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राजधानी में कड़े पहरे और 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे कपिल सिब्बलदिल्ली
9 अक्तू॰ 2026, 3:07 pm (1 घंटे पहले)· 3

राजधानी में कड़े पहरे और 57 मेट्रो स्टेशन बंद करने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे कपिल सिब्बल

कॉकरोच जनता पार्टी के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में आवाजाही रोकने और ट्रेनें निरस्त करने पर शीर्ष अदालत में सुनवाई हुई।

दस अक्टूबर को प्रस्तावित एक राजनीतिक कार्यक्रम से ठीक पहले देश की राजधानी में व्यापक सुरक्षा घेराबंदी और सामान्य आवागमन ठप किए जाने का विवाद 9 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया। कॉकरोच जनता पार्टी की तरफ से बुलाए गए विरोध कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए शहर के 57 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के द्वार बंद करने, रेलवे सेवाओं को निरस्त करने और चप्पे-चप्पे पर भारी सुरक्षा तैनात करने के प्रशासनिक कदमों को वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सांसद कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ के समक्ष उठाया। उन्होंने शहरवासियों की सामान्य जिंदगी पूरी तरह बंधक बनने का आरोप लगाते हुए शीर्ष मंच से त्वरित हस्तक्षेप की मांग रखी।

नागरिकों की पूर्ण नाकेबंदी पर तीखी दलीलें

अदालत के कक्ष में दिल्ली के असामान्य हालात का विवरण रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने बेहद सख्त लहजे में अपना पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की पीठ को अवगत कराया कि सार्वजनिक परिवहन के पहिए थाम दिए गए हैं और आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। सिब्बल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, “इंसान कहीं आ-जा नहीं सकता. मेरे देश में यह क्या हो रहा है?” उनकी दलील थी कि किसी भी शांतिपूर्ण जमावड़े से पहले पूरी आबादी के बुनियादी अधिकारों को इस तरह बंधक बनाना संवैधानिक व्यवस्था के सर्वथा विपरीत है।

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इसी सुर में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार किए। उन्होंने शहरव्यापी पाबंदियों को प्रशासनिक अक्षमता बताते हुए अदालत से कहा, “आप सिर्फ़ इसलिए पूरा शहर बंद नहीं कर सकते क्योंकि आप इसे संभालने में नाकाम हैं.” वकीलों ने पीठ को बताया कि किसी संभावित अव्यवस्था की आड़ में पूरे महानगर को ठप कर देना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सोलह पन्नों का दस्तावेज और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई

याचिकाकर्ताओं की ओर से पीठ के विचारार्थ 16 पृष्ठों का एक विस्तृत संकलन प्रस्तुत किया गया। इस दस्तावेज में स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा जारी विभिन्न यातायात परामर्श, बीएनएसएस की धारा 163 लागू किए जाने का आधिकारिक आदेश, कई ट्रेनों के परिचालन निरस्त होने तथा मोबाइल ऐप आधारित टैक्सी सेवाओं पर थोपी गई रुकावटों से जुड़े जमीनी ब्योरे संकलित थे।

इतना ही नहीं, इस संकलन में उन कदमों का भी स्पष्ट उल्लेख था जिनके तहत पुलिस बल शहर के आवासीय कल्याण संगठनों यानी आरडब्ल्यूए और धर्मस्थलों के प्रतिनिधियों से लगातार संपर्क साध रहे थे। साथ ही शहर के होटलों, लॉज और हॉस्टलों में सघन तलाशी अभियान चलाए जाने की घटनाओं को भी अदालत के संज्ञान में लाया गया। वकीलों का कहना था कि प्रशासन ने अनुमति खारिज करने के बाद सुरक्षा के नाम पर पूरे शहर में डर और अवरोध का वातावरण निर्मित कर दिया है।

अधिकारों की सीमा और संतुलन पर पीठ का दृष्टिकोण

नागरिकों के एकत्र होने और असहमति दर्ज कराने के मौलिक पहलू पर विचार करते हुए पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि हर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति वैधानिक दायरे के भीतर ही रहनी चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि समूह बनाने का अधिकार निर्विवाद रूप से नागरिकों के पास है, किंतु इस स्वतंत्रता का उपभोग स्थापित कानूनों की परिधि में रहकर ही संभव है।

