भारत में उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक रूप से सबसे लोकप्रिय माने जाने वाले इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों से छात्रों का मोहभंग होता दिख रहा है। 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अधिकांश छात्रों की पहली पसंद बीटेक हुआ करती थी, लेकिन वर्तमान रुझान एक अलग ही तस्वीर बयां कर रहे हैं। तमिलनाडु इंजीनियरिंग एडमिशन (TNEA 2026) की दूसरी काउंसलिंग प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सामने आए आंकड़ों ने शिक्षाविदों और प्रशासनिक हलकों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। राज्य के इंजीनियरिंग संस्थानों में भारी संख्या में सीटें खाली पड़ी हैं, जो स्नातक स्तर की तकनीकी शिक्षा में आ रहे व्यापक बदलाव का संकेत देती हैं।
तमिलनाडु में खाली सीटों का आंकड़ा और कॉलेजों का हाल
तमिलनाडु में TNEA 2026 की काउंसलिंग के दूसरे चरण के समापन पर 1.06 लाख से अधिक बीटेक सीटें खाली रह गई हैं। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि राज्य के 23 इंजीनियरिंग कॉलेजों में एक भी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया है, जिससे वहां शून्य एडमिशन की स्थिति बनी हुई है। इसके अतिरिक्त, राज्य के 167 इंजीनियरिंग कॉलेजों की हालत इतनी दयनीय है कि वे अपनी कुल छात्र क्षमता का 10 प्रतिशत हिस्सा भी भरने में नाकाम रहे हैं। हालांकि आने वाले अगले दौर की काउंसलिंग में कुछ और सीटें भरने की उम्मीद जरूर जताई जा रही है, लेकिन दूसरे दौर तक इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना छात्रों के घटते भरोसे की ओर इशारा करता है।
कंप्यूटर साइंस और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी हॉट ब्रांचों में भी मंदी
तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में आमतौर पर कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग (CSE) और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (ECE) को सबसे अधिक मांग वाली शाखाएं माना जाता रहा है। इसके बावजूद, इस वर्ष तमिलनाडु की काउंसलिंग में इन लोकप्रिय विभागों में भी सीटें खाली रहने का अनूठा रुझान देखा गया है। दूसरे राउंड तक CSE ब्रांच में लगभग 17 हजार सीटें भरी जा सकीं, जबकि 19 हजार से अधिक सीटें अभी भी खाली पड़ी हुई हैं। इसी प्रकार, ECE ब्रांच में 12 हजार सीटों पर एडमिशन दर्ज किया गया, लेकिन 13 हजार से ज्यादा सीटें खाली रह गईं। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि छात्र अब केवल प्रचलित शाखा का नाम देखकर किसी भी संस्थान में दाखिला लेने के लिए तैयार नहीं हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर AICTE के 5 वर्षों के आंकड़े
इंजीनियरिंग में आ रही यह गिरावट केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में यही रुझान देखने को मिल रहा है। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के 5 वर्षों (2019 से 2024) के एकत्रित आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि के दौरान देश भर में बीटेक की 19 लाख से ज्यादा सीटें खाली पड़ी रह गईं। इन पांच सालों में कुल 64.9 लाख उपलब्ध सीटों पर प्रवेश का अवसर था, लेकिन केवल 45.5 लाख सीटों पर ही विद्यार्थियों ने दाखिला लिया। यह विशाल अंतर दर्शाता है कि देशव्यापी स्तर पर स्नातक तकनीकी शिक्षा की मांग में निरंतर गिरावट आ रही है।
बीटेक का क्रेज कम होने के प्रमुख कारण
इंजीनियरिंग के प्रति छात्रों की अरुचि के पीछे कई प्रमुख कारक काम कर रहे हैं। पहला मुख्य कारण शाखाओं का असमान चयन है। छात्र सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल जैसी पारंपरिक शाखाओं में जाने से बच रहे हैं और केवल CSE की तरफ रुख कर रहे हैं, जिससे अन्य विभाग पूरी तरह खाली रह जाते हैं। दूसरा बड़ा कारण प्लेसमेंट और बेरोजगारी का भय है। आंकड़े दिखाते हैं कि जहाँ CSE के 90 प्रतिशत से अधिक स्नातकों को आसानी से नौकरी मिल जाती है, वहीं सिविल और इलेक्ट्रिकल के मामले में यह प्लेसमेंट दर महज 40 से 50 प्रतिशत के आसपास ही सिमट कर रह जाती है।
तीसरा कारण बुनियादी सुविधाओं की कमी वाले कॉलेजों की बेतहाशा बढ़ोतरी है। 21वीं सदी की शुरुआत में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए जगह-जगह तकनीकी संस्थान खोल दिए गए, जिनमें से अधिकांश के पास न तो आधुनिक प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं, न ही कुशल प्राध्यापक और न ही उद्योग के अनुकूल पाठ्यक्रम। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से बढ़ता प्रभाव है। तकनीकी दुनिया और रोजगार बाजार में आ रहे बदलावों के कारण अब छात्र चार साल की पारंपरिक बीटेक डिग्री हासिल करने के बजाय आधुनिक तकनीकों पर आधारित शॉर्ट-टर्म कोर्सेज और स्किल डेवलपमेंट को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।



















