सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार को एक विचाराधीन कैदी को छह लाख रुपये का मुआवजा देने का सख्त निर्देश 26 अक्टूबर को दिया है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि कैसे महज अटकलों और मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर एक निर्दोष व्यक्ति के जीवन के छह महत्वपूर्ण वर्ष सलाखों के पीछे बीत गए। अदालत ने माना कि यह मामला न्याय व्यवस्था के गंभीर उपहास का एक सटीक उदाहरण है और पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह से इस लचर व्यवस्था का शिकार बना है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ की दो टूक
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की इस महत्वपूर्ण पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि राज्य सरकार नागरिकों की सुरक्षा करने के अपने मूल दायित्व से कभी पीछे नहीं हट सकती है। अदालत ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति तब तक पूरी तरह से निर्दोष माना जाता है, जब तक कि अदालत में उसका अपराध साबित न हो जाए। इसके साथ ही, न्यायालय ने अभियोजन और जांच एजेंसियों को याद दिलाया कि उनका प्राथमिक उद्देश्य केवल किसी भी कीमत पर दोषसिद्धि हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि सच्चाई को सामने लाना होना चाहिए।
न्याय प्रणाली की भूमिका और निष्पक्षता
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि इन सभी एजेंसियों को खुद को न्याय प्रणाली का एक अभिन्न हिस्सा मानना बेहद जरूरी है। इनका असली काम न केवल शिकायतकर्ता, पीड़ित और घायल व्यक्ति को न्याय दिलाना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि आरोपी के साथ भी किसी प्रकार का अन्याय न हो। अदालत ने टिप्पणी की कि हालांकि कई मामलों में न्याय प्रक्रिया कमजोर नजर आती है, लेकिन वर्तमान मामला इतना अधिक चौंकाने वाला और स्पष्ट है कि इसमें पीड़ित को मुआवजा दिया जाना पूरी तरह से न्यायसंगत है क्योंकि वह पूरी व्यवस्था की खामियों का शिकार हुआ है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ याचिका
शीर्ष अदालत का यह बहुप्रतीक्षित फैसला एक आरोपी की तरफ से दायर की गई याचिका पर आया है। इस याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसमें जनवरी के महीने में आगरा में दर्ज हुए एक मामले में आरोपी को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि 23 मार्च को उसने निचली अदालत को यह सख्त निर्देश दिया था कि वह आगामी तीन महीने के भीतर इस पूरे मामले की सुनवाई को हर हाल में पूरा करे।
सुनवाई पूरी होने के बाद बरी हुआ आरोपी
सर्वोच्च अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए तय समय सीमा के भीतर सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई, जिसके अंत में याचिकाकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत ने इस मामले को इस बात का एक क्लासिक उदाहरण बताया कि आपराधिक मामलों में कभी भी इस स्तर की लापरवाही भरी जांच नहीं होनी चाहिए। ऐसी दोषपूर्ण जांच के कारण ही अभियोजन पक्ष ने एक आम नागरिक के जीवन और उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बहुत बड़े खतरे में डाल दिया था।
चौदह नवंबर 2019 से जेल में बंद था पीड़ित
न्यायालय की पीठ ने अपने आदेश में इस अहम तथ्य पर विशेष गौर किया कि याचिकाकर्ता को 14 नवंबर 2019 से लगातार जेल में बंद रखा गया था। अदालत ने इस स्थिति को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया कि बिना किसी ठोस सबूत के भी उस व्यक्ति को पूरे छह साल तक एक विचाराधीन कैदी की तरह जेल की यातनाएं झेलनी पड़ीं। बेहद लचर और गैर-जिम्मेदाराना जांच के बल पर अव्यवस्थित ढंग से मुकदमा चलाया गया, हालांकि राहत की बात यह रही कि अंततः आरोपी को अदालत से सम्मानजनक बरी कर दिया गया।
एक महीने के भीतर मुआवजा देने का आदेश
जांच प्रक्रिया और अभियोजन के इस पूरे तौर-तरीके पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका का आधिकारिक तौर पर निपटारा कर दिया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह स्पष्ट निर्देश दिया कि वह एक महीने की अवधि के भीतर याचिकाकर्ता के बैंक खाते में छह लाख रुपये की मुआवजा राशि का भुगतान करे। हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि हिरासत में काटे गए इन अनमोल वर्षों की भरपाई के लिहाज से यह मुआवजा राशि काफी कम है।



















