मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त संगठन ने एक बड़ी और सख्त कार्रवाई को अंजाम दिया है। इस कार्रवाई के तहत इंदौर क्राइम ब्रांच के तत्कालीन इंस्पेक्टर समेत कुल चार लोगों के खिलाफ आधिकारिक तौर पर मुकदमा दर्ज किया गया है। यह पूरा मामला एक युवक को किसी कानूनी कार्रवाई से सुरक्षित बाहर निकालने और उसे रिहा करने के बदले में अवैध रूप से 1.20 लाख रुपये की भारी-भरकम रिश्वत मांगने से जुड़ा हुआ है। राज्य में पुलिस महकमे के भीतर रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
छतरपुर के महाराजपुर थाने की घटना का संदर्भ
इस तरह के मामलों की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके पहले छतरपुर जिले के महाराजपुर थाना परिसर से भी एक ऐसा ही संगीन मामला सामने आया था। उस घटना के दौरान न्याय न मिलने से अत्यधिक आहत होकर एक युवती ने थाने के भीतर ही जहर का सेवन कर लिया था। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के तुरंत बाद वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने तत्परता दिखाते हुए उस युवती को तत्काल इलाज के लिए स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया था, जहां उसकी स्थिति को संभाला गया था। पुलिस थानों में आम नागरिकों के साथ होने वाले बर्ताव और भ्रष्टाचार की वजह से जनता में लगातार रोष व्याप्त है।
रीगल स्क्वायर स्थित क्राइम ब्रांच दफ्तर से जुड़ा है मामला
ताजा मामला इंदौर के व्यस्त इलाके रीगल स्क्वायर पर स्थित क्राइम ब्रांच कार्यालय से जुड़ा हुआ बताया गया है। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब शिकायतकर्ता प्रीति हजारी ने 2 अप्रैल 2026 को सीधे लोकायुक्त कार्यालय से संपर्क किया। उन्होंने अधिकारियों के सामने लिखित शिकायत दर्ज कराई कि उनके बेटे प्रांजल हजारी को एक मामले और शिकायत के सिलसिले में क्राइम ब्रांच के दफ्तर बुलाया गया था। वहां मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों ने उस मामले को पूरी तरह रफा-दफा करने और शांत कराने के नाम पर अनुचित पैसों की मांग की थी।
ऑनलाइन और ऑफलाइन हुआ था रुपयों का लेनदेन
लोकायुक्त में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, इस पूरी रिश्वत की रकम का भुगतान अलग-अलग माध्यमों से किया गया था। शुरुआती समझौते के तहत 20 मार्च को दीपक पटेल नामक एक निजी व्यक्ति को UPI के आधुनिक डिजिटल माध्यम से 50,800 रुपये ट्रांसफर किए गए थे। इसके अलावा शेष बची हुई 70,000 रुपये की नकद राशि अलग से ली गई थी। इस प्रकार कुल मिलाकर 1.20 लाख रुपये की रिश्वत इन लोगों तक पहुंचाई गई थी, जिसके पुख्ता तकनीकी प्रमाण शिकायतकर्ता द्वारा जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराए गए हैं।
चार आरोपियों पर हुआ गंभीर धाराओं में मुकदमा
शिकायतकर्ता द्वारा सौंपे गए डिजिटल सबूतों, तकनीकी दस्तावेजों की गहराई से जांच करने और तथ्यों की पुष्टि करने के बाद लोकायुक्त ने आरोपों को पूरी तरह सही पाया। इसके आधार पर 24 अगस्त को औपचारिक रूप से मामला दर्ज कर लिया गया। इस एफआईआर में कुल चार लोगों को नामजद किया गया है, जिनमें क्राइम ब्रांच के तत्कालीन इंस्पेक्टर सुजीत श्रीवास्तव, तत्कालीन कॉन्स्टेबल अभय सिंह, विकास सेंधव और एक निजी व्यक्ति दीपक पटेल शामिल हैं। इन सभी आरोपियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 2018 की धारा 7 और भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 61(2) के अंतर्गत गंभीर धाराओं में केस दर्ज करके आगे की कानूनी जांच शुरू कर दी गई है।
लोकायुक्त अधिकारियों की सख्त चेतावनी और आगे की जांच
इस पूरी कार्रवाई के संबंध में जानकारी देते हुए लोकायुक्त अधिकारी आशुतोष मिठास ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह संपूर्ण मामला रीगल स्क्वायर स्थित क्राइम ब्रांच कार्यालय से ही जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस बात को दृढ़ता के साथ दोहराया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ राज्य में इस तरह की सख्त कार्रवाई का सिलसिला लगातार जारी रहेगा। अब औपचारिक रूप से एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद जांचकर्ताओं से यह उम्मीद की जा रही है कि वे पैसों के इस अवैध लेनदेन के हर एक पहलू का गहराई से पता लगाएंगे और सभी संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करेंगे। इसके साथ ही, रिश्वत के इस पूरे खेल में शामिल रहे प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत और प्रत्यक्ष भूमिका को तय करने के लिए तमाम डिजिटल फुटप्रिंट्स और वित्तीय लेन-देन के रिकॉर्ड की बारीकी से जांच की जाएगी ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।



















