छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पारंपरिक खानपान की अपनी एक अलग पहचान है, जहां मौसमी साग और सब्जियों से बेहद स्वादिष्ट देसी व्यंजन तैयार किए जाते हैं। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में खट्टा भाजी, बैंगन और आलू का मेल विशेष स्थान रखता है। स्थानीय स्तर पर पसंद की जाने वाली यह सब्जी अपनी प्राकृतिक बनावट और अनोखे खट्टेपन के लिए जानी जाती है। इस रेसिपी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे पकाने में न तो बहुत ज्यादा समय लगता है और न ही इसमें भारी गरम मसालों की जरूरत होती है। कम मसालों की वजह से सब्जियों का मूल स्वाद बना रहता है।
बरसात के मौसम में बाड़ी की ताजी उपज
बस्तर के ग्रामीण अंचलों में मानसून के दिनों में लगभग हर घर के पीछे मौजूद बाड़ी या बगीचे में बैंगन और खट्टा भाजी उगाई जाती है। बरसात का मौसम शुरू होते ही इन हरी पत्तियों और ताजे बैंगन की पैदावार बढ़ जाती है, जिससे स्थानीय लोग इसे अपने दैनिक भोजन का मुख्य हिस्सा बनाते हैं। खट्टा भाजी से मिलने वाली स्वाभाविक खटास बैंगन और उबले या भुने आलू के साथ घुलकर एक अनोखा तालमेल बैठाती है। यह खट्टापन अलग से कोई अतिरिक्त खट्टा तत्व डाले बिना ही सब्जी को बेहद चटपटा बना देता है।
सब्जी तैयार करने के लिए जरूरी सामग्री
इस पारंपरिक देसी डिश को तैयार करने के लिए रसोई में मौजूद बेहद बुनियादी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। सामग्री का सही अनुपात इस प्रकार है
- 2 बैंगन
- 50 ग्राम कटी हुई खट्टा भाजी
- दो कटे हुए आलू
- एक कटी हुई प्याज
- दो सूखी लाल मिर्च
- 1/4 छोटी चम्मच हल्दी पाउडर
- 1/4 छोटी चम्मच मिर्च पाउडर
- स्वादानुसार नमक
- एक गिलास पानी और पकाने के लिए तेल
पकाने का पारंपरिक तरीका और आसान विधि
सब्जी बनाने की शुरुआत एक कड़ाही में तेल गरम करके की जाती है। सबसे पहले तेल में कटी हुई प्याज और दो सूखी लाल मिर्च डालकर तब तक तला जाता है जब तक प्याज का रंग हल्का सुनहरा न हो जाए। इसके बाद कड़ाही में कटे हुए बैंगन और आलू डाले जाते हैं और उन्हें मध्यम आंच पर कुछ देर तक पकाया जाता है। जब आलू और बैंगन हल्के नरम होने लगें, तब इसमें 50 ग्राम कटी हुई खट्टा भाजी मिलाई जाती है।
भाजी डालने के बाद इसे सब्जियों के साथ कुछ मिनट तक और भुना जाता है। इस व्यंजन की एक खास बात यह है कि इसमें टमाटर का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता। खट्टा भाजी की पत्तियां अपने आप में पर्याप्त खट्टी होती हैं, इसलिए टमाटर की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। हल्दी, मिर्च पाउडर और स्वादानुसार नमक मिलाने के बाद इसमें एक गिलास पानी डाला जाता है। कड़ाही को ढककर धीमी आंच पर तब तक पकाया जाता है जब तक सभी सब्जियां अच्छी तरह गल न जाएं और ग्रेवी गाढ़ी न हो जाए।
परोसने का तरीका और खानपान की परंपरा
पूरी तरह पक जाने के बाद यह स्वादिष्ट रसेदार सब्जी थाली में परोसने के लिए तैयार हो जाती है। बस्तर के घरों में इसे नियमित भोजन के रूप में बेहद चाव से खाया जाता है। इसे सादी रोटी, उबले सफेद चावल या फिर बस्तर के पारंपरिक बड़े चावल के साथ परोसा जाता है, जिसके साथ इसका रसा बहुत ही उम्दा लगता है।



