जब वकीलों ने स्पष्ट किया कि आयोजकों ने पूर्व अनुमति मांगी थी जिसे अस्वीकार कर दिया गया, तब न्यायमूर्ति बागची ने जमीनी वास्तविकताओं को तौलने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा, “अगर विरोध प्रदर्शन इजाजत के साथ किया जाता है, तो यह कानूनी विरोध है.” इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों के असहमति व्यक्त करने के अधिकार से अदालत कभी इनकार नहीं करती, भले ही ऐसे कदम अपने जोखिम पर उठाए जा रहे हों।

दोनों पक्षों की मौजूदगी पर अदालत का रुख

पाबंदियों के प्रभाव पर विमर्श करते हुए पीठ ने संतुलन साधने को बेहद अनिवार्य माना। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया कि एकतरफा निषेध लगाना क्या न्यायोचित होगा, क्योंकि असहमति व्यक्त करने का अधिकार सीधे तौर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से स्थिति स्पष्ट करने को कहा, “अगर हमारे सामने दोनों पक्ष नहीं हैं तो हम संतुलन कैसे बनाएं?”

सर्वोच्च अदालत ने यह भी जानना चाहा कि प्रस्तावित कार्यक्रम की वास्तविक कमान किसके हाथों में है और कितनी तादाद में लोगों के दिल्ली में जुटने की संभावना है। पीठ का मानना था कि एक तरफ अपने दैनिक जीवन और अधिकारों के संरक्षण की गुहार लगा रहे सामान्य नागरिक हैं, जबकि दूसरी तरफ अपनी आवाज उठाने का इच्छुक समूह है। चूंकि दूसरा पक्ष उस समय उपस्थित नहीं था, इसलिए अदालत ने स्पष्ट तथ्यों की अपेक्षा की। याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधियों ने भरोसा दिलाया कि वे सभी अपेक्षित तथ्यों और विस्तृत जानकारियों के साथ पुनः पीठ के समक्ष उपस्थित होंगे।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला किस मुद्दे को लेकर पहुंचा?
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, ट्रेनें रद्द करने और धारा 163 लागू करने के खिलाफ यह याचिका दायर की गई।
कपिल सिब्बल ने चीफ जस्टिस की पीठ के सामने क्या दलील दी?
कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि सार्वजनिक परिवहन बंद होने से आम नागरिक कहीं आ-जा नहीं पा रहे हैं और इस स्थिति में अदालत को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कितने पन्नों का दस्तावेज सौंपा?
याचिकाकर्ताओं ने 16 पन्नों का संकलन सौंपा, जिसमें पुलिस एडवाइजरी, धारा 163 का आदेश, ट्रेन रद्दीकरण और होटल जांच से जुड़े विवरण शामिल थे।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर क्या टिप्पणी की?
जस्टिस बागची ने कहा कि संगठन बनाने और विरोध करने का अधिकार मौजूद है, लेकिन इसका प्रयोग वैधानिक ढांचे और कानून के नियमों के तहत ही किया जाना चाहिए।
अदालत ने वकीलों से क्या अतिरिक्त जानकारी मांगी?
पीठ ने पूछा कि प्रदर्शन का मुख्य आयोजक कौन है और इसमें कितने लोगों के शामिल होने का अनुमान है, जिसके बाद वकीलों ने पूर्ण विवरण लाने की बात कही।
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·42 मिनट पहले

एक राजनीतिक विरोध के चक्कर में पूरे शहर को बंधक बना लेना कहाँ की समझदारी है? आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी इस तरह ठप नहीं की जानी चाहिए।

Karan Malhotra@karan-malhotra·42 मिनट पहले

रोहन भाई, बात सही है कि परेशानी होती है, पर सुरक्षा का मामला भी देखना पड़ता है। कई बार खुफिया इनपुट इतने कड़े होते हैं कि प्रशासन को ऐसा कदम उठाना ही पड़ता है।

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