भारत में दशकों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई को सुरक्षित भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा की गारंटी माना जाता रहा है। हर साल 12वीं कक्षा में गणित विषय से पास होने वाले लाखों छात्र बिना ज्यादा सोचे-समझे बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (बीटेक) कोर्स का रुख करते हैं। उन्हें लगता है कि डिग्री पूरी होते ही उन्हें किसी बड़ी कंपनी में लाखों रुपये के पैकेज वाली नौकरी मिल जाएगी। इसी भारी मांग के कारण आज देश के हर गली-मोहल्ले और छोटे-बड़े शहरों में इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ आ गई है। ये कॉलेज चमचमाते विज्ञापनों और 100 प्रतिशत प्लेसमेंट के बड़े-बड़े वादों से मासूम छात्रों और उनके अभिभावकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। लेकिन आज के समय में नौकरी के बाजार की कड़वी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
चमकीले विज्ञापनों और पुरानी पढ़ाई का कड़वा सच
कॉलेजों के झूठे दावों के झांसे में आकर छात्र अक्सर ऐसे इंजीनियरिंग कोर्सेज चुन लेते हैं जिनकी आज के आधुनिक जॉब मार्केट में कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। चार साल तक दिन-रात पढ़ाई करने और माता-पिता की खून-पसीने की कमाई को भारी-भरकम फीस के रूप में चुकाने के बाद जब छात्र कैंपस प्लेसमेंट के लिए बैठते हैं, तब उन्हें असलियत का पता चलता है। उन्हें एहसास होता है कि जिस डिग्री के लिए उन्होंने अपना कीमती समय और पैसा खर्च किया, उसकी कदर आज के आधुनिक बाजार में नाममात्र की है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और ऑटोमेशन के इस नए दौर ने नौकरियों के पूरे समीकरण को बदल कर रख दिया है। पारंपरिक समय के कई इंजीनियरिंग कोर्सेज अब पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके हैं, जिससे छात्रों का भविष्य अधर में लटक जाता है। इसलिए एडमिशन लेने से पहले इन कोर्सेज की स्थिति को समझना बेहद जरूरी है।
1. टेक्सटाइल इंजीनियरिंग: पुराने इतिहास में उलझा वर्तमान
एक समय था जब देश के औद्योगिक विकास में कपड़ा मिलों का बहुत बड़ा योगदान हुआ करता था। उस दौरान टेक्सटाइल इंजीनियरिंग को एक बेहद प्रतिष्ठित और सुरक्षित करियर विकल्प माना जाता था। लेकिन आज के रोबोटिक और ऑटोमेटेड युग ने इस पूरे क्षेत्र की सूरत बदल दी है। देश की अधिकांश पारंपरिक कपड़ा मिलें या तो पूरी तरह बंद हो चुकी हैं या फिर उन्होंने आधुनिक तकनीक अपनाकर कर्मचारियों की संख्या बेहद सीमित कर दी है। इस कोर्स के तहत आज भी छात्रों को पुरानी कपड़ा मिलों की मशीनरी, धागों की बुनाई और फैब्रिक केमिस्ट्री की थ्योरी पढ़ाई जाती है। आज की सॉफ्टवेयर और तकनीक पर चलने वाली आधुनिक कंपनियों में इस पारंपरिक ज्ञान का कोई व्यावहारिक उपयोग नहीं रह गया है, जिसके कारण इस क्षेत्र में नौकरियों के अवसर लगातार खत्म हो रहे हैं।
2. बायोमेडिकल इंजीनियरिंग: दो नावों की सवारी और आधा-अधूरा ज्ञान
बायोमेडिकल इंजीनियरिंग सुनने में बेहद आधुनिक और मेडिकल साइंस से जुड़ी हुई महसूस होती है। इस कोर्स को चुनते समय छात्रों को लगता है कि वे बड़े अस्पतालों की उच्च तकनीक वाली चिकित्सा मशीनरी, एमआरआई स्कैनर और रोबोटिक सर्जरी उपकरणों को डिजाइन करना सीखेंगे। लेकिन भारत में इसका जमीनी सच बेहद निराशाजनक है। देश में हाई-एंड मेडिकल उपकरणों का कोई बड़ा घरेलू मैन्युफैक्चरिंग हब नहीं है और अधिकांश चिकित्सा उपकरण विदेशों से आयात किए जाते हैं। इसके अलावा, अस्पताल भी किसी फ्रेशर को इन बेहद संवेदनशील और करोड़ों रुपये की मशीनों के रख-रखाव की जिम्मेदारी सौंपने से बचते हैं। वे हमेशा अनुभवी विशेषज्ञों को प्राथमिकता देते हैं। यह कोर्स न तो छात्रों को कोडिंग का पूरा ज्ञान दे पाता है और न ही उन्हें मेडिकल फील्ड में पूरी तरह सक्षम बनाता है, जिससे छात्र बीच में ही फंसे रह जाते हैं।
