19 अगस्त 2026 को भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने जम्मू और कश्मीर का दौरा किया और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की। अपनी इस पहली यात्रा के दौरान अमेरिकी राजदूत ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि "जम्मू और कश्मीर भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैं यहां पहली बार आया हूं और यह बेहद खूबसूरत जगह है।" किसी शीर्ष अमेरिकी कूटनीतिज्ञ के इस प्रत्यक्ष बयान ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र में हलचल मचा दी है। पाकिस्तान की ओर से इस टिप्पणी पर अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया आई है। इस्लामाबाद ने अमेरिकी राजदूत के इस बयान को गैर जिम्मेदाराना करार दिया और दावा किया कि यह जम्मू और कश्मीर पर वाशिंगटन के लंबे समय से चले आ रहे आधिकारिक रुख के पूरी तरह विपरीत है।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अमेरिका वास्तव में कश्मीर मुद्दे पर भारत के ऐतिहासिक रुख के करीब आ गया है? क्या सर्जियो गोर की इस टिप्पणी के पीछे डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कोई बड़ा कूटनीतिक प्लान काम कर रहा है? और इस पूरे घटनाक्रम से भारत को दीर्घकालिक रूप से क्या लाभ या चुनौतियां मिल सकती हैं? इन सभी पहलुओं को समझने के लिए अमेरिका की ऐतिहासिक कश्मीर नीति, 1947 से लेकर वर्तमान समय तक के बदलावों और वैश्विक विश्लेषकों की राय का गहराई से अध्ययन करना आवश्यक है।
1947 से 1965: शीत युद्ध का दौर और पाकिस्तान का खुला अमेरिकी समर्थन
1947 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर पहला सैन्य संघर्ष शुरू हुआ, तब शुरुआती दिनों में अमेरिका का आधिकारिक रुख यही था कि दोनों पड़ोसी देशों को आपसी बातचीत से इस विवाद को सुलझाना चाहिए। हालांकि, जब यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर पहुंचा, तो अमेरिका और ब्रिटेन की कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव देखा गया। पश्चिमी शक्तियों ने इस क्षेत्र को एक विवादित भूभाग मानते हुए पाकिस्तान के रुख का समर्थन करना शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान लगातार जनमत संग्रह कराने की मांग उठाता रहा और वाशिंगटन ने इस मांग की खुलकर तरफदारी की।
1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के दौरान परिस्थितियां कुछ समय के लिए बदलीं। अमेरिका ने उस समय भारत को सैन्य सहायता प्रदान की, लेकिन इसके साथ ही उसने भारत पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान से वार्ता करने के लिए भारी कूटनीतिक दबाव भी बनाया। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच वार्ता के कुल 6 दौर आयोजित किए गए, लेकिन किसी ठोस समझौते पर सहमति नहीं बन सकी।
उस दौर में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान का पक्ष लेने का मुख्य कारण तत्कालीन वैश्विक शीत युद्ध की राजनीति थी। सोवियत संघ की विस्तारवादी नीतियों का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के लिए पाकिस्तान का भौगोलिक स्थान अत्यंत सामरिक महत्व रखता था। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर अमेरिकी खुफिया और सैन्य एजेंसियां अफगानिस्तान में सोवियत सैन्य गतिविधियों, चीन के सीमावर्ती क्षेत्रों और फारस की खाड़ी के नौसैनिक मार्गों पर कड़ी निगरानी रखने में सक्षम थीं। इसी रणनीतिक अनिवार्यता ने वाशिंगटन को दशकों तक इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े रहने के लिए प्रेरित किया।
1965 से 1972: वियतनाम युद्ध की व्यस्तता और शिमला समझौते के बाद का रुख
1955 से शुरू हुए वियतनाम संघर्ष में अमेरिका धीरे-धीरे उलझता चला गया और 1965 तक उसने वियतनाम की धरती पर अपनी जमीनी सेनाएं बड़ी संख्या में तैनात कर दीं। इस भीषण युद्ध में अपनी बढ़ती व्यस्तता के कारण अमेरिका ने दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय मामलों में अपनी प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की नीति को सीमित करना शुरू कर दिया। इस नीतिगत बदलाव का असर भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों पर भी पड़ा।
