छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस समय शिक्षकों की भारी कमी और जर्जर बुनियादी ढांचे के गहरे संकट से जूझ रही है। राज्य भर के सरकारी विद्यालयों में खाली पड़े पदों की वजह से शिक्षण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, जिसका सीधा असर वहां पढ़ने वाले लाखों विद्यार्थियों के भविष्य और उनकी उच्च शिक्षा की योजनाओं पर पड़ रहा है। प्रशासनिक सुस्ती और नीतिगत कमियों के चलते कई विद्यालयों में अनिवार्य विषयों की कक्षाएं तक संचालित नहीं हो पा रही हैं।
गणित के पाठ्यक्रम बंद, कृषि के शिक्षक पढ़ा रहे तकनीकी विषय
इंजीनियरिंग और विज्ञान के क्षेत्र में भविष्य तलाशने वाले छात्रों को सरकारी विद्यालयों में विषय विशेषज्ञ शिक्षक नहीं मिल पा रहे हैं। कई प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं में बीते तीन वर्षों से अधिक समय से शिक्षकों की रिक्तियां बनी हुई हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि शिक्षकों के अभाव में विद्यार्थियों को अपनी पसंद के विषय छोड़ने पड़ रहे हैं। कई संस्थानों में गणित की कक्षाएं पूरी तरह बंद कर दी गई हैं, जिससे छात्रों को मजबूरी में दूसरे वैकल्पिक विषय चुनने पड़ रहे हैं।
कुछ विद्यालयों में विडंबना यह है कि कृषि पृष्ठभूमि वाले शिक्षक विद्यार्थियों को सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी की पढ़ाई करवा रहे हैं। हैरानी की बात यह भी है कि जिन कक्षाओं में कंप्यूटर तक उपलब्ध नहीं हैं, वहां छात्र तकनीकी विषयों की थ्योरी पढ़ने को विवश हैं। ऐसी परिस्थितियों में दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों के पास खुद से पढ़ाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। उचित मार्गदर्शन न मिलने से कई छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी है, जबकि कुछ ने अपने पसंदीदा विषय बदल लिए हैं।
आंकड़ों की जुबानी: 36 लाख से अधिक छात्र और 50,472 रिक्त पद
राज्य के सार्वजनिक शिक्षा तंत्र का आकार बेहद विशाल है, लेकिन संसाधनों का आवंटन उसी अनुपात में कमजोर नजर आता है। पूरे प्रदेश में 38,256 से अधिक सरकारी स्कूल संचालित हैं, जहां कुल 36 लाख से अधिक बच्चे नामांकित हैं। इन स्कूलों को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्वीकृत पदों में से 50,472 शिक्षकों के पद खाली पड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, बुनियादी स्तर पर बच्चों को तैयार करने वाले 30,172 सहायक शिक्षकों की भी भारी कमी बनी हुई है।
शिक्षकों की कमी के साथ-साथ विद्यालयों का ढांचागत संकट भी चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका है। कई क्षेत्रों में बच्चे जर्जर और असुरक्षित भवनों में बैठकर पढ़ाई करने के लिए मजबूर हैं। बरसात के मौसम में कक्षाओं की छतों से लगातार पानी टपकता है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव विद्यार्थियों की दैनिक उपस्थिति और सीखने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
प्रशासनिक व्यवस्था और सरकार की भर्ती योजना
शिक्षा विभाग के अधिकारी भी इस जमीनी हकीकत को स्वीकार कर रहे हैं। रायपुर जिला शिक्षा अधिकारी सतीश कुमार के अनुसार, शिक्षकों के खाली पदों का सीधा असर विद्यालयों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर दिखाई दे रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान में अलग-अलग स्कूलों में स्थानीय तालमेल और समायोजन के जरिए कक्षाओं का संचालन किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस तरह के कामचलाऊ इंतजाम लंबे समय तक नहीं चलने चाहिए और शिक्षकों की स्थाई नियुक्ति बेहद आवश्यक है।
दूसरी ओर, शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए शासन स्तर पर कदम उठाने की बात कही जा रही है। शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने बताया कि जिन-जिन क्षेत्रों और स्कूलों में शिक्षकों की अनुपलब्धता है, वहां से पूरा ब्योरा तलब किया गया है। इसके साथ ही उन्होंने जानकारी दी कि वर्तमान में 5 हजार शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया जारी है, जिससे कुछ हद तक शिक्षकों की कमी को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।



















