दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ डरबन के किंग्समीड मैदान पर पहले टेस्ट मुकाबले में उतरते ही ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने एक अनोखा और दुर्लभ कीर्तिमान स्थापित कर दिया। मैदान पर खेल शुरू होने से पहले ही इस मुकाबले ने रिकॉर्ड बुक में अपनी जगह बना ली, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की प्लेइंग इलेवन का हर एक सदस्य 30 वर्ष या उससे अधिक आयु का था। करीब 100 साल यानी लगभग एक पूरी सदी के लंबे इतिहास में यह पहला अवसर बना जब ऑस्ट्रेलिया ने अपनी सबसे उम्रदराज टेस्ट टीम को मुकाबले के लिए उतारा। इस पूरी प्लेइंग इलेवन की औसत आयु 34.59 वर्ष दर्ज की गई, जो पुरुष टेस्ट क्रिकेट के पूरे इतिहास में किसी भी टीम द्वारा मैदान पर उतारी गई सातवीं सबसे उम्रदराज एकादश के रूप में दर्ज हुई है।
टॉस जीतकर बल्लेबाजी का फैसला और शुरुआती झटके
इस ऐतिहासिक मुकाबले की शुरुआत में ऑस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया। हालांकि, डरबन की तेज और उछाल भरी पिच पर दक्षिण अफ्रीका के तेज गेंदबाजों के सामने मेहमान टीम की योजनाएं शुरुआती सत्र में ही लड़खड़ा गईं। दक्षिण अफ्रीकी तेज आक्रमण ने नई गेंद से सटीक लाइन और लेंथ पर गेंदबाजी करते हुए ऑस्ट्रेलियाई शीर्ष क्रम को दबाव में ला दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि शुरुआती 12 ओवरों के खेल में ऑस्ट्रेलिया ने सिर्फ 28 रन के कुल स्कोर पर अपने दो प्रमुख विकेट गंवा दिए। इस संकट की घड़ी में बल्लेबाजी करने आए निक मैडिसन पर टीम को संभालने की जिम्मेदारी थी, लेकिन उनका यह कमबैक बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।
एक सदी बाद कंगारू टीम की सबसे उम्रदराज एकादश
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के पूरे इतिहास में ऐसा पहला मौका रहा जब अंतिम एकादश का कोई भी खिलाड़ी 30 साल से कम उम्र का नहीं था। इस पूरी तरह अनुभवी लाइनअप में सबसे युवा खिलाड़ी के रूप में मैथ्यू रेनशॉ शामिल थे। 30 वर्षीय मैथ्यू रेनशॉ ने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में अपना पदार्पण साल 2016 में किया था। पुरुष टेस्ट क्रिकेट के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले जो छह सबसे उम्रदराज टीमें मैदान पर उतरी थीं, वे सभी 1920 के दशक के मध्य से लेकर अंत के बीच के दौर में खेली थीं। इस तरह लगभग सौ वर्षों के बाद आधुनिक क्रिकेट के युग में किसी टीम का इतने ऊंचे औसत उम्र के साथ उतरना एक दुर्लभ मिसाल बन गया।
तीस पार खिलाड़ियों वाली चुनिंदा टीमों की फेहरिस्त
सभी 30 से अधिक उम्र के खिलाड़ियों वाली प्लेइंग इलेवन उतारने के सिलसिले की शुरुआत बहुत पुरानी है। टेस्ट इतिहास में सबसे पहले इंग्लैंड ने साल 1921 में लीड्स के मैदान पर अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पूरी तरह 30 पार खिलाड़ियों वाली एकादश उतारी थी। उस दौर के बाद दशकों तक ऐसा संयोग अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में देखने को नहीं मिला। हालांकि, हालिया वर्षों में न्यूजीलैंड ने इस दुर्लभ रिकॉर्ड में कई बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। कीवी टीम ने साल 2022 और साल 2023 में कराची के मैदान पर पाकिस्तान के खिलाफ ऐसी एकादश उतारी थी। इसके अलावा न्यूजीलैंड ने 2023 में वेलिंगटन के मैदान पर इंग्लैंड के सामने भी सभी 30 से अधिक उम्र के खिलाड़ियों वाली टीम उतारी थी। अब डरबन के मैदान पर दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम इस विशिष्ट और चुनिंदा सूची में शामिल होने वाली सबसे नई टीम बन गई है।
निक मैडिसन का अनचाहा शून्य और 33 गेंदों का संघर्ष
