जब भी युवा विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल करने का विचार करते हैं, तो अमेरिका, ब्रिटेन या कनाडा के भारी-भरकम बजट और लाखों-करोड़ों रुपये की फीस का ख्याल सबसे पहले आता है। हालांकि, यूरोप के भीतर एक ऐसा प्रमुख देश मौजूद है जहाँ के शैक्षणिक संस्थान वैश्विक स्तर पर शीर्ष पायदान पर शुमार हैं और शिक्षा का वित्तीय बोझ नगण्य के बराबर है। यह देश जर्मनी है, जो वर्तमान समय में भारतीय विद्यार्थियों के बीच उच्च अध्ययन के लिए एक बेहद आकर्षक ठिकाना बनता जा रहा है।
इसके बावजूद, लोगों के मन में यह उलझन पैदा होना स्वाभाविक है कि कोई राष्ट्र इतनी उच्च कोटि की शिक्षा व्यावहारिक रूप से मुफ्त में कैसे उपलब्ध करा सकता है। क्या इसके पीछे कोई छिपी हुई शर्तें जुड़ी हैं, या फिर यह वाकई में छात्रों की आर्थिक स्थिति पर भारी नहीं पड़ता है? क्या अन्य देशों से आने वाले विद्यार्थी भी इस मुफ्त या बेहद कम शुल्क वाली शिक्षा प्रणाली का लाभ उठा सकते हैं? यदि आप भी विदेश जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करने की योजना बना रहे हैं, तो यह जानना जरूरी है कि जर्मनी में शिक्षा इतनी किफायती क्यों है और वहाँ कौन से विषय सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं।
जर्मनी में शिक्षा इतनी सस्ती होने के मुख्य कारण
जर्मनी में अध्ययन को किफायती बनाने के पीछे वहाँ की सरकारी नीतियां मुख्य भूमिका निभाती हैं। जर्मन सरकार का बुनियादी दृष्टिकोण यह है कि पढ़ाई कोई व्यावसायिक वस्तु नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का एक मौलिक अधिकार होना चाहिए।
इसी नीति के तहत, वर्ष 2014 में सरकार ने देश की सभी पब्लिक यूनिवर्सिटीज से ट्यूशन फीस को पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। इन संस्थानों के संचालन का संपूर्ण वित्तीय खर्च सरकार अपने टैक्स संग्रह के माध्यम से वहन करती है। सबसे खास बात यह है कि इस सुविधा का लाभ केवल स्थानीय नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया से आने वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए भी पढ़ाई पूरी तरह मुफ्त या मात्र मामूली सेमेस्टर शुल्कों पर उपलब्ध है।
सरकार की इस नीति के पीछे की मंशा
जर्मनी की आबादी में बुजुर्गों का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है और देश की औद्योगिक व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए बड़ी संख्या में युवा एवं कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता है। सरकार विदेशी छात्रों को मुफ्त शिक्षा देकर अपने यहाँ आकर्षित करती है और बाद में उन्हें देश में ही रोकती है। शिक्षा पूरी होने के बाद अधिकांश छात्र स्थानीय स्तर पर रोजगार प्राप्त कर लेते हैं और टैक्स चुकाकर सरकार के शुरुआती निवेश की भरपाई कर देते हैं।
भारतीय विद्यार्थियों की पसंद और प्रमुख पाठ्यक्रम
जर्मनी को दुनिया भर में इंजीनियरिंग का गढ़ माना जाता है, यही वजह है कि भारत से जाने वाले अधिकांश युवा विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM क्षेत्रों से जुड़े पाठ्यक्रमों का चुनाव करते हैं।
जर्मनी में बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज और ऑडी जैसी दिग्गज कार निर्माता कंपनियां मौजूद हैं, जिसके कारण मैकेनिकल और ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के लिए यह देश युवाओं की पहली पसंद बना हुआ है। इसके अलावा, सॉफ्टवेयर विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस से जुड़े कंप्यूटर साइंस पाठ्यक्रमों की भी भारी मांग है। इंटरनेशनल बिजनेस और फाइनेंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने के लिए भी भारी संख्या में विद्यार्थी वहाँ का रुख करते हैं। इसके साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन एनर्जी से जुड़े नए शोध पाठ्यक्रम भी भारतीय युवाओं को अपनी ओर खींच रहे हैं。
रहने-खाने का खर्च और वित्तीय प्रबंधन
यद्यपि जर्मनी में ट्यूशन फीस पूरी तरह से माफ है, तथापि छात्रों को अपने जीवनयापन और दैनिक खर्चों का प्रबंध स्वयं करना पड़ता है। आवास का किराया, भोजन, स्वास्थ्य बीमा और यात्रा के साधनों पर कुल मिलाकर प्रति माह लगभग 800 से 1000 यूरो यानी लगभग 75,000 से 90,000 रुपये का खर्च आ जाता है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए विद्यार्थियों को अपने ब्लॉक्ड अकाउंट में एक निश्चित धनराशि जमा करानी पड़ती है। हालांकि, छात्र पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट-टाइम नौकरियां करके इन खर्चों को आसानी से संभाल लेते हैं।



















