देश के शीर्ष क्रिकेट ढांचे में टीम चयन का जिम्मा संभालना हमेशा से तलवार की धार पर चलने जैसा रहा है। जब भी कोई चयनकर्ता आने वाले कल को संवारने के लिए कड़े कदम उठाने की कोशिश करता है, उसका सामना स्थापित सितारों के रसूख और बोर्ड के पेचीदा समीकरणों से होना लगभग तय माना जाता है। पूर्व तेज गेंदबाज अजीत अगरकर के कार्यकाल का घटनाक्रम भी इसी खींचतान की एक बानगी बनकर उभरा, जहां योजनाएं प्रशासनिक हस्तक्षेप और वरिष्ठ खिलाड़ियों की मौजूदगी के आगे बेअसर साबित हुईं। इस पूरे विवाद ने चयन समिति की स्वायत्तता और फैसलों के अमल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
2027 के विश्व कप का लक्ष्य और नए चेहरे को मौका देने की सोच
इस पूरे मामले का केंद्र 2027 में होने वाले पचास ओवरों के वैश्विक टूर्नामेंट की तैयारी से जुड़ा था। चयन समिति का नेतृत्व कर रहे अगरकर का आकलन था कि अगले वनडे विश्व कप तक नियमित कप्तान रोहित शर्मा की उम्र चालीस साल के करीब पहुंच जाएगी। चयन प्रमुख का मानना था कि इतने लंबे सफर के लिए सिर्फ एक वरिष्ठ खिलाड़ी पर पूरी तरह निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं होगा। इसलिए वे ओपनिंग स्लॉट में एक नई ऊर्जा भरना चाहते थे।
उनकी नजर में युवा बाएं हाथ के बल्लेबाज यशस्वी जायसवाल इस स्थान के सबसे मुफीद दावेदार थे। योजना यह बनाई गई थी कि बड़े मंच पर उतरने से पहले जायसवाल को वनडे प्रारूप में खुद को पूरी तरह ढालने के लिए कम से कम 20 मुकाबलों में लगातार आजमाया जाए, ताकि वे शीर्ष क्रम में अपनी जगह पक्की कर सकें। इसके लिए जरूरी था कि वरिष्ठ खिलाड़ियों के कार्यभार को सीमित किया जाए और युवाओं को ज्यादा अवसर दिए जाएं।
संदेश पहुंचाने का जिम्मा और बदले में सख्त प्रतिरोध
इंग्लैंड के खिलाफ तीन मैचों की एकदिवसीय श्रृंखला शुरू होने से पहले ही चयनकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। इस रणनीति को लेकर टीम प्रबंधन के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के कुछ प्रमुख पदाधिकारियों का भी मौन समर्थन हासिल था। सबसे पेचीदा काम था इस फैसले की जानकारी सीधे रोहित को देना।
इस नाजुक काम के लिए दक्षिण क्षेत्र के चयनकर्ता प्रज्ञान ओझा को आगे किया गया, जिनके संबंध रोहित के साथ काफी पुराने और दोस्ताना रहे हैं। ओझा ने कप्तान के सामने चयन समिति का नजरिया रखा, लेकिन नतीजा उम्मीद के उलट रहा। रोहित अपने करियर और योगदान को देखते हुए इस तरह पीछे हटने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होंने इस कदम को अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ माना और समिति के सामने झुकने के बजाय बोर्ड के एक बेहद प्रभावशाली प्रशासक से सीधे संवाद साधकर हस्तक्षेप की मांग कर दी।
प्रशासनिक बयानबाजी और अधिकारों पर सीधी चोट
दोनों पक्षों के बीच जारी खींचतान तब खुलकर सामने आ गई जब लॉर्ड्स में खेले जाने वाले अंतिम वनडे मुकाबले से ठीक पहले बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने सार्वजनिक टिप्पणी कर दी। सैकिया का यह रुख चयनकर्ताओं की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार माना गया। उन्होंने मीडिया में चल रही उन तमाम बातों को खारिज कर दिया जिनमें कहा जा रहा था कि लॉर्ड्स का मैच रोहित के लिए विदाई जैसा हो सकता है।
सैकिया ने साफ शब्दों में कहा कि रोहित को हटाने पर कोई विचार नहीं हुआ है और वे जब तक टीम की योजनाओं में शामिल हैं, भारत के लिए वनडे खेलना जारी रखेंगे। इस बयान ने अगरकर की स्थिति को पूरी तरह कमजोर कर दिया, क्योंकि चयन समिति के अधिकारों को सार्वजनिक तौर पर दरकिनार कर दिया गया था।
लॉर्ड्स में कप्तानी पारी और चयन समिति की बेबसी
बोर्ड सचिव के बयान के बाद लॉर्ड्स के मैदान पर जो कुछ हुआ, उसने चयनकर्ताओं की स्थिति को और असहज बना दिया। भारतीय टीम को उस मैच में शिकस्त जरूर झेलनी पड़ी, लेकिन रोहित ने एक दर्शनीय शतकीय पारी खेलकर आलोचकों को करारा जवाब दिया। इस पारी ने यह साबित कर दिया कि वे क्रीज पर अभी भी पूरी तरह सक्षम हैं।
मैदान पर बने इस शतक और बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों के रुख ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि किसी सुपरस्टार खिलाड़ी को उसकी मर्जी के बिना बाहर करने का अधिकार या ताकत मुख्य चयनकर्ता के पास नहीं है। अपने फैसलों के खारिज होने और बोर्ड के व्यवहार से आहत अगरकर के सामने अपनी भूमिका को लेकर कड़ा आत्ममंथन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और लक्ष्मण के साथ खींचतान
अगरकर की मुश्किलें सिर्फ सीनियर खिलाड़ियों तक सीमित नहीं थीं। बेंगलुरु स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी के प्रमुख वीवीएस लक्ष्मण के साथ भी उनके नीतिगत मतभेद लगातार गहरा रहे थे। लक्ष्मण की सोच हमेशा से यह रही कि हर दौरे और टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध खिलाड़ियों की मजबूत टीम भेजी जाए। दूसरी ओर, अगरकर ने इस नीति पर सवाल उठाते हुए एशियाई खेलों जैसे आयोजनों में पहली पसंद की पूरी ताकतवर टीम भेजने के औचित्य पर असहमति जताई थी।
दोनों दिग्गजों के बीच दूसरा बड़ा विवाद शेड्यूलिंग को लेकर खड़ा हुआ। 'इंडिया ए' के मुकाबलों, घरेलू टूर्नामेंट ईरानी कप और राष्ट्रीय टीम के अंतरराष्ट्रीय दौरों के बीच तारीखों के टकराव ने तालमेल बिगाड़ दिया। इसके अलावा, केंद्रीय अनुबंध के तहत आने वाले अनफिट खिलाड़ियों के रिहैबिलिटेशन और उनकी मैदान पर वापसी के समय को लेकर भी दोनों पक्षों में सहमति नहीं बन पा रही थी। अगरकर ने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के काम करने के तौर-तरीकों पर खुलकर सवाल उठाए, जिसने दोनों पक्षों के बीच अविश्वास को और बढ़ा दिया।



