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 1972 में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक शिमला समझौता संपन्न हुआ। इस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि भारत और पाकिस्तान अपने सभी विवादों का समाधान बिना किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के, पूरी तरह से द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से करेंगे। इसके साथ ही दोनों देशों ने कश्मीर में नियंत्रण रेखा यानी एलओसी का सम्मान करने की प्रतिबद्धता जताई। अमेरिका ने शिमला समझौते के सिद्धांतों को स्वीकार किया और माना कि कश्मीर मूलतः एक द्विपक्षीय विषय है। इस ऐतिहासिक मोड़ के बाद वाशिंगटन ने जम्मू और कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में जनमत संग्रह की अपनी पुरानी मांग को दोहराना बंद कर दिया।
वर्ष 1999 में जब पाकिस्तान ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके युद्ध छेड़ा, तो अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने खुलकर पाकिस्तान की इस आक्रामक कार्रवाई की निंदा की और इस्लामाबाद को अपनी सेनाएं वापस बुलाने पर मजबूर किया। इसके बाद मार्च 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत की ऐतिहासिक 5 दिवसीय यात्रा की, जबकि वे पाकिस्तान में केवल कुछ ही घंटों के लिए रुके थे। अपनी इस यात्रा के दौरान क्लिंटन ने स्पष्ट रूप से घोषणा की थी कि वे कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने के इरादे से दक्षिण एशिया नहीं आए हैं। उन्होंने कहा था कि भारत और पाकिस्तान को स्वयं ही अपनी समस्याओं का समाधान खोजना होगा और यही संदेश वे जनरल परवेज़ मुशर्रफ को भी देंगे। इस घटनाक्रम के बाद से भारत और अमेरिका के संबंधों में एक नए रणनीतिक अध्याय की शुरुआत हुई और अमेरिकी नीति इसी बात पर कायम रही कि दोनों देशों को यह मुद्दा मिलकर सुलझाना चाहिए।
2019 का दौर: डोनाल्ड ट्रंप का मध्यस्थता का प्रस्ताव और आंतरिक मामले की स्वीकारोक्ति
जुलाई 2019 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वाशिंगटन में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ एक संयुक्त बैठक के दौरान अचानक यह बयान देकर सबको चौंका दिया कि यदि भारत और पाकिस्तान दोनों चाहें, तो वे कश्मीर विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं। भारत ने तुरंत और कड़े शब्दों में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और पुनः दोहराया कि कश्मीर पूरी तरह से भारत का द्विपक्षीय विषय है जिसमें किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
अगस्त 2019 में जब भारत सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया, तो अमेरिकी कांग्रेस की एक आधिकारिक दस्तावेज रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका का दीर्घकालिक रुख यही है कि दोनों देशों को कश्मीरी लोगों की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए सीधी बातचीत से इसका समाधान निकालना चाहिए। हालांकि, इसके तुरंत बाद 20 अगस्त 2019 को अमेरिकी रक्षा मंत्री टी. एस्पर और भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच एक महत्वपूर्ण टेलीफोनिक बातचीत हुई। इस चर्चा के दौरान अमेरिकी रक्षा मंत्री टी. एस्पर ने अमेरिकी सरकार की ओर से पहली बार औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि जम्मू और कश्मीर में किए गए हालिया बदलाव पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला हैं।
अब अगस्त 2026 में, अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया है कि जम्मू और कश्मीर भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वाशिंगटन की कूटनीतिक शब्दावली में इसे एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
