अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मैदान पर यशस्वी जायसवाल के लिए मौजूदा समय काफी चुनौतीपूर्ण चल रहा है और गॉल के बाद कोलंबो में भी वह अच्छी शुरुआत को बड़े स्कोर में तब्दील करने में नाकामयाब रहे हैं। इस बात से क्रिकेट विशेषज्ञ और खुद यशस्वी दोनों ही खासे परेशान नजर आ रहे हैं। हर कोई इस तथ्य से सहमत है कि उनके खेल में अपार प्रतिभा और क्षमता है, लेकिन आधुनिक क्रिकेट के इस दौर में लगातार खराब प्रदर्शन के लिए किसी भी खिलाड़ी के पास लंबा धैर्य नहीं बचा है। खासकर तब जब बेंच पर प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की लंबी कतार मौजूद हो और हर एक नाकामी चयन को लेकर नए सवाल खड़े कर देती है। यशस्वी अब इन कड़वी सच्चाइयों का सामना अपने अनुभवों के जरिए कर रहे हैं, और श्रीलंका के खिलाफ गॉल तथा कोलंबो में खेली गई उनकी तीन पारियां उनके संघर्षों को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।
शॉट चयन और वैभव सूर्यवंशी का प्रभाव
खेल के जानकारों का मानना है कि यशस्वी जायसवाल के जरूरत से ज्यादा शॉट खेलने की प्रवृत्ति का संबंध वैभव सूर्यवंशी से भी जुड़ता है। पिछले दो आईपीएल सीजन से वैभव के साथ पारी की शुरुआत करने की वजह से वह कई बार दबाव महसूस करते हैं और उनकी चर्चा भी तुलनात्मक रूप से कम होती है। इस वजह से शायद वह उन अनचाहे शॉट्स को खेलने का प्रयास कर रहे हैं जो पहले कभी उनकी बल्लेबाजी शैली का हिस्सा नहीं हुआ करते थे। इसके अलावा, केवल एक ही फॉर्मेट में खेल पाने की छटपटाहट भी उनके मानसिक और व्यक्तिगत संतुलन को प्रभावित कर रही है। गॉल और कोलंबो की इन पारियों का निराशाजनक अंत एक ऐसे दौर को और आगे बढ़ाता है जो पिछले कई महीनों से लगातार चला आ रहा है।
पिछली पारियों के आंकड़े और दिल्ली टेस्ट के बाद गिरावट
अक्टूबर के महीने में दिल्ली के मैदान पर वेस्टइंडीज के खिलाफ खेली गई 175 रनों की शानदार पारी के बाद से ही यशस्वी का बल्ला खामोश सा हो गया है। दिल्ली का वह मुकाबला आखिरी ऐसा अवसर था जब वह अपनी पूरी स्वाभाविक लय और आक्रामकता में दिखाई दिए थे, जहां उन्होंने गेंदबाजों पर पूरी तरह से दबाव बनाया था। इसके बाद खेली गई पिछली नौ पारियों में उन्होंने कुल 192 रन ही जोड़े हैं, जिसके दौरान उनका बल्लेबाजी औसत मात्र 18.38 का रहा है। इस समयावधि में उनका सर्वाधिक व्यक्तिगत स्कोर 58 रन रहा है और वह दो बार बिना खाता खोले यानी शून्य पर भी आउट हुए हैं। एक ऐसे बल्लेबाज के लिए जिसकी पूरी खेल शैली शुरुआती आक्रामकता और सोचे-समझे जोखिम पर टिकी हो, ये आंकड़े केवल फॉर्म की मामूली गिरावट से कहीं अधिक गंभीर स्थिति की ओर इशारा करते हैं।
राजस्थान रॉयल्स में ओपनिंग और बल्लेबाजी शैली का बदलाव
राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलते हुए यशस्वी, वैभव सूर्यवंशी के साथ मैदान पर पारी की शुरुआत करते हैं और पिछले सीजन में यह साफ महसूस हुआ कि वह वैभव की स्ट्रोकप्ले रेंज और बेखौफ अंदाज से काफी हद तक प्रभावित हो रहे हैं। यशस्वी अक्सर वैभव के साथ तालमेल बिठाने और उनके जैसे बड़े शॉट खेलने की कोशिश में अपनी मूल शैली से भटक जाते हैं, और शायद यही उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। जब वह जोस बटलर के साथ ओपनिंग किया करते थे, तब उनका खेलने का एक अलग ही स्वाभाविक और अनूठा अंदाज था, लेकिन अब ऐसा प्रतीत होता है कि वह वैभव की छाया में खेल रहे हैं। यशस्वी को यह बात जल्द समझनी होगी कि वह एक पावर हिटर नहीं बल्कि एक क्लासिक बल्लेबाज हैं जो हर प्रारूप में ढल सकते हैं, लेकिन टी-20 शैली के शॉट खेलकर बड़े फॉर्मेट में अपना विकेट गंवाना उनके लिए एक बड़ी परेशानी बनता जा रहा है।
