भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनी ओएनजीसी को अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) से वेनेजुएला में एक बार फिर अपनी पूरी क्षमता के साथ कामकाज शुरू करने की अनुमति मिल गई है। अमेरिका से मिले इस विशेष लाइसेंस के बाद कंपनी की अंतरराष्ट्रीय शाखा ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) के सामने मौजूद प्रतिबंधों से जुड़ी एक बहुत बड़ी रुकावट खत्म हो गई है। इस प्रशासनिक मंजूरी के बाद अब भारतीय कंपनी वेनेजुएला में स्थित अपनी तेल और प्राकृतिक गैस परियोजनाओं का पूर्ण रूप से संचालन कर सकेगी और वहां नए सिरे से निवेश बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएगी।
सैन क्रिस्टोबल और काराबोबो परियोजनाओं में हिस्सेदारी का गणित
ओएनजीसी की विदेशी निवेश शाखा ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) वेनेजुएला के प्रमुख तेल क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखती है। कंपनी की वेनेजुएला की प्रसिद्ध सैन क्रिस्टोबल तेल परियोजना में 40 प्रतिशत की इक्विटी हिस्सेदारी है। इस परियोजना में शेष 60 प्रतिशत हिस्सेदारी वेनेजुएला की सरकारी पेट्रोलियम कंपनी पेट्रोलेओस डी वेनेजुएला एस.ए. (पीडीवीएसए) के पास है। इसके अतिरिक्त ओवीएल के पास वेनेजुएला की एक अन्य विकासाधीन काराबोबो तेल परियोजना में भी 11 प्रतिशत की हिस्सेदारी है।
ओएनजीसी के डायरेक्टर (फाइनेंस) अनुपम अग्रवाल ने पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों की घोषणा के बाद निवेशकों और विश्लेषकों के साथ हुई बातचीत में इन घटनाक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और उससे जुड़े वित्तीय जोखिमों के कारण कंपनी ने पिछले कुछ समय से वहां अपने परिचालनों को सीमित कर रखा था। लेकिन अमेरिकी वित्त विभाग से लाइसेंस मिलने के बाद अब जमीनी स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है और कंपनी को अपने प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने की पूरी आजादी मिल गई है।
50 करोड़ डॉलर के अटके डिविडेंड की वसूली और संचालन अधिकार
ओएफएसी द्वारा जारी इस नए लाइसेंस का सबसे बड़ा फायदा ओएनजीसी को वित्तीय मोर्चे पर मिलने जा रहा है। इस मंजूरी से कंपनी के लिए वेनेजुएला की परियोजनाओं में वित्तीय लेन-देन का रास्ता आसान हो गया है। इसके जरिए ओएनजीसी लंबे समय से अटका हुआ 50 करोड़ डॉलर से अधिक का पेंडिंग डिविडेंड हासिल करने की स्थिति में आ गई है। प्रतिबंधों के कारण यह लाभांश राशि काफी समय से फंसी हुई थी, जिसकी वसूली अब संभव हो सकेगी।
निदेशक अनुपम अग्रवाल ने बताया कि ओएनजीसी की टीम इस समय वेनेजुएला के ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों और अपने स्थानीय संयुक्त उपक्रम भागीदारों के साथ सैन क्रिस्टोबल और काराबोबो दोनों परियोजनाओं के भविष्य को लेकर लगातार वार्ता कर रही है। कंपनी को उम्मीद है कि जल्द ही नए व्यावसायिक समझौते पूरे कर लिए जाएंगे। इसके साथ ही ओएनजीसी को सैन क्रिस्टोबल जैसी परियोजनाओं का मुख्य परिचालन नियंत्रण पीडीवीएसए से अपने हाथों में मिलने की पूरी संभावना है। परिचालन नियंत्रण मिलने से ओएनजीसी वहां नई तकनीक और पूंजी निवेश के जरिए कच्चे तेल का उत्पादन तेजी से बढ़ाने की योजना बना रही है।
दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार में भारत के लिए रणनीतिक अवसर
उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डालें तो सैन क्रिस्टोबल परियोजना से वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान लगभग 2.65 लाख टन तेल के बराबर उत्पादन दर्ज किया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार यह उत्पादन इस तेल क्षेत्र की वास्तविक क्षमता का केवल 10वां हिस्सा है, जिसे नए निवेश के बाद काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है। इसलिए वेनेजुएला का तेल क्षेत्र ओएनजीसी और भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल का प्रमाणित कच्चा तेल भंडार मौजूद है, जो पूरी दुनिया में किसी भी एक देश के पास सबसे बड़ा क्रूड ऑयल रिजर्व है। हालांकि पिछले कई वर्षों से पूंजी और आधुनिक तकनीक की कमी, कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों तथा स्थानीय बुनियादी ढांचों की चुनौतियों के कारण वेनेजुएला अपनी इस विशाल तेल क्षमता का पूरा दोहन नहीं कर पाया था। अब ओएनजीसी के दोबारा सक्रिय होने से भारत को अपनी कच्चे तेल की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक मजबूत और टिकाऊ विकल्प मिलने की उम्मीद है।



















