क्रिकेट जैसे खेल में, जहां 22 गज की पट्टी पर 140 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से आती गेंद पर नजर बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है, वहां चश्मा पहनकर मैदान में उतरना किसी चुनौती से कम नहीं माना जाता। आम तौर पर नजर के चश्मे को केवल पढ़ाई-लिखाई से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन भारतीय क्रिकेट का स्वर्णिम इतिहास गवाह है कि कई फिरकी गेंदबाजों ने इसी चश्मे के सहारे विरोधी टीमों के बल्लेबाजों को पानी पिलाया। अनिल कुंबले, नरेंद्र हिरवानी और दिलीप दोषी जैसे महान स्पिनरों ने अपनी आंखों की कमजोर रोशनी यानी मायोपिया को कभी अपनी राह का रोड़ा नहीं बनने दिया। इन गेंदबाजों ने न केवल भारी-भरकम फ्रेम वाले चश्मे पहनकर घंटों स्पेल फेंके, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसे विश्व कीर्तिमान स्थापित किए जो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं।
अनिल कुंबले और फिरोजशाह कोटला का 10 विकेट वाला ऐतिहासिक कीर्तिमान
भारतीय टेस्ट इतिहास के सबसे सफल गेंदबाज अनिल कुंबले, जिन्हें क्रिकेट जगत में प्यार से 'जंबो' कहा जाता है, ने अपने शुरुआती अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान नियमित रूप से पारंपरिक नजर का चश्मा पहनकर गेंदबाजी की थी। कुंबले की गेंदबाजी की सबसे बड़ी खासियत गेंद को बहुत ज्यादा स्पिन कराना नहीं, बल्कि गेंद की सटीक लाइन, लेंथ, उछाल और मारक गति थी। चश्मे के मोटे लेंस पहनकर भी उनकी गेंदों पर बल्लेबाजों का चकमा खाना आम बात थी। करियर के उत्तरार्ध में उन्होंने चश्मे का त्याग कर कॉन्टैक्ट लेंस पहनना शुरू कर दिया था।
अनिल कुंबले के नाम टेस्ट क्रिकेट इतिहास का वह करिश्माई रिकॉर्ड दर्ज है, जो आज तक कोई दूसरा भारतीय दोहरा नहीं सका है। साल 1999 में दिल्ली के ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला मैदान पर पाकिस्तान के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच में कुंबले ने एक ही पारी में विपक्षी टीम के सभी 10 बल्लेबाजों को पवेलियन भेज दिया था। उन्होंने 74 रन देकर 10 विकेट (10/74) का जादुई आंकड़ा हासिल किया था। अपने पूरे टेस्ट करियर के दौरान कुंबले ने 619 विकेट चटकाए, जिसके साथ वह भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बने हुए हैं।
नरेंद्र हिरवानी का ड्रीम डेब्यू और 16 विकेटों का विश्व रिकॉर्ड
मध्य प्रदेश से आने वाले लेग स्पिनर नरेंद्र हिरवानी का मैदान पर अंदाज बिल्कुल अलग और आकर्षक हुआ करता था। सिर पर रुमाल (बैंडाना) बांधना और चेहरे पर नजर का चश्मा लगाना हिरवानी का ट्रेडमार्क स्टाइल था। हिरवानी जब अपनी लेग-स्पिन और खतरनाक गुगली फेंकते थे, तो दुनिया के नामचीन बल्लेबाज भी क्रीज पर असहाय नजर आते थे। चश्मा पहनकर गेंदबाजी करते हुए हिरवानी ने टेस्ट क्रिकेट के इतिहास का सबसे अकल्पनीय डेब्यू प्रदर्शन दर्ज किया था।
साल 1988 में वेस्टइंडीज की मजबूत टीम के खिलाफ चेन्नई में आयोजित टेस्ट मैच में नरेंद्र हिरवानी ने अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मैच में तहलका मचा दिया था। उन्होंने उस मुकाबले में कुल 136 रन देकर 16 विकेट चटकाए थे। यह किसी भी गेंदबाज द्वारा अपने डेब्यू टेस्ट मैच में किया गया सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है और यह विश्व रिकॉर्ड आज 38 साल बाद भी अटूट है। चश्मे के साथ की गई उनकी यह गेंदबाजी भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे शानदार गाथाओं में से एक मानी जाती है।
30 की उम्र में डेब्यू करने वाले दिलीप दोषी का कड़ा अनुशासन
भारतीय क्रिकेट में बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स स्पिनर दिलीप दोषी एक ऐसे खिलाड़ी रहे, जिन्होंने अपने पूरे अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान हमेशा नजर का चश्मा पहनकर ही गेंदबाजी की। दोषी को भारत की राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा था। उन्होंने 30 साल की परिपक्व उम्र में अपना पहला टेस्ट मैच खेला था, लेकिन देर से मिले इस मौके का उन्होंने पूरा फायदा उठाया।
अपनी कसी हुई और अनुशासित गेंदबाजी के दम पर दिलीप दोषी ने बेहद कम समय में सफलता की नई कहानियां लिखीं। उन्होंने भारत के लिए केवल 33 टेस्ट मैचों में प्रतिनिधित्व किया और इतने ही मुकाबलों में 114 टेस्ट विकेट अपने नाम कर लिए। टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में 30 वर्ष की उम्र के बाद डेब्यू करके 100 या उससे ज्यादा विकेट हासिल करने वाले चुनिंदा गेंदबाजों में दिलीप दोषी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है।
रमेश पोवार का रंगीन सनग्लासेस और युजवेंद्र चहल का आधुनिक दौर
दिग्गज गेंदबाजों के अलावा कुछ अन्य स्पिनरों ने भी चश्मे के साथ मैदान पर अपनी अलग छाप छोड़ी है। मुंबई के पूर्व ऑफ-स्पिनर रमेश पोवार का स्टाइल काफी अनूठा था। वह नजर के चश्मे की जगह हमेशा चमकदार, रंगीन धूप के चश्मे (सनग्लासेस) पहनकर अपना रन-अप लेते थे और गेंदबाजी करते थे। हवा में लहराती हुई (लोपी) और फ्लाइटेड गेंदों से रमेश पोवार ने घरेलू क्रिकेट में 470 से अधिक विकेट झटके, जबकि अंतरराष्ट्रीय मैचों में 40 विकेट अपने नाम किए। रंगीन चश्मे में उनका गेंदबाजी एक्शन प्रशंसकों के बीच खासा लोकप्रिय हुआ था।
आधुनिक दौर की बात करें तो चतुर लेग स्पिनर युजवेंद्र चहल भी कई मौकों पर मैदान में चश्मा पहने दिखाई देते हैं। हालांकि चहल आमतौर पर गेंदबाजी करते समय चश्मा हटा देते हैं, लेकिन नेट्स में अभ्यास के दौरान और मैदान पर फील्डिंग करते समय वह नियमित रूप से चश्मा कैरी करते हैं। इन सभी खिलाड़ियों का सफर साबित करता है कि आंखों की नजर भले ही कमजोर हो, लेकिन अगर खिलाड़ी के पास अटूट संकल्प और सही क्रिकेटिंग विजन हो, तो वह दुनिया के किसी भी मैदान पर इतिहास रच सकता है।



















