राजस्थान के 309 स्थानीय निकायों के हालिया चुनावी नतीजों ने राज्य की राजनीति में रणनीतिक प्रबंधन और संगठनात्मक पकड़ का एक दिलचस्प मुकाबला पेश किया है। दोनों प्रमुख दलों के बीच आमने-सामने के जनसमर्थन में जमीन पर बमुश्किल एक प्रतिशत वोट का फासला रहा, लेकिन जब बोर्ड बनाने और प्रमुख पदों पर कब्जा जमाने की बारी आई तो तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नजर आई। भारतीय जनता पार्टी ने केवल मामूली वोट बढ़त के दम पर 197 निकायों में अपना परचम लहरा दिया, जबकि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस तमाम दावों के बावजूद 97 निकायों तक ही सीमित रह गई। चार निकायों में शीर्ष पदों का निर्वाचन अभी बाकी है, जिनमें से तीन स्थानों पर सत्तारूढ़ दल की स्थिति काफी मजबूत मानी जा रही है।
चुनावी आंकड़ों के मुताबिक राज्य के 309 निकायों में 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाएं शामिल हैं। इन सभी संस्थाओं के कुल 10245 वार्डों में हुए सीधे मुकाबले में भाजपा 4179 वार्ड जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। 15 सितंबर को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा द्वारा सार्वजनिक की गई मतदान विवरण तालिका के अनुसार कांग्रेस के खाते में 3613 वार्ड आए। दूसरी ओर निर्दलीय उम्मीदवारों और आम आदमी पार्टी (आप), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) व राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) जैसे छोटे क्षेत्रीय व राष्ट्रीय दलों ने मिलकर 2444 वार्डों पर जीत हासिल की थी। उस चरण तक भाजपा को कुल 35.19 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 34.25 प्रतिशत दर्ज किया गया था। इस प्रकार दोनों मुख्य दलों के मत प्रतिशत में महज 0.94 प्रतिशत का अंतर था।
पुनर्मतदान के आंकड़े और वार्डों की अंतिम स्थिति
स्थानीय निकाय चुनावों की मुख्य मतगणना 14 सितंबर को पूरी हुई थी। इसके बाद 16 सितंबर को जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम के साथ-साथ कोटा जिले की सुकेत नगर पालिका के अंतर्गत आने वाले 9 वार्डों के कुछ चुनिंदा मतदान केंद्रों पर दोबारा मतदान कराना पड़ा। इन केंद्रों की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में गिनती के दौरान तकनीकी खामियां सामने आई थीं, जिसके कारण राज्य निर्वाचन तंत्र ने वहां नए सिरे से वोट डलवाने का निर्णय लिया। जब 17 सितंबर को पुनर्मतदान के परिणाम घोषित किए गए, तो इन नौ वार्डों में से छह पर कांग्रेस ने बाजी मारी जबकि तीन सीटें भाजपा के पक्ष में गईं।
इस अतिरिक्त चरण के नतीजों को जोड़ने के बाद कुल दलीय स्थिति में आंशिक बदलाव देखने को मिला। भाजपा के जीते हुए वार्डों की अंतिम संख्या बढ़कर 4182 हो गई, वहीं कांग्रेस के कुल विजयी वार्डों की गिनती 3619 पर पहुंच गई। इस संशोधन के चलते दोनों दलों के कुल वोट शेयर में भी अत्यंत मामूली उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया, परंतु समग्र राजनीतिक संतुलन पर इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ा और दोनों दलों के बीच का फासला लगभग वैसा ही बना रहा।
निर्विरोध निर्वाचन और अंतिम चरण की वोटिंग
निकाय प्रमुखों के चयन के लिए जब नामांकन की प्रक्रिया शुरू हुई, तो मतदान से पहले ही 32 निकायों में प्रमुख निर्विरोध चुन लिए गए। इनमें भीलवाड़ा और भरतपुर जैसे अहम नगर निगमों के महापौर पद के अलावा कई नगर परिषदें और नगर पालिकाएं शामिल थीं। इन निर्विरोध घोषित 32 सीटों में से 30 निकायों पर भाजपा ने एकतरफा कब्जा कर लिया, जबकि शेष दो स्थानों पर अन्य उम्मीदवारों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया गया।
इसके उपरांत शेष 273 निकायों में अध्यक्ष और महापौर पदों के लिए मतदान कराया गया। इस चरण में 36 नगर परिषदें, 191 नगर पालिकाएं और पांच नगर निगम शामिल थे। इनमें से 231 निकायों में सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के मध्य देखा गया, जबकि शेष निकायों में निर्दलीयों और छोटे दलों की मौजूदगी के कारण त्रिकोणीय या बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी रही। जयपुर, जोधपुर, कोटा नगर निगम और सुकेत नगर पालिका में निकाय प्रमुखों के चुनाव की तारीख 25 सितंबर निर्धारित की गई है।