कूटनीतिक विशेषज्ञ क्या मानते हैं? बंटे हुए विचारों का विश्लेषण
सर्जियो गोर की नियुक्ति और उनकी हालिया टिप्पणी को साधारण कूटनीतिक शिष्टाचार से अलग हटकर देखा जा रहा है। जनवरी 2026 में अपना पद संभालने के बाद से सर्जियो गोर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं। ट्रंप ने उन्हें न केवल भारत में अमेरिकी राजदूत के रूप में तैनात किया है, बल्कि उन्हें दक्षिण और मध्य एशिया के कुल 11 देशों के लिए विशेष दूत का प्रभार भी सौंपा है। इतने उच्च स्तर के कूटनीतिज्ञ द्वारा दिया गया बयान अंतरराष्ट्रीय हलकों में विशेष वजन रखता है। हालांकि, इस बयान के अर्थ और प्रभाव को लेकर वैश्विक विश्लेषकों और पूर्व कूटनीतिज्ञों की राय बंटी हुई है।
कई देशों में भारत के राजदूत के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके पूर्व वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ महेश सचदेव का मानना है कि सर्जियो गोर अमेरिकी विदेश मंत्रालय यानी स्टेट डिपार्टमेंट की पूर्व अनुमति के बिना श्रीनगर और जम्मू के दौरे पर कदापि नहीं आ सकते थे। महेश सचदेव के अनुसार, सर्जियो गोर का यह बयान शिमला समझौते, अनुच्छेद 370 या पाकिस्तान से जुड़े अन्य किसी विवादित विषय से सीधे तौर पर बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक स्वतंत्र और पूर्ण वक्तव्य है। इसे जम्मू और कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका की उभरती हुई नई नीति की एक स्पष्ट झलक के रूप में देखा जाना चाहिए। यद्यपि अगर वे यह कहते कि जम्मू और कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है, तो यह बयान और भी अधिक स्पष्ट होता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में ऐसे नीतिगत बदलाव धीरे-धीरे ही आकार लेते हैं।
इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में रणनीतिक अध्ययन के प्रोफेसर राजन कुमार का दृष्टिकोण अधिक सतर्कता भरा है। प्रोफेसर राजन कुमार का कहना है कि रूस जैसे पारंपरिक मित्र देश की तरह अमेरिका आज भी आधिकारिक तौर पर जम्मू और कश्मीर को भारत के क्षेत्र के रूप में औपचारिक मान्यता देने से बचता रहा है। चूंकि सर्जियो गोर अमेरिकी प्रशासन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर आसीन हैं, इसलिए अब यह देखना बेहद दिलचस्प और निर्णायक होगा कि क्या वाशिंगटन ने अपनी आधिकारिक विदेश नीति के दस्तावेजों में भी कोई स्थायी संशोधन किया है या नहीं।
जाने-माने रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी इस मामले में एक अलग और व्यावहारिक पहलू की ओर इशारा करते हैं। ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, अमेरिकी राजदूत अक्सर उन देशों की स्थानीय प्राथमिकताओं और जनभावनाओं के हिसाब से अपने बयानों की भाषा में बदलाव करते रहते हैं जहां वे तैनात होते हैं, परंतु अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की मूल नीति इतनी आसानी से नहीं बदलती। इस संदर्भ में वे 2022 के उस घटनाक्रम का उल्लेख करते हैं जब पाकिस्तान में तैनात तत्कालीन अमेरिकी राजदूत डोनाल्ड ब्लॉम ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) का दौरा किया था। वहां डोनाल्ड ब्लॉम ने पीओके को 'आजाद जम्मू और कश्मीर' कहकर संबोधित किया था और उसे पाकिस्तान की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक बताया था। उस समय भारत ने अमेरिकी राजदूत के इस बयान पर कड़ा कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया था क्योंकि इसे पाकिस्तान के अवैध कब्जे को अमेरिकी वैधता देने के प्रयास के रूप में देखा गया था। इसके अतिरिक्त, ब्रह्मा चेलानी का यह भी कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में कई मुद्दों पर तनाव देखा गया है, और सर्जियो गोर का यह कदम दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने और रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की एक कोशिश हो सकता है।
