उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी सदियों पुरानी लोक मान्यताएं और पारंपरिक घरेलू नुस्खे स्थानीय जीवनशैली का अहम हिस्सा बने हुए हैं। पीढ़ियों से चले आ रहे इन रीति-रिवाजों में किसी व्यक्ति को लगी नजर उतारने की परंपरा प्रमुख मानी जाती है। बागेश्वर जिले सहित कुमाऊं के अनेक ग्रामीण इलाकों में मान्यता है कि रसोई में आसानी से उपलब्ध होने वाले राई के दानों का प्रयोग करके बुरी नजर के प्रभाव को समाप्त किया जा सकता है। यद्यपि यह प्रथा सांस्कृतिक आस्था से गहराई से जुड़ी हुई है, परंतु आधुनिक दृष्टिकोण से इसका कोई वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है।
राई के दानों से नजर उतारने की चरणबद्ध विधि
बागेश्वर की कुशल गृहिणी सुनीता टम्टा ने इस पारंपरिक विधि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि जब परिवार में किसी सदस्य को नजर लगने की आशंका होती है, तो घर में रखी सरसों या राई के दानों का सहारा लिया जाता है। इस प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए सर्वप्रथम लगभग आधा मुट्ठी राई के दाने हाथ में लिए जाते हैं। इसके पश्चात जिस व्यक्ति पर बुरी नजर का असर माना जा रहा है, उसके सिर के ऊपर से इन दानों को तीन बार वृत्ताकार दिशा में घुमाया जाता है। इस दौरान परिवार के सदस्य पारम्परिक मान्यताओं का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं।
सिर पर दानों को तीन बार घुमाने के बाद, घर के किसी सुरक्षित स्थान पर थोड़ी सी आग जलाई जाती है। फिर उन राई के दानों को जलती हुई आग में अर्पित कर दिया जाता है। इस समूची क्रिया को अर्थात सिर के ऊपर दानों को तीन बार घुमाने और उन्हें आग में डालने की प्रक्रिया को कुल तीन बार दोहराया जाता है। स्थानीय निवासियों का यह सुदृढ़ विश्वास है कि इस विधि से व्यक्ति पर छाया नकारात्मक प्रभाव या बुरी नजर तुरंत निष्प्रभावी हो जाती है और पीड़ित व्यक्ति को मानसिक तथा शारीरिक राहत का अनुभव होता है।
पहाड़ी जीवन संस्कृति में घरेलू उपायों का महत्व
हिमालयी क्षेत्रों में नजर लगने की अवधारणा केवल एक सामान्य विश्वास नहीं है, बल्कि यह वहां की समृद्ध लोक संस्कृति और पारिवारिक व्यवस्था के साथ रचा-बसा हुआ है। क्षेत्र के बुजुर्गों के मतानुसार, पुराने समय में जब स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं या अचानक किसी की तबीयत बिगड़ती थी, तब गांवों में इस प्रकार के घरेलू तरीके बहुत आम हुआ करते थे। नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों या किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जो अचानक असहज, चिड़चिड़ा या अस्वस्थ महसूस करने लगता था, परिवार के वरिष्ठ सदस्य इन पारंपरिक उपायों को तुरंत अपनाते थे।
वर्तमान समय में शिक्षा और आधुनिकता के प्रसार से लोगों के विचारों में परिवर्तन आया है, फिर भी कुमाऊं के ग्रामीण आंचल में अनेक प्राचीन लोक परंपराएं आज भी जीवित हैं। राई के दानों द्वारा नजर उतारने की यह रीति इसी सांस्कृतिक धरोहर का एक उदाहरण है। इस उपाय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली राई हर पहाड़ी घर की रसोई में सहजता से उपलब्ध रहती है। यही कारण है कि स्थानीय ग्रामीणों के लिए इस घरेलू परंपरा को निभाना अत्यंत व्यावहारिक और सुलभ रहता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुरक्षा के बुनियादी नियम
यद्यपि यह परंपरा जनमानस में अत्यधिक लोकप्रिय है, फिर भी इसके व्यावहारिक और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को समझना अनिवार्य है। विशेषज्ञों और चिकित्सकों के अनुसार, राई से नजर उतारने का दावा पूर्णतः लोक आस्था पर आधारित है और इसके किसी भी प्रकार के सकारात्मक प्रभाव की पुष्टि करने वाला कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को निरंतर सिरदर्द, अत्यधिक कमजोरी, बेचैनी अथवा अन्य कोई शारीरिक अस्वस्थता महसूस हो रही हो, तो उसे घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के स्थान पर तत्काल किसी योग्य डॉक्टर से चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।
इसके अतिरिक्त, इस विधि के दौरान आग का प्रयोग करते समय विशेष सावधानी बरतना अत्यंत आवश्यक है। प्रक्रिया के समय छोटे बच्चों और बुजुर्गों को आग से सुरक्षित दूरी पर रखा जाना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की अनहोनी या दुर्घटना से बचाव किया जा सके। परंपराओं का सम्मान करने के साथ-साथ स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति सतर्क रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।



