पाली नगर निगम में उलटफेर और पार्षदों की क्रास वोटिंग
इस पूरे चुनाव में फ्लोर मैनेजमेंट का सबसे चौंकाने वाला उदाहरण पाली नगर निगम के महापौर चुनाव में देखने को मिला। वहां कांग्रेस के 29 पार्षद चुनकर आए थे, लेकिन जब महापौर पद के लिए मतदान संपन्न हुआ तो कांग्रेस प्रत्याशी को केवल 3 वोट ही हासिल हो सके। भारी संख्या में पार्षदों के पाला बदलने के कारण भाजपा ने अपना बोर्ड गठित कर लिया। इसी प्रकार अजमेर, भरतपुर और अलवर जैसे बड़े नगर निगमों समेत दर्जनों अन्य पालिकाओं में भी भाजपा ने निर्दलीयों और असंतुष्ट पार्षदों को अपने पाले में खींचकर कांग्रेस को अप्रत्याशित शिकस्त दी।
कांग्रेस नेतृत्व ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखा विरोध दर्ज कराते हुए सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि सत्ता पक्ष ने प्रशासनिक तंत्र और सरकारी मशीनरी का अनुचित इस्तेमाल किया है। कांग्रेस के अनुसार जनादेश स्पष्ट रूप से उनके विरोध में नहीं था, लेकिन सत्ता का दुरुपयोग कर कई स्थानीय संस्थाओं को जबरन हथिया लिया गया। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल आरोप-प्रत्यारोप मानने के बजाय भाजपा की बेहतर रणनीति और वार्ड स्तर पर किए गए त्वरित समन्वय का नतीजा मान रहे हैं।
स्थानीय राजनीति और वार्ड स्तरीय चुनावी समीकरण
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आम चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव की प्रकृति में बुनियादी अंतर होता है। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव बड़े राष्ट्रीय या प्रादेशिक मुद्दों पर लड़े जाते हैं, जबकि नगर पालिका या नगर निगम का मतदाता रोजमर्रा की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देता है। सड़क निर्माण, नालियों की सफाई, स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था और आवारा पशुओं से निजात जैसे जमीनी मुद्दे इन चुनावों की दिशा तय करते हैं। इन चुनावों में प्रत्याशी और मतदाता के बीच व्यक्तिगत संपर्क अधिक गहरा होता है।
वार्ड स्तर पर मतदाताओं की कुल संख्या भले ही कम हो, लेकिन प्रत्येक पार्षद प्रत्याशी को साधना और फिर जीत के बाद उन्हें एकजुट रखना एक जटिल चुनौती होती है। राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव भविष्य के बड़े अभियानों की आधारशिला माने जाते हैं, क्योंकि पार्टी का मूल कार्यकर्ता इन्हीं जमीनी लड़ाइयों से तैयार होता है। राजस्थान में भाजपा सरकार को बने करीब पौने तीन साल बीत चुके हैं। सरकार बनने के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को पिछले प्रदर्शन के मुकाबले नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन उसके बाद रिक्त हुई सीटों पर संपन्न विधानसभा उपचुनावों में उसने बड़ी बढ़त हासिल की थी। अब निकाय चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर उसकी संगठनात्मक क्षमता को रेखांकित किया है।
सख्त किलेबंदी और निर्दलीयों पर केंद्रित रणनीति
जब वार्डों के नतीजे सामने आए और मुकाबला बेहद करीबी नजर आ रहा था, तब भाजपा ने तुरंत अपने अनुभवी और जमीन से जुड़े वरिष्ठ नेताओं को मोर्चे पर तैनात कर दिया। पार्टी की प्राथमिक रणनीति अपने जीते हुए पार्षदों को एकजुट और सुरक्षित रखने की थी। अपने खेमे को पूरी तरह सुरक्षित करने के बाद भाजपा रणनीतिकारों ने पूरा ध्यान विजयी निर्दलीय पार्षदों को साधने पर केंद्रित कर दिया। स्थानीय समीकरणों और सत्ता की स्थिति का पूरा लाभ उठाते हुए भाजपा ने अपने सभी राजनीतिक विकल्प खुले रखे।
इसके विपरीत कांग्रेस परिणाम आने के बाद आरोपों की राजनीति और आंतरिक खींचतान में उलझी रही, जबकि भाजपा का तंत्र लगातार नए पार्षदों से संपर्क साधकर समर्थन जुटाने में लगा रहा। इसी योजनाबद्ध समन्वय और जमीनी जोड़-तोड़ का नतीजा रहा कि 0.94 प्रतिशत मतों के मामूली अंतर के बावजूद भाजपा लगभग दो-तिहाई निकायों में अपना बोर्ड बनाने में सफल रही और कांग्रेस को स्थानीय स्तर पर भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।



















