गाजीपुर निवासी अलीशा ने हाल ही में आयोजित यूजीसी नेट परीक्षा में अपने समाजशास्त्र विषय से जेआरएफ हासिल किया है। अपनी इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि के बाद उन्होंने इस विषय की तैयारी में जुटे अन्य अभ्यर्थियों के मार्गदर्शन के लिए अपने व्यावहारिक अनुभव और अध्ययन के तरीके साझा किए हैं। उनका मानना है कि किसी भी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा में ढेरों किताबों का ढेर लगाने के बजाय सीमित अध्ययन सामग्री का चयन करना और एक ठोस योजना पर टिके रहना कहीं अधिक परिणामकारी साबित होता है।
परीक्षा का ढांचा और दोनों प्रश्नपत्रों का संतुलन
यूजीसी नेट परीक्षा की रूपरेखा को स्पष्ट करते हुए यह समझना आवश्यक है कि पूरी परीक्षा दो अलग हिस्सों में बंटी होती है। पहले प्रश्नपत्र के भीतर कुल 50 प्रश्न पूछे जाते हैं, जो मुख्य रूप से शिक्षण क्षमता और शोध अभिरुचि पर आधारित होते हैं। वहीं दूसरा प्रश्नपत्र पूरी तरह से अभ्यर्थी के चुने हुए विषय का होता है, जिसमें कुल 100 प्रश्न शामिल किए जाते हैं। दोनों प्रश्नपत्रों में संतुलित अंक हासिल करना ही अंतिम चयन सूची में जेआरएफ की पात्रता तय करता है।
पहले प्रश्नपत्र के लिए कमजोरी पहचानने की तकनीक
पहले प्रश्नपत्र की तैयारी के दौरान अलीशा ने रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन और आईसीटी जैसे तकनीकी व विश्लेषणात्मक घटकों पर विशेष ध्यान दिया। उनका अनुभव बताता है कि सामान्य पेपर में हर छात्र की क्षमताएं अलग होती हैं, इसलिए अभ्यर्थी जिस भी हिस्से में खुद को असहज या कमजोर महसूस करे, उसे अलग से समय देकर तैयार करना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने टीचिंग एप्टीट्यूड को भी अभ्यास का एक अनिवार्य हिस्सा माना। उनका कहना है कि इस पहले भाग में केवल पुराने प्रश्नों को रट लेना या हल कर लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन सवालों के पीछे छिपी मुख्य अवधारणाओं की समझ विकसित करना बेहद जरूरी है।
समाजशास्त्र के लिए मानक पुस्तकों का सावधानीपूर्वक चयन
समाजशास्त्र के दूसरे प्रश्नपत्र में वैचारिक स्पष्टता लाने के लिए अलीशा ने चुनिंदा प्रामाणिक किताबों का ही सहारा लिया। उन्होंने ग्रामीण समाज की संरचना और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एस.एल. डोशी और पी.सी. जैन द्वारा लिखित रूरल सोशियोलॉजी का अध्ययन किया। भारतीय समाजशास्त्रियों के विचारों की गहन समीक्षा के लिए उन्होंने बी.के. नगला की इंडियन सोशियोलॉजिकल थॉट को अपनी अध्ययन योजना में शामिल किया। इसके अलावा समाजशास्त्र के मूल सिद्धांतों को गहराई से जानने के लिए उन्होंने सी.एन. शंकर राव की सोशियोलॉजी (सोशियोलॉजी: प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलॉजी) का नियमित अध्ययन किया।
बुनियादी संकल्पनाओं को जमीन से मजबूत करने के उद्देश्य से उन्होंने साहित्य भवन की पुस्तकों का भी गहराई से उपयोग किया। उनका स्पष्ट मत है कि समाजशास्त्र के विभिन्न विचारकों, भारतीय सामाजिक व्यवस्था और ग्रामीण समाज के ताने-बाने से जुड़े अध्यायों को समझने के लिए प्रामाणिक किताबों का कोई दूसरा विकल्प नहीं हो सकता।
विचारकों का गहन अध्ययन और पिछले प्रश्नपत्रों से आत्ममूल्यांकन
अक्सर छात्र समाजशास्त्र के प्रमुख विचारकों और उनके जटिल सिद्धांतों को अंतिम समय के रिवीजन के लिए छोड़ देते हैं, जिसे अलीशा ने एक गंभीर भूल बताया। उनकी रणनीति के मुताबिक थिंकर्स और उनके प्रतिपादित सिद्धांतों का अध्ययन शुरुआती दिनों से ही गहराई के साथ शुरू कर देना चाहिए। इसके साथ ही पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को सिर्फ एक साधारण मॉक टेस्ट मानकर हल नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अपनी कमियों को उजागर करने वाले फीडबैक टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। इससे परीक्षार्थियों को सीधे यह समझने का अवसर मिलता है कि परीक्षा नियामक आयोग किस तरह के घुमावदार सवाल तैयार करता है।
प्रतिदिन छह घंटे का अनुशासित अध्ययन और भविष्य की योजना
अपनी पूरी तैयारी के दौरान अलीशा ने रोजाना लगभग 6 घंटे का अनुशासित और केंद्रित अध्ययन किया। उनका स्पष्ट विश्वास है कि पढ़ाई में बिताए गए घंटों की संख्या से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण उस समय की गुणवत्ता और एकाग्रता होती है। बाजार में उपलब्ध गैर-जरूरी अध्ययन सामग्री से खुद को दूर रखते हुए बुनियादी बातों को पुख्ता करना और उनका बार-बार दोहराव करना ही किसी भी छात्र को सफलता तक पहुंचाता है। साहित्य भवन की किताबों और कमजोर यूनिट्स पर अतिरिक्त मेहनत के दम पर जेआरएफ हासिल करने के बाद, अब उनकी दिली इच्छा डेवलपमेंटल स्टडीज के क्षेत्र में आगे शोध कार्य करने की है।



















