मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में जब सेंट्रल जिमखाना मैदान के भीतर कदम रखो, तो बाहर की सड़कों की हलचल एकदम पीछे छूट जाती है। पिच की तरफ बढ़ते अस्सी साल के बुजुर्ग नरेंद्र मेनन को देखकर कोई भी दंग रह सकता है। जीवन के इस पड़ाव पर जहां अधिकांश लोग शांति और आराम को प्राथमिकता देते हैं, वहीं नरेंद्र मेनन के कदम आज भी उसी जगह टिकते हैं जहां गेंद, बल्ला और स्टंप्स की लड़ाई चल रही हो। भले ही वर्ष 1998 में उनका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंपायरिंग का औपचारिक सफर समाप्त हो गया था, लेकिन खेल के मैदान के साथ उनका आत्मीय नाता आज भी उतना ही गहरा है। उनके बेटे नितिन मेनन इस वक्त विश्व क्रिकेट में अंपायरिंग की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं, मगर पिता नरेंद्र मेनन के लिए आज भी धूल भरी 22 गज की पट्टी ही सबसे बड़ा आशियाना है।
सेंट्रल जिमखाना और महाराजा यशवंत राव क्रिकेट क्लब से आधा सदी पुराना नाता
सेंट्रल जिमखाना मैदान में अभ्यास करने वाले नन्हे क्रिकेटर और प्रशिक्षक जब नरेंद्र मेनन को देखते हैं, तो उनका अभिनंदन 'जय हिंद' बोलकर और चरण स्पर्श करके करते हैं। यह आदर और स्नेह क्रिकेट के लिए दी गई उनकी पांच दशकों से ज्यादा की निष्ठावान सेवा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 1960 के दशक से 'महाराजा यशवंत राव क्रिकेट क्लब' (MYCC) का अभिन्न हिस्सा रहे नरेंद्र मेनन अब 12 से 15 आयु वर्ग के बालक खिलाड़ियों के मुकाबलों में अंपायर की जिम्मेदारी निभाते हैं। मैदान पर उनका काम सिर्फ उंगली उठाकर निर्णय देना भर नहीं है, बल्कि वे मुकाबले के हर क्षण में उभरते खिलाड़ियों को क्रिकेट के बुनियादी कायदे और पेचीदगियां समझाते हैं।
मैदान के बीच छोटी गलतियों को सुधारने की अनूठी पाठशाला
खेल के दौरान बच्चों से होने वाली छोटी-मोटी चूकों को सुधारना नरेंद्र मेनन की रोजमर्रा की आदत में शामिल हो चुका है। जब नए खिलाड़ी रन आउट की गुहार लगाते हैं, तो अक्सर उनके हाथों में गेंद ही नहीं होती। ऐसे मौकों पर वे खेल रोककर समझाते हैं कि बल्लेबाज को आउट करने के लिए गेंद का हाथों में होना अनिवार्य शर्त है। इसी तरह यदि स्टंप्स पर रखी गिल्लियां नहीं गिरी हैं, तो वे बताते हैं कि बेल्स गिरे बिना बल्लेबाज को पवेलियन नहीं भेजा जा सकता। जब कोई गेंद सीधे स्टंप्स बिखेर देती है और बच्चे जोश में 'हाउजैट' की अपील करने लगते हैं, तो वे मंद मुस्कान के साथ समझाते हैं कि क्लीन बोल्ड होने की स्थिति में अपील की कोई आवश्यकता नहीं होती। इसके अतिरिक्त वे मैच के दौरान ही फ्रंट-फुट और बैक-फुट नो-बॉल की बारीक सीमाएं भी समझाते हैं, क्योंकि उनका दृढ़ विश्वास है कि लाइव मुकाबले के बीच सीखी गई बातें बच्चों के मस्तिष्क में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं।
फर्स्ट क्लास क्रिकेटरों की अंपायरिंग में एंट्री और कोचिंग का दौर
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने वर्ष 1990 में एक युगांतरकारी निर्णय लिया, जिसके तहत पहली बार 10 पूर्व फर्स्ट क्लास खिलाड़ियों को अंपायरिंग पैनल में सम्मिलित करने की योजना बनी। नरेंद्र मेनन उस ऐतिहासिक प्रथम बैच का गौरवशाली हिस्सा बने थे। उस प्रतिष्ठित दल में उनके साथ एस. वेंकटराघवन तथा ए.वी. जयप्रकाश जैसी जानी-मानी हस्तियों ने भी इम्तिहान पास किया था। मैदान पर निर्णायक की भूमिका के बाद वे वर्ष 2007 से लेकर लगभग दस वर्षों तक अंपायरों के मार्गदर्शक और कोच के दायित्व में भी सक्रिय रहे।
