देश के कई इलाकों में चीनी की खुदरा कीमतें ऊपर जाने लगी हैं जिससे आम परिवारों के साथ-साथ छोटे स्तर के खाद्य कारोबारियों की चिंता भी बढ़ गई है। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में खुली चीनी की खुदरा बिक्री लगभग 75 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास दर्ज की जा रही है। कीमतों में आए इस उछाल ने लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आने वाले दिनों में यह जरूरी खाद्य पदार्थ और अधिक महंगा हो सकता है या नहीं। खासकर ऐसे समय में जब देश में त्योहारी और शादियों का सीजन नजदीक आ रहा है, तब इस तरह की महंगाई का असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है।
कीमतों में तेजी की असली वजहें
बाजार के जानकारों का मानना है कि चीनी के महंगे होने के पीछे कोई एक अकेली वजह जिम्मेदार नहीं है। इसके बजाय कई अलग-अलग कारक एक साथ मिलकर बाजार को प्रभावित कर रहे हैं। गन्ना उत्पादन में कमी आना, गन्ने की खेती के कुल रकबे में गिरावट दर्ज होना, चीनी मिलों में पेराई का सीजन छोटा होना और व्यापारियों द्वारा स्टॉक रोककर रखना जैसी बातें इस तंगी के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं। जब बाजार में सप्लाई कम होने की आशंका होती है और मांग लगातार बनी रहती है, तो स्वाभाविक रूप से दाम ऊपर जाने लगते हैं।
उत्पादन और रकबे में गिरावट
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान गन्ने की खेती के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रफल में कमी आई है। इसके साथ ही गन्ने का कुल उत्पादन भी अपने पुराने स्तर से नीचे आया है। इस स्थिति ने आने वाले महीनों में चीनी की कुल उपलब्धता को लेकर चिंता को और गहरा कर दिया है। महाराष्ट्र के पूर्व चीनी आयुक्त शेखर गायकवाड़ के अनुसार, गन्ने के उत्पादन को बढ़ाने में समय लगेगा। उनका यह भी कहना था कि यदि सरकार आज कोई नई नीति लेकर आती है, तो भी उसके असर को जमीन पर दिखने में लगभग 30 से 36 महीने का वक्त लग सकता है।
कारोबारियों और त्योहारों पर असर
चीनी हमारे घरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीज है, लेकिन इसका असर केवल एक पैकेट की कीमत तक सीमित नहीं रहता है। मिठाई की दुकानें, बेकरी, रेस्टोरेंट, चाय के स्टॉल, बेवरेज कंपनियां और अन्य खाद्य उद्योग भी अपनी जरूरत के लिए चीनी पर पूरी तरह निर्भर हैं। अगर इन उद्योगों की लागत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है, तो कारोबारियों के पास अपनी लागत का एक हिस्सा ग्राहकों से वसूलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। यह प्रभाव आगामी त्योहारी सीजन के दौरान और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आ सकता है, जब मिठाइयों और अन्य मीठे उत्पादों की मांग में आमतौर पर भारी बढ़ोतरी होती है।
इथेनॉल की भूमिका पर बहस
मौजूदा बहस में इथेनॉल का मुद्दा काफी अहम बन गया है, लेकिन उद्योग विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यह वर्तमान मूल्य वृद्धि का इकलौता कारण नहीं है। सरकार ने देश को आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता से मुक्त कराने और किसानों तथा चीनी मिलों को आय का एक वैकल्पिक बाजार देने के उद्देश्य से इथेनॉल के सम्मिश्रण को बढ़ावा दिया है। विपक्ष के कुछ नेताओं का तर्क है कि गन्ने या चीनी के एक हिस्से को इथेनॉल की तरफ मोड़ने की वजह से उपभोक्ताओं के लिए बाजार में चीनी की मात्रा कम पड़ जाती है। दूसरी तरफ, उद्योग प्रतिनिधियों का यह भी कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में अब इथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की मात्रा कम हुई है, इसलिए पूरी महंगाई के लिए सिर्फ इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
मिलों के सामने आर्थिक चुनौतियां
वर्तमान समय में सबसे बड़ी चिंता का विषय खुद चीनी की सुचारू सप्लाई का है। महाराष्ट्र देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में से एक है, इसलिए वहां के हालात पूरे देश के बाजार के लिए बेहद अहम हैं। राज्य की चीनी मिलें पहले की तुलना में कम दिनों के लिए गन्ने की पेराई कर रही हैं। जहां पहले सीजन के दौरान कुछ मिलें लगभग 150 दिनों तक काम करती थीं, वहीं अब यह अवधि घटकर कई मामलों में महज 100 दिन के करीब रह गई है। चीनी उत्पादन का पूरा अर्थशास्त्र ही मिलों के सामने एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। मिलों को किसानों को गन्ने का पूरा भुगतान करना पड़ता है, जबकि बाजार में उन्हें मिलने वाली चीनी की कीमत उसी रफ्तार से नहीं बढ़ती है। जब उत्पादन कम लाभदायक हो जाता है, तो मिलों को भारी वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी पेराई क्षमता पर भी सीधा असर पड़ता है।



















