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बाबू देवकीनंदन जिस हवेली को बनवाकर कभी लौटे ही नहीं, जानें वजहकल्चर
2 घंटे पहले· 2

बाबू देवकीनंदन जिस हवेली को बनवाकर कभी लौटे ही नहीं, जानें वजह

वाराणसी की मशहूर देवकीनंदन हवेली को बाबू देवकीनंदन ने 10 बीघे जमीन पर बनवाया था, लेकिन एक लिफ्ट न मिलने के गुस्से में वो इसे छोड़कर हमेशा के लिए चले गए।

मीरा जोशीमीरा जोशीरिश्ते एवं वेलनेस संवाददाता 2 मिनट पढ़ें AI के लिए
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बनारस की गलियों में ऐसी कई हवेलियां छिपी हैं जिनके पत्थरों में सदियों पुरानी कहानियां दफन हैं। इन्हीं में से एक है बाबू देवकीनंदन की वह आलीशान हवेली, जिसे उन्होंने बड़े शौक से बनवाया लेकिन एक रात भी वहां नहीं गुजारी। इस हवेली की नक्काशी और बनावट आज भी लोगों को हैरान कर देती है।

कौन थे बाबू देवकीनंदन?

सीनियर जर्नलिस्ट हिमांशु राज पांडेय के मुताबिक, बाबू देवकीनंदन मूल रूप से प्रयागराज के रहने वाले थे। ब्रिटिश शासन में उनकी अंग्रेज अफसरों से गहरी नजदीकी थी, यही वजह रही कि अंग्रेजों ने उन्हें वाराणसी के रामापुरा इलाके की जिम्मेदारी सौंप दी। यहां वो टैक्स कलेक्टर के पद पर तैनात हुए। इसी नौकरी के चलते वो प्रयागराज छोड़कर वाराणसी आ बसे और यहीं 10 बीघे जमीन पर अपनी शानदार हवेली खड़ी करवाई।

लिफ्ट की जिद ने बदल दी पूरी कहानी

उस दौर में अंग्रेज सरकार ने इंग्लैंड से खास ऑर्डर देकर तीन लिफ्ट भारत मंगाई थीं। बाबू देवकीनंदन की इच्छा थी कि इन तीन लिफ्ट में से एक उनकी अपनी हवेली में लगे। इसके लिए उन्होंने पूरा जोर लगा दिया, लेकिन किसी वजह से उन्हें वो लिफ्ट नसीब नहीं हुई। यह बात उन्हें इतनी नागवार गुजरी कि उन्होंने अपनी बनाई हुई इस आलीशान हवेली को हमेशा के लिए छोड़ दिया। इसके बाद वो कभी वापस बनारस नहीं लौटे और न ही कभी दोबारा इस हवेली में कदम रखा।

150 साल पुरानी यह हवेली आज भी है धरोहर

देवकीनंदन हवेली को बने करीब 150 साल हो चुके हैं। पत्थरों से बनी यह विशाल इमारत आज भी बनारस की धरोहर के तौर पर खड़ी है, हालांकि इसका कुछ हिस्सा अब जर्जर हो चुका है। पांच मंजिला इस हवेली में कुल 48 कमरे हैं और हर कमरा हवादार बनाया गया है। हवेली में भारतीय स्थापत्य कला की झलक साफ दिखती है। यहां कई बरामदे हैं और एक विशाल आंगन भी मौजूद है। बनारस शहर में इतनी बड़ी और आलीशान हवेलियां अब बहुत कम बची हैं।

इसका आप पर असर

  • भारत में: ऐसी ऐतिहासिक हवेलियों की कहानियां देश भर के हेरिटेज और इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले पर्यटकों को वाराणसी जैसी जगहों की तरफ खींच सकती हैं।
  • वाराणसी में: स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग के लिए यह याद दिलाता है कि जर्जर होती देवकीनंदन हवेली जैसी धरोहरों के संरक्षण पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि शहर की यह अनोखी विरासत बची रहे।

सवाल-जवाब

बाबू देवकीनंदन कौन थे?
वो मूल रूप से प्रयागराज के रहने वाले थे और ब्रिटिश शासन में वाराणसी के रामापुरा इलाके में टैक्स कलेक्टर के पद पर तैनात थे।
बाबू देवकीनंदन ने हवेली क्यों छोड़ दी?
इंग्लैंड से मंगाई गई तीन लिफ्ट में से एक अपनी हवेली में न लगवा पाने की वजह से वो इतने दुखी हुए कि उन्होंने हवेली हमेशा के लिए छोड़ दी।
देवकीनंदन हवेली कब बनी थी?
इस हवेली का निर्माण करीब 150 साल पहले हुआ था।
हवेली में कुल कितने कमरे हैं?
इस हवेली में कुल 48 कमरे हैं और हर कमरा हवादार बनाया गया है।
हवेली कितने बीघे जमीन पर बनी है?
यह हवेली 10 बीघे जमीन पर बनाई गई थी।
क्या यह हवेली आज भी मौजूद है?
हां, यह आज भी धरोहर के तौर पर मौजूद है, हालांकि इसका कुछ हिस्सा जर्जर हो चुका है।
हवेली कितनी मंजिल की है?
यह पांच मंजिला हवेली है, जिसमें कई बरामदे और एक विशाल आंगन है।
मीरा जोशी
लेखक के बारे मेंमीरा जोशीरिश्ते एवं वेलनेस संवाददाता जम्मू-कश्मीर
विशेषज्ञतारिश्ते, मानसिक स्वास्थ्य, वेलनेस, लाइफस्टाइल, डेटिंग, विवाह, भावनात्मक कल्याण, आत्म-विकास, माइंडफुलनेस, वर्क-लाइफ बैलेंस

मीरा जोशी एक रिश्ते एवं वेलनेस संवाददाता हैं जो आधुनिक रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य, लाइफस्टाइल और व्यक्तित्व विकास को कवर करती हैं। वे भावनात्मक स्वास्थ्य और मानवीय जुड़ाव पर सूझबूझ भरी कहानियाँ लिखती हैं।

मीरा जोशी एक रिश्ते एवं वेलनेस संवाददाता हैं जो रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक कल्याण और व्यक्तित्व विकास पर केंद्रित लाइफस्टाइल पत्रकारिता में विशेषज्ञता रखती हैं। वे आधुनिक डेटिंग, विवाह, संवाद, आत्म-विकास, माइंडफुलनेस और वर्क-लाइफ बैलेंस जैसे विषय कवर करती हैं। संवेदनशील और शोध-आधारित नज़रिये के साथ मीरा मानवीय रिश्तों के मनोवैज्ञानिक व सामाजिक पहलुओं की पड़ताल करती हैं और पाठकों को व्यावहारिक अंतर्दृष्टि व सहज दृष्टिकोण देती हैं। उनकी रिपोर्टिंग का मक़सद पाठकों को भावनात्मक चुनौतियों से निपटने, स्वस्थ रिश्ते बनाने और आज की तेज़ रफ़्तार दुनिया में समग्र कल्याण बेहतर करने में मदद करना है।

पूरा प्रोफ़ाइल देखें ↗
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