यदि आप निकट भविष्य में कोई नई कार या फिर दोपहिया वाहन खरीदने का मन बना रहे हैं, तो यह ताजा जानकारी आपके लिए बेहद काम की साबित होने वाली है। देश की सर्वोच्च अदालत ने वाहन चालकों और मालिकों के हित में एक बड़ा और सख्त आदेश पारित किया है, जिससे नई गाड़ियां खरीदने की कुल लागत में कुछ वृद्धि होना तय माना जा रहा है। हालांकि, दूसरी तरफ इस कदम का मुख्य उद्देश्य सड़क हादसों में जान गंवाने वाले या गंभीर रूप से घायल होने वाले पीड़ितों के परिवारों को वित्तीय सुरक्षा और न्याय दिलाना है।
अनिवार्य बीमा अवधि में एक साल का इजाफा
मंगलवार को आए इस महत्वपूर्ण फैसले के तहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब से नई चार पहिया गाड़ियां खरीदने वाले ग्राहकों को कम से कम चार साल का और नए दोपहिया वाहन खरीदने वालों को छह साल का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस एक साथ ही खरीदना अनिवार्य होगा। जानकारी के लिए बता दें कि इससे पहले यह नियम कारों के लिए तीन साल और मोटरसाइकिलों या स्कूटरों के लिए पांच साल का हुआ करता था। अदालत का यह कड़ा रुख इस बात को ध्यान में रखकर आया है कि देश की सड़कों पर भारी तादाद में वाहन बिना किसी वैध बीमा कवर के फर्राटा भर रहे हैं, जिसकी वजह से सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजे की राशि हासिल करने में लंबी कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
सड़कों पर दौड़ रहे लाखों गैर-बीमित वाहन
यह पूरा कानूनी मामला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पीके मिश्रा की बेंच के सामने सुनवाई के लिए आया था, जहां नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की तरफ से एक अपील दायर की गई थी। अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गहरी निराशा जताई कि करीब आठ साल पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद जमीनी हालात में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं देखा गया है। आज भी देश भर में लाखों वाहन बिना किसी थर्ड-पार्टी बीमा के खुलेआम चलाए जा रहे हैं, जिससे सड़क सुरक्षा के नियम कागजी साबित हो रहे हैं।
नियामक की आपत्तियों को अदालत ने नकारा
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया कि बीमा विनियामक संस्था आईआरडीएआई और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने अनिवार्य बीमा की अवधि को बढ़ाने से साफ तौर पर इनकार करते हुए इसकी सिफारिश नहीं की थी। इसके बावजूद, सड़क पर चलने वाले आम नागरिकों की सुरक्षा और व्यापक जनहित को सर्वोपरि मानते हुए अदालत ने इस समयावधि में पूरे एक साल की बढ़ोतरी करना बेहद जरूरी समझा। इसके साथ ही, अदालत ने आईआरडीएआई को यह सख्त आदेश भी जारी किया है कि वह इस नए नियम के तहत तुरंत प्रभाव से सभी आवश्यक दिशा-निर्देश लागू करे।
चौंकाने वाला आंकड़ा: 56 फीसदी गाड़ियां बिना इंश्योरेंस
अदालत की इस सुनवाई के दौरान एक ऐसा तथ्य सामने आया जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। फैसले में इस बात का खुलासा किया गया कि वर्तमान समय में भारतीय सड़कों पर दौड़ने वाले कुल वाहनों में से लगभग 56 प्रतिशत गाड़ियां ऐसी हैं जिनके पास कोई भी वैध इंश्योरेंस नहीं है। अदालत ने इस स्थिति को बेहद गंभीर और चिंताजनक करार देते हुए कहा कि इस तरह की लापरवाही से मोटर वाहन अधिनियम के तहत बनाए गए अनिवार्य बीमा के मूल उद्देश्य को गहरा आघात पहुंचता है और कानून कमजोर पड़ जाता है.
क्यों पड़ी इस कड़े बदलाव की जरूरत
न्यायालय ने इस बात को गहराई से महसूस किया कि देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले सड़क हादसों में अपने प्रियजनों को खोने वाले या अपंगता का शिकार होने वाले लोगों को मुआवजा हासिल करने के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर काटते हुए कई-कई साल बिताने पड़ जाते हैं। ऐसी जटिल और दर्दनाक परिस्थितियों से निपटने के लिए एक मजबूत, सुदृढ़ और अधिक प्रभावी बीमा व्यवस्था का होना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है। हालांकि बीमा कंपनियों के निकायों ने तर्क दिया था कि बीमा की अवधि बढ़ने से ग्राहकों पर प्रीमियम का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा और इससे बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या में कोई कमी नहीं आएगी, लेकिन अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया।
चार-स्तरीय मोटर इंश्योरेंस फ्रेमवर्क को मंजूरी
इस पूरी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अदालत ने निजी वाहनों के वास्ते एक विशेष चार-स्तरीय मोटर इंश्योरेंस फ्रेमवर्क को भी अपनी मंजूरी दे दी है। इस नए ढांचे के अंतर्गत अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के अलावा गाड़ी में सफर कर रहे अन्य यात्रियों तथा पीछे बैठने वाले यानी पिलियन राइडर के वास्ते वैकल्पिक कानूनी दायित्व कवर, वाहन मालिक-चालक व यात्रियों के लिए व्यक्तिगत दुर्घटना कवर, और खुद के वाहन को हुए नुकसान के लिए ओन-डैमेज का वैकल्पिक कवर शामिल किया गया है।
कस्टमर ऑप्शन फॉर्म भरना अनिवार्य
इन तमाम प्रावधानों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट निर्देश भी दिया है कि अब चाहे कोई ग्राहक ऑनलाइन माध्यम से बीमा पॉलिसी खरीदे या फिर किसी ऑफलाइन जरिए से, उसे अनिवार्य रूप से एक 'कस्टमर ऑप्शन फॉर्म' उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इस फॉर्म के माध्यम से प्रत्येक ग्राहक अपनी व्यक्तिगत और वित्तीय जरूरत के अनुसार अतिरिक्त बीमा कवर का चुनाव बड़े ही आसान तरीके से कर सकेगा।



