3. केमिकल इंजीनियरिंग: थ्योरी की भरमार, लेकिन रोजगार के मौके कम
केमिकल इंजीनियरिंग को हमेशा से ही एक बेहद कठिन और होनहार छात्रों की पसंदीदा ब्रांच माना जाता रहा है। लेकिन आज के समय में इस क्षेत्र में नौकरी पाने का रास्ता बेहद संकरा हो चुका है। देश की बड़ी पेट्रोकेमिकल और रिफाइनरी कंपनियां केवल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) जैसे शीर्ष संस्थानों से ही छात्रों की भर्ती करना पसंद करती हैं। टियर-3 या छोटे शहरों के निजी कॉलेजों से इस डिग्री को हासिल करने वाले छात्रों के सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। इसके अलावा, ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बदलाव और पर्यावरण संरक्षण के कड़े सरकारी नियमों के चलते नई फैक्ट्रियों का निर्माण भी बेहद सीमित हो गया है, जिससे नई नौकरियों के मौके लगभग खत्म हो गए हैं।
4. माइनिंग और मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग: सिकुड़ती नौकरियां और दुर्गम रास्ते
खदानों, खनिजों और धातुओं से संबंधित यह इंजीनियरिंग ब्रांच काफी हद तक सरकारी उपक्रमों (पीएसयू) की भर्तियों पर निर्भर हुआ करती थी। लेकिन वर्तमान में सरकारी क्षेत्र में भी नौकरियों के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। डिजिटल और आईटी क्रांति के इस दौर में धातुओं को पिघलाने और उनकी संरचना में सुधार करने जैसी पढ़ाई का दायरा बेहद सीमित हो चुका है। निजी क्षेत्र में इस फील्ड से जुड़े रोजगार के मौके न के बराबर हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में जो कुछ नौकरियां उपलब्ध भी हैं, उनके लिए कर्मचारियों को बेहद दुर्गम और सुदूर ग्रामीण इलाकों में कठिन शारीरिक परिस्थितियों के बीच काम करना पड़ता है, जो ज्यादातर आधुनिक छात्रों के लिए व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता।
5. एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग: बड़े-बड़े सपने और जमीन पर शून्य अवसर
एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का नाम सुनते ही छात्रों की आंखों के सामने लड़ाकू विमानों, अंतरिक्ष रॉकेटों और हवाई जहाजों के डिजाइन तैयार करने के शानदार सपने तैरने लगते हैं। छात्रों को लगता है कि वे इसरो या नासा जैसी शीर्ष अंतरिक्ष एजेंसियों में वैज्ञानिक बन जाएंगे। लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि भारत में विमानन और अंतरिक्ष विनिर्माण का ढांचा अभी बेहद शुरुआती और सीमित स्तर पर है। सामान्य और गैर-प्रतिष्ठित कॉलेजों में वह अत्याधुनिक रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) इंफ्रास्ट्रक्चर ही उपलब्ध नहीं होता जो इस स्तर की नौकरियों के लिए जरूरी है। नतीजतन, ऐसे कॉलेजों से यह डिग्री लेने वाले छात्रों को या तो एयरलाइंस कंपनियों में बहुत ही कम वेतन पर ग्राउंड स्टाफ के रूप में काम करना पड़ता है या फिर वे पूरी तरह बेरोजगार रह जाते हैं
भविष्य के लिए सही चुनाव कैसे करें?
किसी भी इंजीनियरिंग कोर्स में केवल कॉलेज की ऊंची इमारतों और उनके भ्रामक विज्ञापनों को देखकर एडमिशन लेने की भूल बिल्कुल न करें। छात्रों को चाहिए कि वे बाजार की वर्तमान मांगों का गहन अध्ययन करें और पुराने ढर्रे पर चल रहे कोर्सेज से दूरी बनाएं। चार साल का कीमती समय और माता-पिता की गाढ़ी कमाई का पैसा दांव पर लगाने से पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि आप जिस डिग्री को हासिल करने जा रहे हैं, उसकी उपयोगिता आने वाले भविष्य में बनी रहेगी या नहीं।



















