छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में अंधविश्वास ने एक परिवार को उजाड़ दिया। पत्थलगांव थाना क्षेत्र के डुंगाजोर गांव में रहने वाली 35 वर्षीय विधवा नवीना राठिया को उसके ही जेठ सुखसिंग राठिया ने डायन करार देकर लाठियों से पीट-पीटकर उसकी जान ले ली। पति की मौत के बाद अकेली रह रही नवीना पर यह हमला सोमवार की सुबह उस वक्त हुआ, जब वह घर के आंगन में रोजमर्रा के काम निपटा रही थी।
सोमवार की सुबह मच गया कोहराम
पुलिस के मुताबिक नवीना उस वक्त घर के आंगन में अकेली थी और अपने रोजाना के घरेलू कामकाज में जुटी थी, तभी शराब के नशे में धुत सुखसिंग राठिया वहां पहुंच गया। कुछ ही पलों में दोनों के बीच पुरानी बात को लेकर तीखी नोकझोंक शुरू हो गई, जो देखते ही देखते खूनी झगड़े में तब्दील हो गई। जांच में सामने आया कि सुखसिंग लंबे समय से अपनी भाभी को टोन्ही मानता आ रहा था और यही शक उस सुबह हुए विवाद की जड़ बना।
परिवार में हुई मौतों ने भर दिया मन में जहर
पुलिस पड़ताल में खुलासा हुआ कि सुखसिंग के अपने परिवार में बीते कुछ वर्षों के दौरान कई करीबी लोगों की जान जा चुकी थी। उसकी बुजुर्ग मां, उसका सगा भाई और उसका एक छोटा सा नाती, अलग-अलग समय पर गंभीर बीमारी या अन्य वजहों से दुनिया छोड़ गए थे। इन मौतों के पीछे बीमारी या इलाज में देरी जैसी वजहें मानने और डॉक्टरी सलाह पर भरोसा करने के बजाय, सुखसिंग ने पूरी जिम्मेदारी अपनी ही भाभी नवीना पर मढ़ दी। उसे यकीन हो चला था कि नवीना टोन्ही यानी डायन है और उसी के काले जादू-टोने की वजह से घर के लोग एक-एक कर मर रहे हैं।
रोज-रोज की जलालत झेलती रही नवीना
यह महज एक दिन की सोच नहीं थी। पुलिस के अनुसार सुखसिंग को दिन-रात शराब पीने की लत थी और नशे में वह अक्सर पूरे गांव के सामने नवीना को खुलेआम डायन करार देता था। वह उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करता, गाली-गलौज करता और पहले भी कई बार उसके साथ मारपीट कर चुका था। गांव वालों के सामने बार-बार अपमानित होने के बावजूद नवीना अकेली इस जलालत को झेलती रही, क्योंकि उसका साथ देने वाला घर में कोई और नहीं था।
गुस्से में उठाई लाठी, नहीं रुका जब तक सांसें नहीं थमीं
सोमवार को भी सुखसिंग नशे में ही घर पहुंचा और वही पुराना विवाद फिर छिड़ गया। इस बार उसका गुस्सा हद पार कर गया। बिना कुछ सोचे उसने घर के कोने में रखी एक मोटी लाठी उठाई और निहत्थी नवीना के सिर और शरीर पर ताबड़तोड़ वार करने लगा। वह तब तक बेरहमी से पीटता रहा, जब तक नवीना की सांसें हमेशा के लिए नहीं थम गईं। चीख-पुकार सुनकर आसपास के ग्रामीण जब तक मौके पर पहुंचते, सुखसिंग वारदात को अंजाम देकर वहां से फरार हो चुका था।
विज्ञान के दौर में भी नहीं छूटा अंधविश्वास का साथ
यह वारदात बताती है कि एक तरफ दुनिया चांद और मंगल ग्रह पर जीवन तलाशने के दावे कर रही है, वहीं देश के कई ग्रामीण इलाके आज भी डायन, टोन्ही और झाड़-फूंक जैसी कुप्रथाओं की गिरफ्त में हैं। परिवार में बार-बार होने वाली बीमारी या मौत का ठीकरा अक्सर किसी असहाय महिला, खासकर विधवा के सिर फोड़ दिया जाता है, जिसका कोई साथ देने वाला नहीं होता। नवीना राठिया की मौत भी इसी सामाजिक बुराई की भेंट चढ़ गई।











