बस्तर दशहरा: दौलत नाग 600 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए 4 फीट गहरे गड्ढे में शुरू करेंगे नौ दिन की कठोर तपस्यात्योहारों के मौसम में भी देहरादून के सर्राफा बाजार में सुस्ती, सोने-चांदी से क्यों दूर हो रहे हैं ग्राहकउत्तर भाद्रपद में शनि के 114 दिन के गोचर से वृषभ, मिथुन, तुला, मकर और कुंभ राशि को धन और करियर में बड़ा लाभफरीदाबाद में बेमौसम बारिश से टूटे रावण बनाने वाले कारीगरों के सपने, हजारों का नुकसानत्योहारों पर जयपुर जंक्शन पर उमड़ी भीड़, यूपी-बिहार के यात्रियों के लिए रेलवे का खास इंतजामसार्वजनिक बैंकों की सेहत पर विपक्ष के हमलों के बीच वित्त मंत्रालय का बड़ा दावा, सालभर में हुआ ₹2 लाख करोड़ का मुनाफाबिहार के रोहतास में बनता है खास पनीर खुरमा, झारखंड और छत्तीसगढ़ तक है डिमांडअरुणाचल प्रदेश के चांगलांग में महिला गिरफ्तार, 20 लाख रुपये की हेरोइन बरामदअंबाला में नवरात्रि की अष्टमी और नवमी को लेकर असमंजस, राजकुमार शर्मा ने बताई सही तिथिमालेगांव में टीपू के समर्थन वाले नारों पर गरमाई सियासत, विजय वडेट्टीवार के बयान से आमने-सामने आए दल
बस्तर दशहरा: दौलत नाग 600 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए 4 फीट गहरे गड्ढे में शुरू करेंगे नौ दिन की कठोर तपस्याछत्तीसगढ़
17 अक्तू॰ 2026, 6:04 pm (6 मिनट पहले)· 1

बस्तर दशहरा: दौलत नाग 600 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए 4 फीट गहरे गड्ढे में शुरू करेंगे नौ दिन की कठोर तपस्या

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध बस्तर दशहरे में जोगी बिठाई की प्राचीन परंपरा शुरू हो गई है। बड़े आमाबाल गांव के दौलत नाग लगातार तीसरी बार नौ दिनों के निर्जल व्रत और कठिन साधना के लिए गड्ढे में बैठे हैं।

दुनियाभर में अपनी अनूठी संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले 75 दिवसीय बस्तर दशहरे की शुरुआत हो चुकी है। इस दौरान कई ऐसी प्राचीन रस्में निभाई जाती हैं, जो इस आयोजन को बेहद खास बनाती हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख रस्म जोगी बिठाई है, जिसके जरिए बस्तर दशहरे के बिना किसी बाधा और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने की कामना की जाती है। इस अहम जिम्मेदारी को निभाते हुए बस्तर के बड़े आमाबाल गांव के रहने वाले युवक दौलत नाग लगातार तीसरी बार नौ दिनों की कठिन तपस्या पर बैठ गए हैं।

स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष परंपरा को निभाने के लिए हल्बा जनजाति के युवाओं को चुना जाता है, जो जोगी की भूमिका निभाते हुए नौ दिनों तक कठोर साधना करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सबसे पहले मावली मंदिर में विधि-विधान से दीप प्रज्ज्वलित करके देवी की पूजा-अर्चना के साथ की जाती है। इसके बाद एक पवित्र तलवार का पूजन किया जाता है। पूजा-पाठ का यह दौर पूरा होने के बाद, जोगी इस पवित्र तलवार को धारण करते हैं और पारंपरिक मुंडाबाजा तथा गाजे-बाजे की गूंज के बीच सिरहासार भवन पहुंचते हैं, जहां जोगी बिठाई की मुख्य रस्म को अंजाम दिया जाता है।

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सिरहासार भवन पहुंचने के बाद विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं और फिर दौलत नाग ने वहां पहले से तैयार किए गए लगभग चार फीट गहरे गड्ढे में उतरकर पालथी मारकर अपना आसन ग्रहण किया। इसी के साथ उन्होंने अगले नौ दिनों तक चलने वाली अपनी कठिन साधना और निराहार व्रत का संकल्प ले लिया है। इस पूरी तपस्या के दौरान वे क्षेत्र की खुशहाली, सुख-समृद्धि, शांति और बस्तर दशहरे के बिना किसी विघ्न के सकुशल समापन के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे।

अपनी इस परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए दौलत नाग ने बताया कि उनके पूर्वजों को यह ऐतिहासिक दायित्व मिला था, जिसे उनका परिवार आज भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। इस पूरी अनुष्ठान का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के संपन्न हो और पूरे क्षेत्र में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहे। जोगी बिठाई की यह अनूठी परंपरा बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, गहरी आस्था और अटूट परंपराओं का जीवंत प्रतीक मानी जाती है, जिसे देखने और इसके गवाह बनने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

सवाल-जवाब

बस्तर दशहरा कितने दिनों तक चलता है?
बस्तर दशहरा दुनिया भर में अपने 75 दिनों के लंबे आयोजन के लिए प्रसिद्ध है।
जोगी बिठाई की परंपरा कितने साल पुरानी है?
जोगी बिठाई की यह ऐतिहासिक परंपरा करीब 600 साल पुरानी है।
दौलत नाग कौन सी बार तपस्या पर बैठे हैं?
बड़े आमाबाल गांव के रहने वाले दौलत नाग लगातार तीसरी बार इस कठिन तपस्या पर बैठे हैं।
जोगी किस गड्ढे में बैठकर साधना करते हैं?
जोगी सिरहासार भवन में बनाए गए करीब चार फीट गहरे गड्ढे में पालथी मारकर साधना करते हैं।
इस परंपरा को कौन सी जनजाति के युवक निभाते हैं?
इस परंपरा के तहत हल्बा जनजाति के युवक जोगी के रूप में बैठकर नौ दिनों तक तपस्या करते हैं।
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