दुनियाभर में अपनी अनूठी संस्कृति के लिए पहचाने जाने वाले 75 दिवसीय बस्तर दशहरे की शुरुआत हो चुकी है। इस दौरान कई ऐसी प्राचीन रस्में निभाई जाती हैं, जो इस आयोजन को बेहद खास बनाती हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक प्रमुख रस्म जोगी बिठाई है, जिसके जरिए बस्तर दशहरे के बिना किसी बाधा और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होने की कामना की जाती है। इस अहम जिम्मेदारी को निभाते हुए बस्तर के बड़े आमाबाल गांव के रहने वाले युवक दौलत नाग लगातार तीसरी बार नौ दिनों की कठिन तपस्या पर बैठ गए हैं।
स्थानीय संस्कृति और मान्यताओं के अनुसार, इस विशेष परंपरा को निभाने के लिए हल्बा जनजाति के युवाओं को चुना जाता है, जो जोगी की भूमिका निभाते हुए नौ दिनों तक कठोर साधना करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सबसे पहले मावली मंदिर में विधि-विधान से दीप प्रज्ज्वलित करके देवी की पूजा-अर्चना के साथ की जाती है। इसके बाद एक पवित्र तलवार का पूजन किया जाता है। पूजा-पाठ का यह दौर पूरा होने के बाद, जोगी इस पवित्र तलवार को धारण करते हैं और पारंपरिक मुंडाबाजा तथा गाजे-बाजे की गूंज के बीच सिरहासार भवन पहुंचते हैं, जहां जोगी बिठाई की मुख्य रस्म को अंजाम दिया जाता है।
सिरहासार भवन पहुंचने के बाद विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं और फिर दौलत नाग ने वहां पहले से तैयार किए गए लगभग चार फीट गहरे गड्ढे में उतरकर पालथी मारकर अपना आसन ग्रहण किया। इसी के साथ उन्होंने अगले नौ दिनों तक चलने वाली अपनी कठिन साधना और निराहार व्रत का संकल्प ले लिया है। इस पूरी तपस्या के दौरान वे क्षेत्र की खुशहाली, सुख-समृद्धि, शांति और बस्तर दशहरे के बिना किसी विघ्न के सकुशल समापन के लिए ईश्वर से प्रार्थना करेंगे।
अपनी इस परंपरा के बारे में जानकारी देते हुए दौलत नाग ने बताया कि उनके पूर्वजों को यह ऐतिहासिक दायित्व मिला था, जिसे उनका परिवार आज भी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। इस पूरी अनुष्ठान का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि बस्तर दशहरा बिना किसी बाधा के संपन्न हो और पूरे क्षेत्र में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहे। जोगी बिठाई की यह अनूठी परंपरा बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, गहरी आस्था और अटूट परंपराओं का जीवंत प्रतीक मानी जाती है, जिसे देखने और इसके गवाह बनने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।



















