भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सफल और महान स्पिनरों में गिने जाने वाले हरभजन सिंह ने अपने खेल जीवन के कई अनछुए पहलुओं से पर्दा उठाया है। उन्होंने अपने लंबे करियर के दौरान आए उतार-चढ़ाव और शुरुआती दौर की मुश्किलों का खुलकर जिक्र किया है। भारत के लिए 367 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेलने वाले इस दिग्गज खिलाड़ी का सफर कभी भी आसान नहीं रहा है, खासकर तब जब उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट में बिल्कुल नए कदम रखे थे। अपने दौर की कई चर्चित घटनाओं पर बात करते हुए उन्होंने उन दिनों को याद किया जब उनका सामना बेहद कठिन परिस्थितियों से हुआ था।
शुरुआती करियर में एक्शन पर विवाद और वापसी
हरभजन सिंह ने एक खास कार्यक्रम के दौरान अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उन्हें खेल के प्रति प्रेरणा कपिल देव को देखकर मिली थी। वे महज 17 साल की कम उम्र में ही भारतीय टीम का हिस्सा बन गए थे, लेकिन उनके करियर की शुरुआत में ही मुश्किलें खड़ी हो गईं। बॉलिंग एक्शन को लेकर उठे विवाद की वजह से उन्हें बहुत जल्द ही टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। उस समय इस प्रकार की परिस्थिति का सामना करना उनके लिए बेहद निराशाजनक रहा। हालांकि, उस दौर में उनके परिवार ने उनका हर कदम पर साथ निभाया और पूरा समर्थन दिया, जिसके बल पर वे दोबारा जोरदार वापसी करने में कामयाब रहे।
एनसीए से निकाले जाने का कड़वा अनुभव
करियर के कठिन दौर के बारे में बात करते हुए हरभजन ने नेशनल क्रिकेट एकेडमी यानी एनसीए से जुड़े वाकये का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि साल 2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली गई ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज से ठीक पहले उनके पिता का निधन हो गया था। वह व्यक्तिगत रूप से उनके जीवन का सबसे भारी और दुखद समय था, लेकिन अपने दिवंगत पिता के सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने हार नहीं मानी और डटे रहे। इसके अलावा उन्होंने उस वाकये को भी याद किया जब उन्हें एनसीए से निकाल दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह फैसला उन्हें बेहद नागवार गुजरा था, क्योंकि उन्होंने केवल अपने और बाकी खिलाड़ियों के हक तथा अधिकारों के लिए अपनी आवाज उठाई थी।
मैदान पर आक्रामक तेवर की असली वजह
मैदान पर अपने उग्र और आक्रामक अंदाज के लिए मशहूर रहे हरभजन ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि वे खेल के दौरान इतने आक्रामक क्यों रहते थे। उन्होंने समझाया कि जब आप ऑस्ट्रेलिया जैसी बेहद मजबूत और आक्रामक टीम के खिलाफ मैदान पर उतरते हैं, तो आपको भी उनके जैसी ही रणनीति अपनानी पड़ती है। ऐसी स्थिति में लोहा लोहे को काटता है वाली कहावत चरितार्थ होती है। मैदान के अंदर विपक्षी खिलाड़ियों के साथ पंगा लेना और आक्रामक तेवर दिखाना उनकी मैच की योजना का एक अहम हिस्सा हुआ करता था। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि मैदान के बाहर और ड्रेसिंग रूम के भीतर उनका स्वभाव इसके बिल्कुल विपरीत बेहद शांत और मजाकिया किस्म का था।



















