भारतीय क्रिकेट इतिहास के बेहद निडर और आक्रामक विकेटकीपर बल्लेबाजों में गिने जाने वाले 88 वर्षीय फारूख इंजीनियर पिछले 53 वर्षों से एक अनोखी और दर्दभरी प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। जब वे अपने खेल करियर के बेहतरीन दौर में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तब भारत सरकार ने उन्हें चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री देने की घोषणा की थी। हालांकि, आधी सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह आधिकारिक सम्मान उन तक नहीं पहुंच पाया है। आज 88 वर्ष की अवस्था में भी फारूख इंजीनियर को इस बात का मलाल है कि उन्हें न तो कभी कोई आधिकारिक पत्र मिला और न ही देश के राष्ट्रपति के हाथों यह पदक प्राप्त करने का अवसर मिल सका।
इंग्लैंड का दौरा, संचार की कमी और आधी सदी का इंतजार
फारूख इंजीनियर ने 53 साल पुराने इस मामले की यादों को साझा करते हुए बताया कि जब सरकार की तरफ से उनके लिए पद्म श्री सम्मान का ऐलान किया गया था, उस समय वे इंग्लैंड में काउंटी और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने में व्यस्त थे। वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत में आज की तरह आधुनिक संचार साधन, ईमेल या मोबाइल फोन मौजूद नहीं थे। उस दौर में किसी भी महत्वपूर्ण सूचना का मुख्य जरिया समाचार पत्र ही हुआ करते थे। भारतीय टीम के तत्कालीन मैनेजर हेमू अधिकारी ने समाचार पत्रों में छपी खबरों को पढ़कर फारूख इंजीनियर को इस बड़ी खुशखबरी के बारे में सूचित किया था।
उस समय की घटना का जिक्र करते हुए फारूख इंजीनियर ने बताया, "मैंने हेमू अधिकारी से कहा था कि मुझे भारत सरकार की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक पत्र या सूचना नहीं मिली है।" इस पर टीम मैनेजर ने उन्हें ढांढस बंधाया था और आश्वासन दिया था कि सरकार बहुत जल्द औपचारिक रूप से पत्र भेजकर उन्हें सूचित करेगी। लेकिन वह आधिकारिक निमंत्रण 53 साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद उन तक कभी नहीं पहुंच सका।
सरकारी बुलावा आने की आस में कई दशक गुजर गए। इंग्लैंड में स्थाई रूप से बस जाने के कारण फारूख इंजीनियर ने किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने के बजाय सरकार की अपनी पहल का इंतजार करना ही बेहतर समझा। उनका मानना था कि देर-सवेर कोई न कोई प्रशासनिक अधिकारी इस भूल को सुधारकर उनसे जरूर संपर्क करेगा। लेकिन जब सालों तक कोई प्रगति नहीं हुई, तो उन्होंने अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए।
अरुण जेटली से चर्चा से लेकर जय शाह को पत्र तक
दशकों के इस खामोश इंतजार के बाद फारूख इंजीनियर ने इस मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने की कोशिश की। उन्होंने अपने जीवनकाल के दौरान देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीसीसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष अरुण जेटली से इस विषय पर विस्तार से चर्चा की थी। अरुण जेटली के निधन के बाद भी मामला लटका रहा।
हाल ही में फारूख इंजीनियर ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के चेयरमैन जय शाह को पत्र लिखकर अपनी इस लंबे समय से चली आ रही व्यथा से अवगत कराया है। जय शाह ने उनकी बात को सहानुभूतिपूर्वक सुना और इस संबंध में हर संभव मदद का आश्वासन दिया है। जीवन के इस पड़ाव पर 88 वर्ष की उम्र में फारूख इंजीनियर एक बार फिर यह कोशिश कर रहे हैं ताकि उन्हें उनका वाजिब सम्मान प्राप्त हो सके।
बीसीसीआई की पहल और राष्ट्रपति भवन जाने की अंतिम इच्छा
फारूख इंजीनियर के इस खुलासे के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) हरकत में आ गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, बीसीसीआई इस मामले को अत्यंत गंभीरता से ले रहा है। बोर्ड बहुत जल्द खेल मंत्रालय और केंद्र सरकार को एक औपचारिक पत्र भेजने की प्रक्रिया में है ताकि 53 साल पुरानी इस प्रशासनिक चूक को ठीक किया जा सके।
फारूख इंजीनियर के लिए यह पद्म श्री केवल एक धातु का पदक नहीं है, बल्कि देश के प्रति उनकी दशकों की निष्ठा और खेल योगदान की राष्ट्रीय पहचान है। अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए फारूख इंजीनियर ने कहा, "मैं अब 88 वर्ष का हो चुका हूं, मेरी बस यही इच्छा है कि मैं राष्ट्रपति भवन जाकर राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान प्राप्त करूं।" उन्हें पूरी उम्मीद है कि उनका यह पांच दशकों से भी लंबा इंतजार जल्द ही समाप्त होगा।
पद्म श्री का महत्व और फारूख इंजीनियर का शानदार क्रिकेट करियर
भारत में पद्म श्री पुरस्कार कला, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, खेल, चिकित्सा, उद्योग और समाज सेवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट और उत्कृष्ट योगदान देने वाले नागरिकों को प्रदान किया जाता है। इस प्रतिष्ठित सम्मान के तहत राष्ट्रपति के हस्ताक्षर वाली एक सनद यानी प्रमाण पत्र और एक पदक प्रदान किया जाता है। यद्यपि इसमें कोई नकद पुरस्कार, पेंशन या भत्ता शामिल नहीं होता, लेकिन इसका सामाजिक और नैतिक मूल्य किसी भी खिलाड़ी के लिए अमूल्य होता है।
फारूख इंजीनियर ने 1961 से 1975 के बीच भारतीय क्रिकेट टीम के लिए 46 टेस्ट मैच और 5 वनडे इंटरनेशनल मैच खेले। वे अपने दौर के सबसे साहसी, शैलीदार और आक्रामक क्रिकेटरों में गिने जाते थे। विकेट के पीछे अपनी असाधारण फुर्ती और विकेट के आगे अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से उन्होंने भारत को कई ऐतिहासिक मैचों में जीत दिलाई। भारतीय खेल जगत में इतना बहुमूल्य योगदान देने वाले खिलाड़ी का 53 वर्षों तक अपने सम्मान की बाट जोहना बेहद निराशाजनक है। अब खेल प्रेमियों को उम्मीद है कि बीसीसीआई और खेल मंत्रालय की संयुक्त पहल से इस पुरानी भूल को सुधारा जाएगा और फारूख इंजीनियर को राष्ट्रपति भवन में पूरे सम्मान के साथ अलंकृत किया जाएगा।


















