जैविक अवशेषों से तैयार होने वाली देसी खाद फसलों को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ जमीन की उर्वरक शक्ति को भी बनाए रखती है। उनके मुताबिक खेती की लागत को यह खाद लगभग शून्य तक ला सकती है और साथ ही मिट्टी की सेहत भी सुधारती है।

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रासायनिक बनाम जैविक: फर्क कहां है

विशेषज्ञ की राय में रासायनिक खादें फसल को फटाफट पोषण जरूर देती हैं, लेकिन सालों तक केवल इन्हीं के भरोसे रहने पर मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ने लगता है। इसके उलट गोबर और जैविक कचरे से बनी खाद मिट्टी में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ाती है, जिससे जमीन की संरचना और उर्वरता दोनों लंबे समय तक टिकी रहती हैं।

‘इंदौर विधि’ क्या है

गांव-देहात में लोग इसे आमतौर पर ‘घूरा लगाना’ या ‘कचरे का गड्ढा’ कहकर पुकारते हैं। वैज्ञानिक भाषा में यही प्रक्रिया ‘इंदौर विधि’ के नाम से जानी जाती है। इस तरीके से तीन से चार महीने में अच्छी गुणवत्ता वाली कंपोस्ट खाद तैयार हो जाती है।

गड्ढा कहां और कैसा बनाएं

सबसे पहले खेत या घर के नजदीक ऐसी जगह चुनें जहां बारिश का पानी जमा न होता हो। हो सके तो पेड़ की छाया वाली जगह बेहतर रहती है। गड्ढे की गहराई करीब तीन फीट तक रखें, जबकि लंबाई और चौड़ाई अपनी जरूरत के हिसाब से तय की जा सकती है।

परतों में भरें सामग्री

गड्ढे को एक साथ नहीं, बल्कि अलग-अलग परतों में भरना है। सबसे नीचे सूखी घास, पत्तियां या फसल अवशेष बिछाएं। इसके ऊपर गोबर और गीला जैविक कचरा डालें। बीच-बीच में थोड़ी मिट्टी या राख छिड़कते रहें, इससे खाद जल्दी तैयार होती है और दुर्गंध भी कम रहती है।

नमी और देखभाल का ध्यान

गड्ढे में समय-समय पर हल्का पानी छिड़कते रहें ताकि नमी बनी रहे, पर ध्यान रखें कि पानी जरूरत से ज्यादा न हो। गड्ढा पूरा भर जाने पर उसे मिट्टी और गोबर के मिश्रण से ढक दें। करीब एक से सवा महीने बाद गड्ढे की एक बार पलटाई जरूर करें, ताकि अंदर तक पर्याप्त हवा पहुंच सके।

तैयार खाद की पहचान

लगभग तीन से चार महीने में गहरे भूरे या काले रंग की भुरभुरी खाद बनकर तैयार हो जाती है। इसकी सही पहचान यह है कि इसमें से बदबू नहीं आती, बल्कि मिट्टी जैसी सोंधी खुशबू महसूस होती है।

खेत और किसान दोनों को फायदा

उप-संचालक पान सिंह के अनुसार जैविक खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाने में मदद करती है, जिससे जमीन की जलधारण क्षमता बढ़ जाती है और फसलें लंबे समय तक नमी पाती रहती हैं। इससे सिंचाई की जरूरत भी कुछ हद तक घट जाती है। उनका कहना है कि रासायनिक और जैविक खादों के संतुलित इस्तेमाल से किसान मिट्टी की सेहत बनाए रखते हुए टिकाऊ खेती की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

सवाल-जवाब

देसी खाद बनाने में कितना समय लगता है?
‘इंदौर विधि’ से तीन से चार महीने में अच्छी गुणवत्ता की कंपोस्ट खाद तैयार हो जाती है।
गड्ढा कितना गहरा होना चाहिए और कहां बनाएं?
गड्ढे की गहराई करीब तीन फीट रखें और ऐसी जगह चुनें जहां बारिश का पानी जमा न हो, हो सके तो पेड़ की छाया में।
तैयार खाद की पहचान कैसे करें?
तैयार खाद गहरे भूरे या काले रंग की भुरभुरी होती है, इसमें बदबू नहीं आती बल्कि मिट्टी जैसी सोंधी खुशबू महसूस होती है।
यह जानकारी किसने दी है?
कृषि विभाग के उप-संचालक पान सिंह ने TrendKia से बातचीत में यह जानकारी दी है।
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