पूरे देश में शारदीय नवरात्र के मौके पर कलश स्थापना के साथ देवी आराधना का दौर शुरू हो जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में अलग-अलग कलात्मक थीम पर बने पूजा पंडाल मुख्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। पश्चिम बंगाल और झारखंड के साथ-साथ बिहार के विभिन्न शहरों और कस्बों में भी दुर्गा पूजा की भव्य छटा देखने को मिलती है। सामान्य तौर पर नवरात्र का मेला नौ दिनों तक चलता है और विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ यह उत्सव संपन्न हो जाता है। अधिकांश जगहों पर दशमी तिथि के साथ ही पूजा मेले की रौनक भी विदा ले लेती है।
विजयादशमी के अगले दिन एकादशी पर उमड़ती है भीड़
बिहार में एक ऐसा शहर भी है जहां की दुर्गा पूजा परंपरा बाकी सभी जगहों से बिल्कुल अलग पहचान रखती है। जब पूरे इलाके में विजयादशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन के साथ दुर्गा पूजा का उत्सव समाप्त हो जाता है, तब इस शहर में मेले की असली शुरुआत होती है। जहानाबाद जिले के अंतर्गत आने वाले घोसी बाजार में दशहरा मेला विजयादशमी के बजाय उसके अगले दिन यानी एकादशी को आयोजित किया जाता है। आजादी से पहले के दौर से चली आ रही इस व्यवस्था के कारण एकादशी के दिन पूरा बाजार उत्सव के रंग में डूब जाता है। इस अनोखे आयोजन का हिस्सा बनने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के अलावा पड़ोसी जिलों जैसे पटना, नालंदा और अरवल से भी हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं।
साल 1945 से लगातार जारी है यह ऐतिहासिक रिवाज
घोसी स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर के पुजारी योगेंद्र पांडे के अनुसार, पूरे राज्य में घोसी बाजार के दशहरा मेले की यह परंपरा अपने आप में बेहद अनूठी है। जब अन्य सभी इलाकों में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन पूरा हो जाता है, तब यहां अत्यंत भव्य स्तर पर मेले का आयोजन किया जाता है। पुजारी योगेंद्र पांडे ने बताया कि शहर में एकादशी के दिन मेला आयोजित करने का यह सिलसिला करीब 1945 से ही लगातार चला आ रहा है और समय के साथ इसका स्वरूप और भी विस्तृत होता गया है।
जमींदार के अहाते से शुरू होकर भव्य मंदिर तक का सफर
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत के ऐतिहासिक पहलू पर प्रकाश डालते हुए पुजारी योगेंद्र पांडे ने बताया कि एक दौर में जब इस शहर की आबादी काफी कम थी, तब गांव के तत्कालीन जमींदार जगन्नाथ बाबू के परिसर में दुर्गा पूजा आयोजित की जाती थी। उस दौर में स्थानीय लोग पूरे दस दिनों तक पूरी निष्ठा के साथ पूजा-पाठ के धार्मिक अनुष्ठानों में व्यस्त रहते थे। इसके चलते सभी लोग विजयादशमी बीत जाने के बाद एकादशी की तिथि पर ही मेले में घूमने और आनंद लेने के लिए जमा होते थे। धीरे-धीरे लोगों के इसी सामूहिक जुड़ाव ने एक नियमित प्रथा का रूप ले लिया। बाद के वर्षों में दान में मिली भूमि पर एक स्थायी मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसे आज बड़ी मां दुर्गा मंदिर के रूप में जाना जाता है, और गोपालगंज बाजार के इसी परिसर में नियमित पूजा-अर्चना और एकादशी मेले का भव्य आयोजन होने लगा।


