अंतिम उद्देश्य क्या है? अमेरिकी एजेंडे और व्यापारिक हितों का गणित
अमेरिकी भू-राजनीतिक रणनीतिकार अल मैसन का विश्लेषण बताता है कि वर्तमान समय में वैश्विक कूटनीति का मुख्य केंद्र इंडो-पैसिफिक यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र बन चुका है। इस विशाल और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत की भूमिका अत्यंत निर्णायक है। अल मैसन के अनुसार, इसी रणनीतिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सर्जियो गोर जैसे अपने विश्वस्त सहयोगी को नई दिल्ली भेजा है। ऐसे में जम्मू और कश्मीर को लेकर दिए गए उनके बयान को भारत के साथ संबंधों में नई गर्मजोशी लाने और रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ करने के अमेरिकी प्रयास के तौर पर देखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, भारतीय थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) के रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के उप निदेशक विवेक मिश्रा इस घटनाक्रम के पीछे अमेरिका के व्यावसायिक और आर्थिक हितों को प्रमुख कारण मानते हैं। विवेक मिश्रा का विश्लेषण है कि सर्जियो गोर की प्राथमिक जिम्मेदारी अमेरिकी व्यापारिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना है। वाशिंगटन का मुख्य उद्देश्य भारतीय कंपनियों और उद्योगपतियों को अमेरिका में अधिक से अधिक निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करना है। हाल ही में भारतीय कंपनियों ने अमेरिका में 20 अरब डॉलर के भारी-भरकम निवेश की घोषणाएं की हैं। इसके साथ ही सर्जियो गोर की कोशिश यह भी है कि भारत और अमेरिका के बीच जल्द से जल्द एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता यानी ट्रेड डील रंग लाए, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था और कंपनियों को अधिकतम लाभ मिल सके।
भारत के लिए इस बयान के मायने और व्यावहारिक लाभ
यद्यपि सर्जियो गोर की यह टिप्पणी अभी वाशिंगटन की लिखित और आधिकारिक विदेश नीति के रूप में दर्ज नहीं हुई है, फिर भी कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर जो संदेश गया है, वह भारत के रणनीतिक पक्ष को मजबूत करता है। भारतीय थल सेना के सेवानिवृत्त कैप्टन अनिल गौर का कहना है कि अमेरिकी राजदूत के इस बयान ने उस धरातलीय सच्चाई पर मुहर लगा दी है कि आज पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में भारी असंतोष और अशांति फैली हुई है। वहां के आम नागरिक अब पाकिस्तान के शासन से तंग आ चुके हैं और भारत के साथ एकीकृत होने की इच्छा रखते हैं।
इसी क्रम में रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सरीन का मानना है कि सर्जियो गोर का यह बयान भारत के लिए एक बेहद सकारात्मक और अच्छी खबर है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमेरिका सहित दुनिया के प्रमुख देश अब इस अकाट्य वास्तविकता को स्वीकार करने लगे हैं कि कश्मीर भारत का एक अटूट और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
हालांकि, ब्रह्मा चेलानी इस मामले में एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी जोड़ते हैं। उनका कहना है कि किसी देश के कथनी और करनी के बीच हमेशा अंतर होता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीमा पार से होने वाले आतंकवाद और भारत के सैन्य अभियानों जैसे 'ऑपरेशन सिंदूर' के मूल कारणों पर अब तक चुप्पी साध रखी है। इसके विपरीत, वे लगातार कश्मीर को दोनों देशों के बीच विवाद का मुख्य मुद्दा बताते रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि पाकिस्तान इसी कश्मीर विवाद की आड़ लेकर भारत के खिलाफ अपने प्रायोजित आतंकवादी अभियानों को सही ठहराने की कोशिश करता है। इसलिए भारत को केवल बयानों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका के वास्तविक नीतिगत कदमों पर कड़ी नजर रखनी होगी।



