डरबन टेस्ट में केवल ऑस्ट्रेलियाई टीम की औसत आयु ही चर्चा का केंद्र नहीं रही, बल्कि निक मैडिसन की अनचाही पारी ने भी सबका ध्यान खींचा। लगभग एक दशक यानी करीब दस साल बाद टेस्ट टीम में वापसी कर रहे मैडिसन के लिए यह मैच किसी बुरे सपने जैसा रहा। उन्होंने क्रीज पर टिकने के लिए कड़ा संघर्ष किया और 33 गेंदों का सामना किया, लेकिन वह अपना खाता खोलने में असफल रहे और शून्य के निजी स्कोर पर पवेलियन लौट गए। पुरुष टेस्ट क्रिकेट के पूरे इतिहास में किसी भी सलामी बल्लेबाज द्वारा बिना खाता खोले खेली गई यह तीसरी सबसे लंबी पारी दर्ज की गई। ओपनिंग बल्लेबाजों में उनसे आगे सिर्फ दो नाम हैं। पहले स्थान पर न्यूजीलैंड के डेरिन मरे हैं, जिन्होंने साल 1995 में श्रीलंका के खिलाफ शून्य पर आउट होने से पहले 39 गेंदों का सामना किया था। दूसरे स्थान पर जिम्बाब्वे के ट्रेवर ग्रिपर हैं, जिन्होंने साल 2000 में वेस्टइंडीज के खिलाफ 36 गेंदें खेलकर शून्य बनाया था।
माइक व्हिटनी के ऑस्ट्रेलियाई रिकॉर्ड के करीब
अगर केवल ओपनरों की नहीं बल्कि किसी भी बल्लेबाजी क्रम पर खेलने वाले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों की बात की जाए, तो मैडिसन एक और खास आंकड़े के करीब पहुंच गए। ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट इतिहास में शून्य पर आउट होने से पहले सबसे ज्यादा गेंदें खेलने का रिकॉर्ड केवल माइक व्हिटनी के नाम दर्ज है। माइक व्हिटनी ने साल 1981 में मैनचेस्टर के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ 42 गेंदों का सामना किया था और बिना कोई रन बनाए आउट हुए थे। मैडिसन 33 गेंदों के साथ इस सूची में माइक व्हिटनी के बाद दूसरे सबसे धीमे कंगारू बल्लेबाज बन गए जिन्होंने खाता नहीं खोला।
नौ साल से ज्यादा का इंतजार और दूसरा सबसे लंबा अंतराल
पैंतीस वर्ष के निक मैडिसन के लिए यह टेस्ट वापसी व्यक्तिगत रूप से भावनात्मक और संघर्षों से भरी रही है। उन्होंने नौ साल और 283 दिन के भारी अंतराल के बाद अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट के मैदान पर वापसी की। ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट इतिहास में दो टेस्ट मैचों के बीच किसी खिलाड़ी का यह दूसरा सबसे लंबा गैप है। इस मामले में शीर्ष स्थान पर बॉब सिम्पसन का नाम है, जिनका दो टेस्ट मैचों के बीच का इंतजार नौ साल और 305 दिन का रहा था। इस सूची में तीसरे स्थान पर एर्नी मेने काबिज हैं, जिनके दो मुकाबलों के बीच नौ साल और 104 दिन का अंतराल दर्ज किया गया था।
कैंसर को मात देकर मैदान पर वापसी की मिसाल
इस ऐतिहासिक वापसी के सफर में मैडिसन के नाम एक और असाधारण रिकॉर्ड दर्ज हुआ। उन्होंने अपने दो टेस्ट मैचों के बीच लगातार 88 टेस्ट मैच मिस किए। इसके साथ ही उन्होंने ब्रैड हॉग और टिम पेन को पीछे छोड़ दिया, जिन्होंने अपने टेस्ट करियर के दौरान 78-78 लगातार टेस्ट मैच मिस किए थे। मैडिसन का यह लंबा अलगाव सिर्फ चयनकर्ताओं की अनदेखी या फॉर्म की वजह से नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने जीवन की सबसे कठिन जंग लड़ी। टेस्ट टीम में दोबारा चुने जाने से पहले उन्होंने शेफील्ड शील्ड का पिछला पूरा घरेलू सीजन टेस्टिकुलर कैंसर के इलाज और उससे उबरने में बिताया था।
579 दिनों के लंबे ब्रेक के बाद प्रथम श्रेणी क्रिकेट का सफर
गंभीर बीमारी और उसके लंबे उपचार से उबरकर शीर्ष स्तर के क्रिकेट में लौटना कभी भी आसान नहीं होता। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में दोबारा कदम रखने से पहले मैडिसन का ब्रेक 579 दिनों का रहा। ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट इतिहास में 1900 से 1901 के बीच जो डार्लिंग द्वारा लिए गए 676 दिनों के अंतराल के बाद, किसी भी ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी द्वारा पुरुष टेस्ट मैच खेलने से पहले का यह सबसे लंबा ब्रेक दर्ज किया गया। इस तरह डरबन टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया की उम्रदराज टीम और निक मैडिसन का यह कठिन सफर क्रिकेट इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।


















