झारखंड के कोडरमा में सिलाई के पारंपरिक हुनर और बारीकी की मिसाल बनी एक दुकान ने एक सदी से भी लंबा सफर पूरा कर लिया है। वर्ष 1919 में शुरू हुआ यह सिलाई कारोबार आज अपने पांचवें दौर में पहुंच चुका है, जिसकी साख स्थानीय इलाके से निकलकर दक्षिण भारत के शहरों तक फैल गई है। आधुनिक दौर में जब रेडीमेड कपड़ों का बाजार हर तरफ छाया हुआ है, तब भी कस्टम फिटिंग और कपड़े की गुणवत्ता के दम पर यह प्रतिष्ठान ग्राहकों का अटूट भरोसा हासिल किए हुए है।
1919 से लेकर अब तक: पांच पीढ़ियों की विरासत
इस कारोबार की नींव तफज्जुल खलीफा ने रखी थी, जिन्होंने 1919 में तफज्जुल टेलर नाम से इस दुकान को शुरू किया था। उस दौर में सिलाई मशीनें आम तौर पर उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए वे पूरी तरह सुई-धागे के सहारे हाथ से ही लोगों के कपड़े सिला करते थे। उनके बाद परिवार की अगली पीढ़ी के वाहिद खलीफा ने दुकान का जिम्मा संभाला और काम को नई गति दी। समय के साथ जब मशीनें चलन में आईं, तब तीसरी पीढ़ी के अब्दुल रशीद ने कारोबार को संभाला और दुकान का नाम बदलकर चोला टेलर रख दिया। उनके समय में मशीनी सिलाई का नियमित उपयोग होने लगा था।
साल 2006 में इस पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाने की बागडोर परवेज आलम के हाथों में आई। परवेज आलम ने आधुनिक ग्राहकों की नब्ज पहचानते हुए दुकान को नया स्वरूप दिया और इसका नाम परफेक्ट टेलर रखा। दुकान का नाम बदलने के साथ ही उन्होंने काम की बारीकी और आधुनिकता का तालमेल बैठाया, जिससे पुरानी विरासत नए दौर के अनुकूल ढल गई।
सिलाई दरों का बदलाव और ऑनलाइन फैशन का असर
साल 2006 और मौजूदा दौर के बीच सिलाई के खर्च में भारी अंतर आया है। वर्ष 2006 के समय शर्ट की सिलाई के लिए 60 रुपये, पैंट सिलवाने के लिए 110 रुपये, सफारी सूट के लिए 275 रुपये और पूरे कोट-पैंट के लिए लगभग 1500 रुपये लिए जाते थे। वहीं आज के समय में शर्ट-पैंट की सिलाई का शुल्क बढ़कर करीब 1000 रुपये हो चुका है, जबकि सूट तैयार कराने का शुल्क लगभग 4500 रुपये तक पहुंच गया है।
आज की पीढ़ी के ग्राहक इंटरनेट और मोबाइल फोन पर पसंद किए गए नए डिजाइन लेकर दुकान पर आते हैं। कारीगर इन ऑनलाइन डिजाइनों को देखकर ग्राहकों की पसंद के मुताबिक कपड़े तैयार करते हैं। इसके अलावा कई लोग महंगे ब्रांडेड कपड़े खरीदने के बाद भी सही नाप और खिंचाव रहित बनावट के लिए यहां पहुंचते हैं। हर व्यक्ति के शरीर की बनावट, लंबाई और चौड़ाई अलग होती है, जिसकी वजह से बड़े ब्रांड्स के रेडीमेड कपड़े हर किसी पर सही नहीं बैठते। इसी कारण मनचाही फिटिंग चाहने वाले लोग टेलर के पास आना पसंद करते हैं।
बेंगलुरु तक फैला दायरा और काम का खास तरीका
दुकान की साख सिर्फ कोडरमा शहर तक सीमित नहीं रही है। गिरिडीह, हजारीबाग और बरकट्ठा जैसे नजदीकी क्षेत्रों के साथ-साथ दूरदराज के इलाकों से भी लोग यहां कपड़े बनवाने आते हैं। कोडरमा का एक निवासी, जो कई वर्षों से बेंगलुरु में रह रहा है, वह भी अपने कपड़े सिलवाने के लिए कूरियर सेवा का सहारा लेता है। वह बेंगलुरु से कपड़ा कूरियर के जरिए कोडरमा भेजता है, जहां सही नाप और फिटिंग के साथ सिलाई पूरी होने के बाद कपड़े दोबारा कूरियर से बेंगलुरु पहुंचा दिए जाते हैं।
सिलाई शुरू करने से पहले कपड़े की गुणवत्ता का कड़ा ध्यान रखा जाता है। दुकान पर कपड़ा आते ही सबसे पहले उसे अच्छी तरह धोया जाता है। धुलाई के बाद जब कपड़ा पूरी तरह सूख जाता है, तब जाकर उसकी कटिंग और सिलाई की प्रक्रिया शुरू होती है। तकनीक और सिलाई शैलियों में बदलाव आने के बावजूद ग्राहकों का विश्वास बनाए रखना इस पांच पीढ़ियों पुराने सफर का सबसे बड़ा आधार है।


















