भारतीय क्रिकेट में बेहद कम समय में अपनी खास पहचान बनाने वाले युवा बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल का अपने शुरुआती कोच ज्वाला सिंह के साथ संपर्क खत्म हो गया है। लगभग 12 सालों तक अपने घर में यशस्वी को बच्चे की तरह पालने और क्रिकेट के हर पहलू पर मार्गदर्शन देने वाले ज्वाला सिंह ने स्वीकार किया है कि दोनों के बीच अब किसी तरह की बातचीत नहीं होती। एक समय जिस गुरु की हर बात को यशस्वी बिना किसी सवाल के स्वीकार करते थे, आज उसी रिश्ते में राहें अलग हो चुकी हैं।
12 साल का लंबा सफर और शुरुआती दौर का संघर्ष
यशस्वी जायसवाल जब केवल 12 या 13 साल के थे, तब वह ज्वाला सिंह के पास आए थे। उस समय ज्वाला सिंह ने उन्हें न केवल अपनी अकादमी में ट्रेनिंग दी, बल्कि अपने घर में रखकर एक परिजन की तरह उनकी देखरेख की। इस लंबे अरसे के दौरान यशस्वी के परिजनों ने भी कभी हस्तक्षेप नहीं किया और ज्वाला सिंह ने भी बिना किसी स्वार्थ के उनका पूरा साथ निभाया। स्कूल क्रिकेट के शुरुआती मुकाबलों से लेकर मुंबई की अंडर-16 और अंडर-19 टीमों तक, ज्वाला सिंह ने हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया। इसके बाद इंडिया अंडर-19 में चयन, फिर IPL में शानदार प्रदर्शन और आखिरकार राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने तक का सफर इसी मार्गदर्शन में तय हुआ।
कोचिंग स्टाफ पर निर्भरता और स्वतंत्रता की चाह
अब जबकि यशस्वी जायसवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थापित खिलाड़ी बन चुके हैं, उन्होंने अपने फैसले खुद लेने शुरू कर दिए हैं। ज्वाला सिंह के मुताबिक, राष्ट्रीय टीम में शामिल होने के बाद अब यशस्वी भारतीय टीम के आधिकारिक कोचिंग स्टाफ से ही सभी तकनीकी और मानसिक सलाह लेते हैं। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "अब मेरी उससे बात नहीं होती है, क्योंकि वह अब भारतीय टीम के कोचिंग स्टाफ की सलाह मानता है।" ज्वाला सिंह का मानना है कि जब कोई खिलाड़ी या बच्चा एक निश्चित उम्र में पहुंचता है, तो वह अपनी जिंदगी और करियर को अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहता है।
बदलते विचार और अलग होती राहें
अतीत के दिनों को याद करते हुए ज्वाला सिंह ने स्पष्ट किया कि एक दौर ऐसा भी था जब यशस्वी उनके कहे हर शब्द पर अटूट विश्वास रखते थे। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि यदि वह कभी कह देते कि सूरज पश्चिम से उगता है, तो यशस्वी भी बिना संकोच मान लेते थे। हालांकि, जैसे-जैसे यशस्वी परिपक्व हुए, उनकी सोच और प्राथमिकताओं में बदलाव आया। ज्वाला सिंह का कहना है कि हर व्यक्ति का अपना एक तरीका होता है और जब दो लोगों के विचार आपस में मेल नहीं खाते, तो बिना किसी मनमुटाव के अपनी-अपनी राहें चुन लेना ही बेहतर होता है।



