बेटे नितिन मेनन को दिया गया सफलता का अचूक नुस्खा
जब उनके पुत्र नितिन मेनन ने केवल 22 वर्ष की आयु में अंपायरिंग की दिशा में कदम बढ़ाने की इच्छा जताई, तो नरेंद्र मेनन को बेहद आश्चर्य हुआ था। उस वक्त उन्होंने अपने बेटे को जो सीख दी थी, वह आज भी आधुनिक क्रिकेट में उतनी ही खरी साबित होती है। उनका स्पष्ट कहना था कि एक कुशल अंपायर बनने के लिए कभी भी खिलाड़ी का चेहरा नहीं देखना चाहिए। उन्होंने बेटे को समझाया कि उसका पूरा ध्यान सिर्फ कमर के नीचे गेंद, बल्ले और स्टंप्स पर ही केंद्रित रहना चाहिए। आज अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में दबाव झेलते हुए नितिन मेनन अपने पिता के इसी बुनियादी मंत्र पर अमल करते हैं।
कैमरों की बाढ़ और आधुनिक तकनीक का दबाव
आजकल के युग में निर्णय समीक्षा प्रणाली और कैमरों के जाल ने अंपायरों के कार्य को अत्यंत कठिन बना दिया है। तकनीक के इस युग पर चर्चा करते हुए नरेंद्र मेनन बताते हैं कि जब वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंपायरिंग करते थे, तब मैदान में केवल 5 से 6 कैमरे ही लगे होते थे। इसके विपरीत वर्तमान दौर के मुकाबलों में 20 से 25 से भी अधिक कैमरे हर कोण पर नजर गड़ाए रहते हैं। इस कारण अंपायर की किसी भी सूक्ष्म चूक को छिपाना असंभव हो जाता है और स्क्रीन पर तुरंत सच सामने आ जाता है।
रणजी ट्रॉफी के यादगार फाइनल और टाइगर पटौदी की विशेष टिप्पणी
अपने पूरे सफर में नरेंद्र मेनन के दिल के सबसे करीब मुंबई के मैदान पर हुए दो रणजी ट्रॉफी फाइनल मुकाबले हैं। पहला मैच वर्ष 2000 में हैदराबाद और मुंबई के बीच खेला गया था, जबकि दूसरा वर्ष 2003 में तमिलनाडु और मुंबई के मध्य हुआ था। वर्ष 2000 के उस खिताबी मुकाबले में मोहम्मद अजहरुद्दीन और वीवीएस लक्ष्मण के बीच 89 रनों की साझेदारी जम चुकी थी। उसी दौरान लक्ष्मण का रन आउट होना मेनन के करियर का सबसे ऐतिहासिक क्षण साबित हुआ। लक्ष्मण का बल्ला क्रीज से तनिक पीछे और हवा में उठा रह गया था। मेनन ने बिना किसी संशय के तुरंत आउट का इशारा कर दिया। बाद में भारत के पूर्व कप्तान टाइगर पटौदी ने अपने स्तंभ में इस सटीक फैसले की मुक्तकंठ से सराहना करते हुए लिखा था कि यदि मैदानी अंपायर इतने अचूक निर्णय दे सकते हैं, तो हमें तीसरे अंपायर की कोई जरूरत ही नहीं है।
पोते के आने से लौटी नई ऊर्जा और प्रतिभाओं का उभार
तकरीबन चार वर्ष पहले जब उनका पोता ऋषभ क्रिकेट सीखने मैदान पर उतरा, तो नरेंद्र मेनन एक बार फिर बच्चों को तराशने के लिए पूरी ऊर्जा से मैदान में कूद पड़े। यहां 25-25 खिलाड़ियों के दल बनाकर 50 ओवर के मैच आयोजित किए जाते हैं, जो शाम 4 बजे शुरू होकर रात 9 बजे तक अनवरत चलते हैं। आरंभ में देर होने की वजह से बच्चों के अभिभावक नाराजगी जताते थे, परंतु जब उन्होंने अपने बच्चों के खेल में जबरदस्त सुधार देखा, तो वे रात 10 बजे तक भी मैदान पर रुकने को सहर्ष तैयार हो गए।
नरेंद्र मेनन के इस निस्वार्थ समर्पण के परिणाम आज साफ नजर आते हैं। उनके क्लब एमवायसीसी से तैयार हुए करीब 30 प्रतिभावान खिलाड़ी वर्तमान में इंदौर डिविजन की टीमों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वहीं 5 से 6 होनहार क्रिकेटरों ने स्टेट टीम में भी अपनी जगह पक्की कर ली है। अस्सी वर्ष की उम्र में भी उनका उत्साह तनिक भी कम नहीं हुआ है और वे स्टंप्स के पीछे पूरी निष्ठा से खड़े होकर खेल के प्रति अपनी आजीवन प्रतिबद्धता निभा रहे हैं।



















