भारतीय उद्योग जगत के अग्रणी औद्योगिक घराने टाटा समूह के शीर्ष प्रबंधन में नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सतह पर आ गए हैं। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने टाटा संस के मौजूदा चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पुनः पांच वर्षों का सेवा विस्तार देने के बोर्ड के फैसले को सीधे तौर पर चुनौती दी है। इस संबंध में उन्होंने टाटा संस के कंपनी सेक्रेटरी सुप्रकाश मुखोपाध्याय को औपचारिक पत्र लिखकर इस पूरी प्रक्रिया की वैधता पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। चंद्रशेखरन का वर्तमान कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होने जा रहा है, लेकिन बोर्ड ने पूर्व में ही उनके अगले कार्यकाल को मंजूरी प्रदान कर दी थी।
एजेंडे से बाहर जाकर फैसला लेने का आरोप
नोएल टाटा ने अपनी औपचारिक आपत्ति में स्पष्ट किया है कि 17 सितंबर को आयोजित टाटा संस के निदेशक मंडल की बैठक में चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार का मुद्दा आधिकारिक कार्यसूची में शामिल ही नहीं था। उनके अनुसार, उस बैठक का मुख्य उद्देश्य केवल नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमेटी द्वारा पेश की गई जानकारियों और सुझावों पर विमर्श करना था। नोएल टाटा का पक्ष है कि तय नियमों और स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना ही अचानक इस अहम प्रस्ताव को पारित कर दिया गया, जिससे यह फैसला पूरी तरह से अमान्य हो जाता है। प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने उस बैठक की बिना संपादन वाली वीडियो रिकॉर्डिंग भी तलब की है।
निदेशक मंडल में मतदान और समर्थन का गणित
बैठक के दौरान जब चंद्रशेखरन को आगे भी जिम्मेदारी सौंपने का प्रस्ताव पटल पर रखा गया, तब मतदान के समय नोएल टाटा ने इसका मुखर विरोध किया था। हालांकि, बोर्ड के अन्य सदस्यों ने बड़े अंतर से इस प्रस्ताव का समर्थन किया। टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित एक अन्य महत्वपूर्ण निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने बहुमत का साथ देते हुए चंद्रशेखरन के पक्ष में अपना मत दिया। इसके अलावा अनीता जॉर्ज, हरीश मनवानी और सौरभ अग्रवाल सहित बोर्ड के तमाम अन्य निदेशकों ने भी चंद्रशेखरन के कार्यकाल को विस्तार देने के पक्ष में मतदान किया था।
आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन और हिस्सेदारी का पेंच
इस पूरे प्रशासनिक टकराव के केंद्र में टाटा संस की शेयरधारिता और उसके नियम हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी है, जो इसे समूह के भीतर असाधारण शक्तियां देती है। नोएल टाटा का तर्क है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में स्पष्ट नियम तय हैं, जिसके तहत किसी भी अहम प्रस्ताव को पारित कराने के लिए टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की सर्वसम्मत सहमति अथवा समर्थन अनिवार्य होता है। चूंकि नामित निदेशकों में से एक ने इसका विरोध किया था, इसलिए इस निर्णय की संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। फिलहाल इस मुद्दे पर न तो टाटा संस और न ही टाटा ट्रस्ट्स की ओर से कोई आधिकारिक सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी गई है, लेकिन इस तकरार ने समूह की आंतरिक गवर्नेंस प्रणाली को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।





















