झारखंड के कोडरमा जिले में एक ऐसा पुराना महल है जहां पहली बार जाने वाला कोई भी शख्स आसानी से बाहर निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पाता। सतगांवा प्रखंड के नंदूडीह गांव में बना यह महल राजा महावीर नारायण देव की शाही विरासत का हिस्सा है और आज भी इलाके के गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है। सालों बीतने के साथ इसका कुछ हिस्सा कमजोर पड़ गया है, फिर भी इसकी ऊंची दीवारें और खास बनावट देखने वालों को उस दौर की शाही ठाठबाट की याद दिला देती हैं।
पहाड़ी किले से नंदूडीह के महल तक का सफर
स्थानीय निवासी शंकर देव प्रजापति के मुताबिक, राजपरिवार शुरू में इसी इलाके का नहीं था, बल्कि कहीं और से आकर यहां बस गया था। उनके पूर्वजों ने सबसे पहले महावर पहाड़ की चोटी पर अपना किला बसाया था। इसके बाद राजपरिवार की अगली पीढ़ियों ने नंदूडीह में एक नया और बड़ा महल तैयार करवाया। आज यही महल परिवार की एकमात्र निशानी के तौर पर बचा है और गांव वालों के लिए इतिहास का जीता जागता सबूत है।
52 कमरे, 53 दरवाजे और भटकाने वाली बनावट
शंकर देव प्रजापति बताते हैं कि महल की खासियत इसका अनोखा डिजाइन है। इसमें कुल 52 कोठरियां और 53 दरवाजे बनाए गए हैं, और इनका रास्ता इतना उलझा हुआ है कि कोई अनजान व्यक्ति अंदर घुस जाए तो आसानी से बाहर निकलने की राह नहीं खोज पाता। उस दौर में सुरक्षा के लिहाज से इस तरह की भूलभुलैया जैसी बनावट को बेहद कारगर माना जाता था, ताकि दुश्मन या घुसपैठिए महल में फंसकर रह जाएं।
चूना पत्थर और सागवान से बनी मजबूत इमारत
महल की मजबूती भी उतनी ही चौंकाने वाली है। इसकी ज्यादातर दीवारें 25 से 30 इंच तक मोटी हैं, और पूरा ढांचा चूना पत्थर से खड़ा किया गया था। महल की ऊपरी मंजिल सागवान की लकड़ियों से बनाई गई थी, और करीब एक सदी गुजर जाने के बावजूद कई जगहों पर यही लकड़ियां आज भी ऊपरी मंजिल को थामे हुए हैं। हालांकि मौसम की मार और समय के असर से महल के कुछ हिस्से कमजोर होकर गिर भी चुके हैं।
राजा ने शुरू की दुर्गा पूजा की परंपरा
यह महल करीब सन 1920 के आसपास बनकर तैयार हुआ था। महल के बड़े आंगन में वह पिंडा आज भी मौजूद है, जहां राजा महावीर नारायण देव नियमित रूप से पूजा किया करते थे, और यह जगह अब भी लोगों के लिए श्रद्धा और इतिहास दोनों का केंद्र बनी हुई है। गांव में दुर्गा पूजा मनाने की शुरुआत भी खुद राजा महावीर नारायण देव ने ही करवाई थी, और तब से हर साल बिना रुके नंदूडीह में यह पर्व मनाया जाता रहा है, जो राजपरिवार की सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाने का जरिया बना हुआ है।
अब परपोती के हाथों में है महल की देखभाल
राजा महावीर नारायण देव की एकमात्र पौत्री की शादी गिरिडीह जिले के जमखोखोडो गांव के राजा त्रिलोकी सिंह के साथ हुई थी, और इसी दंपति की बेटी सुनैना कुमारी आज इस ऐतिहासिक संपत्ति की देखभाल का जिम्मा संभाल रही हैं और राजघराने की इस विरासत को बचाए रखने की कोशिश में जुटी हैं।




