कट शॉट की कमजोरी और आंकड़े
इस पूरे खराब दौर के केंद्र में एक बहुत बड़ा विरोधाभास साफ नजर आता है, जहां उनका सबसे मजबूत हथियार रहा कट शॉट अब उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। विपक्षी गेंदबाजों ने भी अपनी रणनीति में बदलाव कर लिया है और वह उन्हें खुलकर हाथ खोलने का कोई मौका नहीं दे रहे हैं या फिर शरीर से दूर खेलने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इस बात की गवाही मैदान पर उनके आंकड़े भी पूरी तरह से देते हैं। इंग्लैंड के दौरे के समय इस विशेष शॉट पर उनका बल्लेबाजी औसत 73.25 का था और गलत शॉट खेलने का प्रतिशत मात्र 31.1% था। इसके विपरीत, दिल्ली टेस्ट के बाद के इस निराशाजनक दौर में कट शॉट पर उनका औसत गिरकर सीधे 11.75 रह गया है, जबकि गलत शॉट खेलने का प्रतिशत बढ़कर 48.1% तक पहुंच गया है। जिस शॉट ने कभी मैदान पर उनके दबदबे को स्थापित किया था, वही आज उनके आउट होने की सबसे बड़ी वजह बन रहा है।
शानदार करियर रिकॉर्ड और उपलब्धियां
इन तमाम मौजूदा असफलताओं के बावजूद इनमें से कोई भी बात यशस्वी जायसवाल के अब तक के शानदार करियर और उपलब्धियों को कम नहीं आंक सकती है। उन्होंने अपने अब तक के 30 टेस्ट मैचों में 48.43 की औसत से कुल 2,567 रन बनाए हैं, जिसमें सात शानदार शतक और तेरह अर्धशतक शामिल हैं। राजकोट के मैदान पर इंग्लैंड के खिलाफ खेली गई उनकी नाबाद 214 रनों की पारी उनका अब तक का सबसे उच्चतम स्कोर रही है। 24 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले सात टेस्ट शतक जड़ने के मामले में वह केवल सचिन तेंदुलकर से पीछे हैं, जिन्होंने 11 शतक बनाए थे। उनके इन सात शतकों में से पांच शतक ऐसे हैं जो 150 रनों से भी अधिक के रहे हैं, और इनमें इंग्लैंड के खिलाफ लगाए गए लगातार दो दोहरे शतक भी शामिल हैं। उन्होंने डोमिनिका, पर्थ, लीड्स, द ओवल और दिल्ली जैसी बिल्कुल भिन्न और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में यादगार शतक बनाए हैं।
भविष्य की राह और मानसिक सुधार की जरूरत
उनका लगभग 48.50 के आसपास का करियर औसत इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि उनकी क्षमता और काबिलियत पर कभी भी किसी भी प्रकार का संदेह नहीं किया जा सकता है। वह फिलहाल क्रिकेट करियर के उस दौर से गुजर रहे हैं जिसका सामना हर एक उभरते हुए और प्रतिभाशाली सलामी बल्लेबाज को अपने शुरुआती दिनों में करना ही पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर की टीमें उनकी आदतों और कमजोरियों का बारीकी से अध्ययन करती हैं और उनके खिलाफ नए जाल बुनती हैं, तो बाहर बेंच पर बैठे खिलाड़ियों की बेचैनी हर नाकामी के साथ और अधिक बढ़ जाती है। यशस्वी को अपने भीतर के गुस्से और ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना सीखना होगा, ताकि उनके प्रदर्शन का ग्राफ एक बार फिर से ऊपर की ओर बढ़ना शुरू हो सके।



















