पान में मिलाए जाने वाले कत्थे का स्रोत खैर के पेड़ की लकड़ी का भीतरी हिस्सा होता है, लेकिन इसी बेशकीमती प्राकृतिक संपदा को लेकर एक अंतरराज्यीय संगठित सिंडिकेट सक्रिय था। छत्तीसगढ़ पुलिस की तीन महीने चली व्यापक पड़ताल के बाद छह राज्यों में फैले 120 करोड़ रुपये के अवैध खैर लकड़ी तस्करी रैकेट का खुलासा हुआ है। पश्चिमी ओडिशा और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों से अवैध कटाई कर यह लकड़ी फर्जी दस्तावेजों के सहारे हिमाचल प्रदेश की कत्था निर्माण इकाइयों तक पहुंचाई जा रही थी। इस पूरे गोरखधंधे की परतें तब खुलीं जब पुलिस ने राज्य की सीमा पर जांच के दौरान एक संदिग्ध ट्रक को रोका।
सीमा पर जांच से खुला फर्जीवाड़े का खेल
इस पूरे गिरोह की धरपकड़ की शुरुआत 17 जून को हुई, जब महासमुंद जिले में ओडिशा की दिशा से आ रहे एक बड़े ट्रक को तलाशी के लिए रोका गया। वाहन की सघन जांच करने पर उसमें 23,350 किलोग्राम खैर की लकड़ी लदी पाई गई, जो हिमाचल प्रदेश में स्थित कत्था प्रसंस्करण कारखानों में उतारी जानी थी। जब तैनात अधिकारियों ने ट्रक चालक और परिवहन से जुड़े कागजातों का मिलान किया, तो वे हैरान रह गए। परिवहन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा नेशनल ट्रांजिट पास सिस्टम (NTPS) का आधिकारिक क्लीयरेंस सर्टिफिकेट पूरी तरह नकली निकला। यह परमिट आंध्र प्रदेश के कुरनूल वन विभाग के नाम से फर्जी तरीके से तैयार किया गया था, जो अमूमन वन चौकियों पर वनोपज परिवहन के वैध प्रमाण के तौर पर दिखाया जाता है।
पांच राज्यों में छापेमारी और कानूनी शिकंजा
जाली वन परमिट के आधार पर लकड़ी की इतनी बड़ी खेप मिलने के बाद अधिकारियों ने वाहन को फौरन जब्त कर अंतरराज्यीय स्तर पर नेटवर्क की कड़ियां जोड़ना शुरू किया। महासमुंद जिले के पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार के अनुसार, मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस टीमों ने छत्तीसगढ़, हरियाणा, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश के विभिन्न ठिकानों पर लगातार दबिश दी। पिछले दो महीनों के दौरान विभिन्न ठिकानों पर की गई सुनियोजित छापेमारी में कुल मिलाकर 50 टन से अधिक अवैध खैर की लकड़ी बरामद की जा चुकी है। अब तक इस संगठित तस्करी गिरोह से जुड़े 12 मुख्य लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
पुलिस ने इस पूरे सिंडिकेट के खिलाफ 9 जुलाई को संगठित अपराध, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रचने की संगीन धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की। यह कानूनी कार्रवाई भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2), 61(2), 3(5) और 111 के साथ-साथ भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 41(2)(b)(d) और 52(1) के तहत अमल में लाई गई है।
मास्टरमाइंड की भूमिका और जब्ती
जांच आगे बढ़ने पर इस सिंडिकेट के केंद्र में छत्तीसगढ़ के सरसीवा निवासी मनीष अग्रवाल का नाम प्रमुखता से उभरा। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 7 सितंबर को अग्रवाल के ठिकाने से 81 लाख रुपये नकद बरामद किए। हालांकि, आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय की शरण ली और अग्रिम जमानत हासिल कर ली। अदालत में बचाव पक्ष की ओर से दलील दी गई कि उसे केवल एक बिचौलिया दर्शाया गया है और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) की जालसाजी या किसी को धोखा देने में उसकी सीधी संलिप्तता का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है। इसके बावजूद, मनीष अग्रवाल का आपराधिक इतिहास पुराना रहा है और उसका नाम पहले से कई प्राथमिकियों और वन अपराध मामलों में दर्ज है। हाल ही में छत्तीसगढ़ की रायगढ़ पुलिस ने पिछले वर्ष दर्ज खैर की लकड़ी तस्करी के एक अन्य आपराधिक मामले में उसे गिरफ्तार किया, जिसके चलते वह वर्तमान में न्यायिक हिरासत में जेल में बंद है।
फर्जी कंपनियों का जाल और हवाला नेटवर्क
वित्तीय जांच में सामने आया कि इस गिरोह ने अवैध कमाई को खपाने के लिए एक अत्यंत संगठित आर्थिक ढांचा खड़ा कर रखा था। मनीष अग्रवाल और हिमाचल प्रदेश की कत्था कंपनियों से जुड़े कम से कम तीन अन्य व्यापारियों के गठजोड़ से 8 फर्जी कंपनियां संचालित की जा रही थीं। इन कागजी कंपनियों के जरिए दो वर्षों के भीतर कुल 120 करोड़ रुपये के फर्जी इनवॉइस और बिल तैयार किए गए। अवैध लकड़ी की बिक्री से प्राप्त भारी-भरकम राशि के लेन-देन और शोधन के लिए 10 से अधिक बेनामी अथवा 'म्यूल अकाउंट' का सहारा लिया गया, जो दूसरों के नाम पर खोले गए थे। वित्तीय जांच दल इस बात की गहराई से छानबीन कर रहे हैं कि यह काला धन किन-किन खातों में भेजा गया और इसका अंतिम लाभार्थी कौन था।
ओडिशा से हिमाचल तक तस्करी का सुरक्षित गलियारा
सिंडिकेट की कार्यप्रणाली बेहद शातिराना थी। खैर के पेड़ों को सबसे पहले पश्चिमी ओडिशा के बलांगीर और बरगढ़ जिलों, ओडिशा के कुछ अन्य वनांचलों तथा छत्तीसगढ़ के रायगढ़ और जशपुर के वन क्षेत्रों से अवैध रूप से काटा जाता था। इसके बाद ट्रकों में लकड़ी भरकर उन्हें महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश या झारखंड के रास्तों से होते हुए हरियाणा पहुंचाया जाता था, जहां से अंतिम खेप हिमाचल प्रदेश की प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों में दाखिल कराई जाती थी। पूरे रास्ते में पड़ने वाली विभिन्न राज्यों की वन और पुलिस चौकियों पर चकमा देने के लिए हर जगह जाली NTPS दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे सुरक्षाकर्मियों को किसी गड़बड़ी का अंदेशा न हो सके।





















