ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच बहने वाली महानदी के प्रवाह, उसके प्रबंधन और हिस्सेदारी को लेकर दशकों पुराना तनाव अब आपसी बातचीत के रास्ते सुलझने की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। दोनों पड़ोसी प्रांतों के शीर्ष नेतृत्व ने इस जटिल अंतरराज्यीय मामले में सकारात्मक रुख दिखाया है। भुवनेश्वर की धरती पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय तथा ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के बीच हाल ही में संपन्न हुई उच्चस्तरीय वार्ता के बाद दोनों पक्षों ने इस संवेदनशील मसले का परस्पर स्वीकार्य हल खोजने का भरोसा जताया है। केंद्र सरकार की मध्यस्थता में चल रही इस प्रक्रिया से यह उम्मीद बंधी है कि लंबे समय से न्यायालयों और समितियों में उलझा यह जल संकट अब बातचीत से खत्म हो सकेगा।
नदी के बहाव और हक को लेकर दोनों राज्यों का पुराना मतभेद
यह विवाद केवल पानी की सामान्य आपूर्ति का नहीं, बल्कि ऊपरी और निचले तटीय राज्यों के बीच प्राकृतिक संसाधनों पर प्राथमिक नियंत्रण और जिम्मेदारी से जुड़ा एक बेहद जटिल ढांचागत प्रश्न है। महानदी का बड़ा प्रवाह क्षेत्र पहले छत्तीसगढ़ की सीमाओं से होकर निकलता है, जिसके बाद नदी ओडिशा की सीमाओं में प्रवेश करती है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण ऊपरी क्षेत्र में होने वाले किसी भी तरह के बुनियादी ढांचे के निर्माण, बैराज या पानी को दूसरी दिशा में मोड़ने से निचले प्रवाह पर सीधा असर पड़ने का जोखिम रहता है।
ओडिशा का मुख्य आक्षेप यह रहा है कि छत्तीसगढ़ द्वारा ऊपरी धारा पर व्यापक स्तर पर बनाए गए विभिन्न बांधों और जल संरचनाओं की वजह से ओडिशा में आने वाले पानी की मात्रा में तीव्र गिरावट आ जाती है। यह संकट विशेष तौर पर गर्मी के महीनों और कम बारिश के दौर में विकराल रूप ले लेता है। ओडिशा का पक्ष है कि प्रवाह कम होने से उसकी ग्रामीण खेती, पीने के साफ पानी की आपूर्ति व्यवस्था, औद्योगिक गतिविधियां और संवेदनशील जलीय पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इसके विपरीत, छत्तीसगढ़ का तर्क है कि उसे अपने भौगोलिक दायरे में बहने वाली नदी के विधिक और आनुपातिक जल का दोहन करने का पूरा अधिकार है। इस तरह पूरे महानदी बेसिन में वास्तविक जल की उपलब्धता, वार्षिक मानसूनी बारिश, भंडारण क्षमता, कृषि सिंचाई का दबाव और दोनों राज्यों की भविष्य की जरूरतों का संतुलित मूल्यांकन करना विवाद की असली जड़ है।
साल 2016 से शुरू हुआ कानूनी संघर्ष और ट्रिब्यूनल की भूमिका
दो राज्यों के बीच यह तनातनी वर्ष 2016 के आसपास गंभीर कानूनी और राजनीतिक संघर्ष में बदल गई थी। उस दौरान ओडिशा ने ऊपरी हिस्सों में छत्तीसगढ़ की कई नई जल परियोजनाओं पर सख्त एतराज जताया। ओडिशा का यह तर्क था कि इन संरचनाओं से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित होगा और निचले हिस्से को पानी से वंचित होना पड़ेगा। जब आपसी बातचीत से कोई रास्ता नहीं निकला, तो यह मामला देश की शीर्ष अदालत तक पहुंच गया।
सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के पश्चात केंद्र सरकार ने 12 मार्च 2018 को अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के प्रावधानों का उपयोग करते हुए महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। इस ट्रिब्यूनल को दोनों राज्यों के दावों, तकनीकी साक्ष्यों और विधिक तथ्यों की गहराई से जांच कर एक न्यायसंगत निर्णय देने का उत्तरदायित्व सौंपा गया। यह निकाय केवल कागजों पर दर्ज दावों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि नदी के वास्तविक प्रवाह, डिस्चार्ज डेटा और जल भंडारण की तकनीकी समीक्षा भी करता है। ट्रिब्यूनल ने दोनों पक्षों से विभिन्न मौसमों, विशेषकर बारिश और गैर-मानसूनी महीनों के सटीक आंकड़े तलब किए। इसी क्रम में 2 मई को आयोजित सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने विस्तृत मौसमी आंकड़े प्रस्तुत किए थे। केंद्र सरकार ने 10 अप्रैल 2026 को जारी एक शासकीय अधिसूचना के माध्यम से न्यायाधिकरण के प्रतिवेदन और अंतिम निर्णय की समयसीमा को 13 जनवरी 2027 तक आगे बढ़ा दिया है।
अदालती जंग के समानांतर तकनीकी वार्ता का नया रास्ता
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा बदलाव यह देखने को मिला है कि दोनों राज्य अब केवल कानूनी मोर्चे पर उलझे रहने के स्थान पर द्विपक्षीय बातचीत को प्राथमिकता दे रहे हैं। 30 जुलाई 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में दोनों मुख्यमंत्रियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई थी। केंद्र ने इस पहल को संघीय सहकारिता और तकनीकी सहयोग का बेहतरीन उदाहरण करार दिया था। इस बैठक के बाद केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष के नेतृत्व वाली विस्तारित तकनीकी समिति ने दोनों राज्यों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। उस समय ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने स्पष्ट किया था कि दोनों राज्य आगामी तीन माह के भीतर एक ठोस समझौते की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे।
इसी संवाद की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 20 सितंबर 2026 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भुवनेश्वर जाकर ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी के साथ विस्तृत चर्चा की। इस मुलाकात के उपरांत साय ने सकारात्मक संकेत देते हुए कहा कि महानदी विवाद के जल्द निपटारे की पूरी उम्मीद है। उन्होंने रेखांकित किया कि दोनों सरकारों ने केंद्रीय जल आयोग के माध्यम से चर्चा कर रास्ता निकालने पर सहमति व्यक्त की है। इस प्रकार वर्तमान में समाधान के दो समानांतर मार्ग क्रियाशील हैं, जिसमें एक तरफ न्यायाधिकरण की विधिक कार्यवाही जारी है तो दूसरी ओर केंद्र की सहायता से सीधी तकनीकी बातचीत का दौर चल रहा है।
पारिस्थितिकी और आजीविका की रीढ़ है महानदी
महानदी दोनों राज्यों के लाखों नागरिकों की आजीविका और जल सुरक्षा का सबसे प्रमुख आधार है। इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सिहावा की पहाड़ियों से माना जाता है। वहां से यह धारा छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों को सींचते हुए ओडिशा की सीमा में दाखिल होती है और अपनी यात्रा पूरी कर बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इस नदी तंत्र में शिवनाथ जैसी कई प्रमुख सहायक नदियां आकर मिलती हैं, जो इसके प्रवाह को समृद्ध बनाती हैं। दोनों राज्यों के कृषि क्षेत्र, बिजली उत्पादन संयंत्र और पेयजल आपूर्ति योजनाएं पूरी तरह से इसी जीवनदायिनी नदी के पानी पर टिकी हुई हैं, जिससे इसका हर एक बूंद दोनों पक्षों के लिए अत्यंत मूल्यवान बन जाता है।



















