हैदराबाद में ऐतिहासिक चारमीनार से थोड़ी ही दूरी पर मौजूद जामा मस्जिद शुजाया केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह इस ऐतिहासिक शहर के जन्म और इसकी समृद्ध विरासत की एक महत्वपूर्ण साक्षी है। सन् 1597 में हैदराबाद की आधारशिला रखने वाले सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह के दौर में इस मस्जिद का निर्माण कराया गया था। चारमीनार के बनने के तुरंत बाद आम जनता के इबादत करने के लिए तैयार की गई यह शहर की सबसे पहली जामा मस्जिद मानी जाती है। कुतुब शाही वास्तुकला की यह बेजोड़ मिसाल आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है, जिसके चलते इतिहासकारों और स्थानीय निवासियों ने इसके तुरंत संरक्षण और जीर्णोद्धार की मांग उठाई है।
वास्तुकला का अनूठा चमत्कार और अंक 7 का अद्भुत गणित
कुतुब शाही काल की स्थापत्य कला का यह अनूठा शाहकार अपने खास निर्माण तंत्र और गणितीय तालमेल के लिए जाना जाता है। इस इमारत की पूरी वास्तुकला में अंक 7 की एक बेहद अनोखी और रहस्यमयी भूमिका देखने को मिलती है। मस्जिद के मुख्य ढांचे में सात कमानें और सात मेहराबें तैयार की गई हैं, जबकि नमाज अदा करने वालों के बैठने के लिए भी सात सफें बनाई गई हैं।
इमारत का ध्वनि ईको-सिस्टम और वेंटिलेशन इतना आधुनिक है कि बिना किसी लाउडस्पीकर या माइक्रॉफोन के पहली पंक्ति में खड़े इमाम की आवाज उतनी ही स्पष्टता के साथ आखिरी पंक्ति के कोने में मौजूद व्यक्ति तक पहुंचती है। इसके अतिरिक्त, मस्जिद परिसर में काले पत्थर से तराशा गया 400 साल पुराना एक अति दुर्लभ तख्त भी रखा हुआ है, जो उस दौर की नक्काशी का बेहतरीन नमूना है। उमर पाशा के अनुसार, इस मस्जिद का पूरा इतिहास बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है।
औरंगजेब का प्रवास और अस्तबल से मदरसे तक का सफर
इस ऐतिहासिक परिसर ने समय के कई बड़े बदलाव देखे हैं। सन् 1687 में जब मुगल सम्राट औरंगजेब ने गोलकुंडा पर अपना आधिपत्य जमाया, तब उन्होंने इसी मस्जिद परिसर में अपना डेरा डाला था। औरंगजेब ने हैदराबाद शहर का सबसे पहला आधिकारिक फरमान भी इसी स्थान से जारी किया था। हालांकि, 18वीं सदी की शुरुआत के साथ देखरेख के अभाव में यह भव्य मस्जिद उपेक्षा का शिकार हो गई। एक समय ऐसा भी आया जब इस ऐतिहासिक ढांचे का उपयोग हाथियों को बांधने के अस्तबल के रूप में किया जाने लगा था।
इस खस्ताहाल स्थिति को बदलने की शुरुआत लगभग 250 साल पहले हुई। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से हैदराबाद आए सूफी संत हजरत सैयदना मीर शुजाउद्दीन कादरी ने इस परिसर की बदहाली को देखा और इसकी सफाई करवाई। उन्होंने यहां दोबारा नमाज शुरू कराई और इसी परिसर में हैदराबाद का पहला औपचारिक दीनी मदरसा स्थापित किया। सूफी संत के इस योगदान के कारण ही इस मस्जिद का नाम जामा मस्जिद शुजाया पड़ा।
प्रदूषण और वक्त की मार से जर्जर दीवारें, संरक्षण की मांग
सैकड़ों वर्षों से धुएं, बढ़ते वायु प्रदूषण और मौसम की मार झेलने के कारण आज इस 425 साल पुरानी इमारत की मीनारें और बाहरी दीवारें बेहद जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी हैं। कई जगहों से प्लास्टर गिर रहा है और पत्थरों को नुकसान पहुंचा है। स्थानीय नागरिकों, इतिहासकारों और धरोहर प्रेमियों का स्पष्ट कहना है कि जिस तरह चारमीनार का संरक्षण और सुंदरीकरण किया गया है, उसी तर्ज पर इस अमूल्य ऐतिहासिक संपत्ति का भी तत्काल जीर्णोद्धार कराया जाना चाहिए। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो हैदराबाद की पहली जामा मस्जिद का यह ऐतिहासिक वजूद मिट सकता है।



















