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कक्षा छह पर तीन भाषाएं थोपना ठीक नहीं, सुप्रीम कोर्ट की सीबीएसई को दो साल की मोहलत देने की सलाहकरियर
17 सित॰ 2026, 9:40 pm (41 दिन पहले)· 3

कक्षा छह पर तीन भाषाएं थोपना ठीक नहीं, सुप्रीम कोर्ट की सीबीएसई को दो साल की मोहलत देने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई को निर्देश दिया है कि कक्षा छह के बच्चों पर अचानक तीन भाषाएं लागू करने की जिद न छोड़ी जाए और इसे साल 2027 तक टाला जाए। अदालत ने साफ कहा कि मासूम छात्रों पर बिना तैयारी के नया पाठ्यक्रम लादना मानसिक तनाव पैदा कर सकता है।

नई दिल्ली में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के एक बड़े फैसले पर सुनवाई करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत ने लाखों स्कूली छात्रों और उनके अभिवावकों को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा छह के स्तर पर दो भारतीय भाषाओं समेत कुल तीन भाषाएं अनिवार्य रूप से पढ़ने की नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इस बेंच में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे, जिन्होंने बोर्ड को यह साफ सलाह दी कि इस नई नीति को साल 2027 से लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। अदालत की इस टिप्पणी के बाद उन परिवारों ने चैन की सांस ली है जो अपने नौनिहालों के शैक्षणिक भविष्य को लेकर खासे चिंतित थे।

छात्रों के मानसिक दबाव पर अदालत की सख्त चिंता

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट का रुख पूरी तरह से मानवीय और व्यावहारिक नजर आया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह मामला केवल कानूनी दांवपेंच का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर छोटे बच्चों और उनके परिवारों की रोजमर्रा की मानसिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। बेंच के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कक्षा छह के कच्ची उम्र के छात्रों पर अचानक किसी नई भाषा को लादना कतई उचित नहीं है। बोर्ड को इस बात का अहसास होना चाहिए कि रातों-रात नया सिलेबस थोपने से बच्चे गहरे मानसिक दबाव और असमंजस में आ जाते हैं। अदालत ने यह कड़ा संदेश दिया कि जब तक पूरी बुनियादी तैयारी न हो जाए, तब तक बच्चों को इस तरह के भारी बदलावों से दूर रखा जाना चाहिए।

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राजधानी दिल्ली और एनसीआर समेत देश के तमाम हिस्सों में चल रहे कई स्कूलों में छात्र पहले से ही फ्रेंच और जर्मन जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ रहे थे। लेकिन इस नए आदेश के बाद शैक्षणिक सत्र के बीच में ही स्कूलों ने अचानक इन विदेशी भाषाओं की पढ़ाई पर रोक लगा दी। छात्रों को बिना किसी पूर्व तैयारी के संस्कृत या फिर अन्य भारतीय भाषाओं को चुनने के लिए मजबूर किया जाने लगा। इस मनमाने तरीके से लिए गए फैसले के कारण बच्चों और उनके अभिभावकों के भीतर भारी नाराजगी फैल गई। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि इस अचानक उठाए गए कदम ने सीधे तौर पर बच्चों के मौलिक अधिकारों पर गहरा आघात किया है।

सीबीएसई के अधिकार क्षेत्र और नियमों पर कानूनी बहस

अदालत की चौखट पर यह अहम सवाल भी उठाया गया कि क्या सीबीएसई के पास इस तरह से अचानक नियम और पाठ्यक्रम बदलने का कानूनी अधिकार था भी या नहीं। शिक्षा का अधिकार कानून की धारा 29 का हवाला देते हुए यह बात रखी गई कि स्कूली पाठ्यक्रम तय करने का मुख्य अधिकार मुख्य रूप से एनसीईआरटी के पास होता है। दायर याचिकाओं में यह दावा मजबूती के साथ किया गया कि सीबीएसई ने अपने तयशुदा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह नया नियम स्कूली बच्चों पर थोप दिया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह आश्वासन दिया कि वह इस पूरे मामले के तमाम कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की बेहद गहराई से जांच करेगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि स्वदेशी और विदेशी भाषा के बीच के अंतर पर अभी बहुत कुछ विचार किया जाना बाकी है।

योग्य शिक्षकों और पुस्तकों की उपलब्धता पर जोर

सर्वोच्च अदालत ने सीबीएसई को नसीहत दी कि कक्षा छह के इन छोटे बच्चों को भी वैसी ही छूट मिलने की आवश्यकता है जैसी उच्च कक्षाओं के छात्रों को दी जाती है। यदि कोई छात्र अपनी खुद की मर्जी से तीन भाषाएं पढ़ने की इच्छा रखता है, तो उसे इसकी पूरी छूट दी जा सकती है, लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। जमीनी हकीकत पर गहरी बात रखते हुए अदालत ने कहा कि इस प्रकार की किसी भी नई नीति को जमीन पर उतारने से पहले स्कूलों में योग्य शिक्षकों और पर्याप्त किताबों की उपलब्धता की जांच करना बेहद जरूरी है। इस पूरी सुनवाई के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि बोर्ड इस पूरे विषय पर जल्द ही एक नया और स्पष्ट नोट अदालत के समक्ष पेश करेगा। अदालत में इस पक्ष को रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि बोर्ड इस सुझाव पर पूरी गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ विचार करेगा।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई की किस नीति पर सवाल उठाए हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा छह के छात्रों के लिए दो भारतीय भाषाओं समेत तीन भाषाएं अनिवार्य करने की नीति पर सवाल उठाए हैं।
अदालत ने इस नीति को कब तक लागू करने का सुझाव दिया है?
अदालत ने बोर्ड से कहा है कि इस नीति को साल 2027 से लागू करने पर विचार किया जाए।
इस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ में कौन-कौन शामिल था?
इस पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे।
अदालत ने छात्रों के संबंध में क्या मुख्य चिंता जताई?
अदालत ने कहा कि मासूम बच्चों पर अचानक नई भाषा थोपने से उन पर गहरा मानसिक दबाव और तनाव पैदा होता है।
बोर्ड की तरफ से अदालत में किसने पक्ष रखा?
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि बोर्ड इस सुझाव पर पूरी गंभीरता से विचार करेगा।
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