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मूक-बधिर युवाओं की सांकेतिक भाषा से महक रहा रायपुर का नुक्कड़ कैफे, भिलाई और बस्तर तक हुआ विस्तारछत्तीसगढ़
2 नव॰ 2026, 1:04 pm (5 मिनट पहले)· 0

मूक-बधिर युवाओं की सांकेतिक भाषा से महक रहा रायपुर का नुक्कड़ कैफे, भिलाई और बस्तर तक हुआ विस्तार

रायपुर में शुरू हुआ अनोखा कैफे मूक-बधिर, किन्नर समाज और पुनर्वासित युवाओं को आजीविका देकर समाज में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम कर रहा है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी में चलने वाला एक अनूठा भोजनालय इन दिनों अपनी खास कार्यप्रणाली से लोगों का ध्यान खींच रहा है. सामान्य खानपान केंद्रों से अलग, इस स्थान पर सेवा देने वाले अधिकांश युवा न तो सुन सकते हैं और न बोल पाते हैं. इसके बावजूद वे चेहरे पर मुस्कान लिए सांकेतिक भाषा के जरिए ग्राहकों की पसंद समझकर उनका पसंदीदा भोजन टेबल तक पहुंचाते हैं. सामाजिक बदलाव की भावना से खड़ा किया गया यह संस्थान अब वंचित तबकों के सम्मानजनक जीवन का मजबूत आधार बन चुका है.

हाशिए पर खड़े तबकों को सम्मानजनक आजीविका का मंच

इस संस्थान की नींव वर्ष 2013 में राजधानी के समता कॉलोनी इलाके में रखी गई थी. इसके सूत्रधार प्रियंक पटेल ने महज कारोबार चलाने के बजाय उन लोगों के लिए अवसर तैयार करने का लक्ष्य तय किया, जिन्हें मुख्यधारा के कार्यस्थलों में काम मिलना बेहद कठिन होता है. इस उपक्रम ने सुनने-बोलने में अक्षम व्यक्तियों, किन्नर समुदाय के सदस्यों और मानसिक रूप से दिव्यांग जनों को आजीविका के सम्मानजनक साधन उपलब्ध कराए हैं. बीते वर्षों में यह छोटा प्रयास एक व्यापक सामाजिक मॉडल के रूप में तब्दील हो चुका है.

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पर्ची और सांकेतिक भाषा से तैयार होता है स्वाद का अनुभव

यहाँ आने वाले आगंतुकों के लिए बातचीत का माहौल बेहद दिलचस्प रहता है. मूक-बधिर कर्मचारी इशारों और संकेतों के माध्यम से मेन्यू समझाते हैं तथा ग्राहकों की मांग दर्ज करते हैं. जो ग्राहक सांकेतिक माध्यम में असहज होते हैं, वे कागज की पर्ची पर अपनी पसंद लिखकर दे देते हैं. यह दोतरफा संवाद आगंतुकों को संवेदनशील व्यवहार सिखाता है और कर्मचारियों को बिना किसी हीनभावना के अपनी पेशेवर प्रतिभा साबित करने का मंच प्रदान करता है.

राजधानी के मोहल्लों से निकलकर बस्तर तक पहुंचे आउटलेट्स

संस्थान के साथ करीब 10 से 12 वर्षों से काम कर रहे दीपक कुमार जंघेला ने बताया कि अब इस श्रृंखला के अंतर्गत 4 से 5 शाखाएं सफलता से संचालित की जा रही हैं. शुरुआत समता कॉलोनी से हुई थी, जिसके बाद रायपुर के न्यू राजेंद्र नगर तथा वीआईपी रोड पर नई शाखाएं खोली गईं. धीरे-धीरे इस पहल ने शहर की सीमा पार कर भिलाई और बस्तर के जगदलपुर में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है.

जगदलपुर के पंडुम केंद्र में पुनर्वास की अनूठी कोशिश

बस्तर संभाग के जगदलपुर में खुला 'पंडुम' नाम का आउटलेट अपनी संवेदनशील पहल के कारण विशेष चर्चा में है. इस केंद्र पर बीते एक वर्ष से हथियार छोड़ चुके पूर्व नक्सलियों और हिंसा प्रभावित परिवारों के लोगों को आजीविका दी जा रही है. शांति और पुनर्वास की दिशा में यह कदम उन्हें सामाजिक सुरक्षा के साथ मुख्यधारा में स्थायी पहचान बनाने में मदद कर रहा है. सही वातावरण और भरोसा मिलने पर व्यक्ति अपनी तकदीर खुद संवार सकता है, यह बात इस उद्यम ने साबित कर दिखाई है.

सवाल-जवाब

नुक्कड़ कैफे की शुरुआत कब और किस स्थान से हुई थी?
इसकी शुरुआत वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के समता कॉलोनी इलाके से हुई थी.
इस अनूठे कैफे के संस्थापक कौन हैं?
इस सामाजिक पहल की शुरुआत संस्थापक प्रियंक पटेल ने की थी.
ग्राहक मूक-बधिर कर्मचारियों को अपना ऑर्डर कैसे देते हैं?
ग्राहक सांकेतिक भाषा के इशारों के जरिए या फिर कागज की पर्ची पर लिखकर अपना ऑर्डर देते हैं.
वर्तमान में इस कैफे के कितने आउटलेट्स संचालित हैं?
दीपक कुमार जंघेला के अनुसार वर्तमान में इसके 4 से 5 आउटलेट्स चल रहे हैं.
रायपुर के अलावा किन शहरों में यह कैफे फैला हुआ है?
रायपुर के अतिरिक्त यह कैफे भिलाई और जगदलपुर में भी संचालित हो रहा है.
जगदलपुर स्थित 'पंडुम' आउटलेट की क्या विशेषता है?
पंडुम आउटलेट में पिछले एक साल से आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों और हिंसा प्रभावित लोगों को रोजगार देकर मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है.
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