बिहार की लोक संस्कृति और पारंपरिक गीतों की चर्चा जब भी होती है, तो ‘बटोहिया’ का जिक्र सबसे पहले आता है। इस प्रसिद्ध गीत को कई लोग ‘सुंदर सुभूमि भैया’ के नाम से भी जानते हैं। सांस्कृतिक हलकों में इसे भोजपुरी का वंदे मातरम तक कहा जाता है। इस ऐतिहासिक दर्जे के पीछे साल 1911 का वह दौर छिपा है, जब बिहार के सारण जिले में रघुबीर नारायण नाम के एक प्रतिष्ठित विद्वान और वकील रहा करते थे। उस समय देश के महान स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें अपनी ही मातृभाषा में कलम चलाने की सलाह दी थी। उन्होंने रघुबीर नारायण से आग्रह किया था कि वह अपनी लोक भाषा में रचनाएं करें और अपनी मिट्टी की आवाज बनें। इस बहुमूल्य सलाह का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने भोजपुरी भाषा में ‘बटोहिया’ गीत की रचना कर डाली, जो देखते ही देखते आम जनमानस के दिलों में रच-बस गया।
गिरमिटिया मजदूरों के दर्द और वतन की यादों का दस्तावेज
भोजपुरी में ‘बटोही’ शब्द का अर्थ एक ऐसा यात्री या राहगीर होता है जो अपने रास्ते पर निकला हो। ‘बटोहिया’ उसी राहगीर को अपनेपन से पुकारने का एक अनूठा तरीका है। लेकिन इस कालजयी गीत की गहराई केवल मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता के बखान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर अपनों से मीलों दूर रहने का भारी दर्द भी छिपा हुआ है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनगिनत गरीब मजदूरों को रोजगार के लालच या मजबूरी में सुदूर देशों के बागानों में काम करने के लिए भेज दिया जाता था। इन विस्थापितों को इतिहास में ‘गिरमिटिया मजदूर’ के रूप में जाना जाता है। ये लोग अपने घर-परिवार, समाज और देश से हजारों मील दूर रहकर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन बिताने के लिए अभिशप्त थे। ‘बटोहिया’ गीत मूल रूप से ऐसे ही किसी अभागे मजदूर की मानसिक व्यथा और उसकी लाचारी को जीवंत करता है।
परदेश से वतन की माटी को निहारने की गुहार
विदेश की धरती पर जीवन काट रहा एक मजदूर जब किसी ऐसे व्यक्ति को देखता है जो भारत की यात्रा पर जा रहा हो, तो वह उससे अपने देश का हालचाल लाने का अनुरोध करता है। उसकी दिली इच्छा होती है कि वह यात्री भारत की पावन भूमि पर जाए और उसकी प्यारी मातृभूमि को अपनी आंखों से देखकर लौटे। गीत की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं: ‘जाऊ-जाऊ भैया रे बटोही, हिंद देखी आउ...’ इन मार्मिक शब्दों का सीधा अर्थ यह है कि हे यात्री भाई, तुम भारत अवश्य जाना और मेरे प्यारे देश का दर्शन करके वापस आना। इन पंक्तियों में उस इंसान का कसैला दर्द झलकता है जो अपनी जन्मभूमि को हर पल शिद्दत से याद करता है, लेकिन चाहकर भी कभी वहां वापस नहीं लौट सकता।
भारत की प्राकृतिक भव्यता और सांस्कृतिक विविधता का संगम
इस गीत में आगे चलकर भारत की भौगोलिक सुंदरता का भी बहुत ही सुंदर चित्रण मिलता है। इसमें देश को एक ऐसी महिमामयी धरती बताया गया है जिस पर हर देशवासी को गर्व महसूस होना चाहिए। ‘सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से...’ जैसी पंक्तियों के माध्यम से भारत की अनुपम सुंदरता को परिलक्षित किया गया है। गीत के अनुसार हिमालय पर्वत इस महान देश के एक सच्चे प्रहरी की तरह रक्षा करता है, जबकि भारत के तीनों तरफ फैला अथाह समुद्र इसकी प्राकृतिक विशिष्टता में चार चांद लगा देता है। लेकिन इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता केवल नदियों, पहाड़ों और समुद्रों का जिक्र करना भर नहीं है, बल्कि इसमें भारत की सनातन संस्कृति और महान परंपराओं के सजीव दर्शन भी होते हैं।
वेदों के ज्ञान से लेकर महान संतों की शिक्षाओं का समावेश
इस अद्भुत गीत में चारों वेदों के अगाध ज्ञान के साथ-साथ भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान श्रीकृष्ण की पावन कथाओं का भी सुंदर उल्लेख किया गया है। इसके अलावा इसमें भगवान बुद्ध, जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर और संत कबीर जैसे महान विचारकों और समाज सुधारकों की जीवन शिक्षाओं की झलक भी स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। इसका सीधा मतलब यह है कि रघुबीर नारायण ने इस गीत के माध्यम से केवल भारत के भौगोलिक सौंदर्य को ही नहीं उकेरा, बल्कि उसकी पूरी सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक धरोहर को भी एक सूत्र में पिरोकर दुनिया के सामने रख दिया।
गुलामी के दौर में लोगों में जगाई देशभक्ति की अलख
धीरे-धीरे यह गीत बिहार के छोटे-छोटे गांवों से निकलकर आम जनता की जुबान पर चढ़ गया। लोगों को इसमें अपने वतन के प्रति अगाध प्रेम और गर्व की भावना साफ नजर आने लगी। यही मुख्य कारण था कि इसे ‘भोजपुरी का वंदे मातरम’ की उपाधि दी जाने लगी। उस दौर में जब पूरा भारत ब्रिटिश हुकूमत की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब इस गीत ने देशवासियों को उनकी अपनी भाषा, संस्कृति और मातृभूमि की असली अहमियत याद दिलाने का ऐतिहासिक काम किया। हालांकि वक्त बीतने के साथ यह गीत पहले की तरह आम बोलचाल या सार्वजनिक मंचों पर उतना नहीं सुनाई देता, लेकिन आज भी इसका सांस्कृतिक महत्व और प्रासंगिकता पूरी तरह से कायम है।
सात देशों के गायकों ने मिलकर दी थी इस गीत को नई आवाज
इस गीत की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यह है कि यह केवल भारत की सीमाओं तक बंधा नहीं रहा। दुनिया के अलग-अलग देशों में बसने वाले भारतीय मूल के प्रवासियों ने इसे अपनी स्मृतियों और अपनी मूल जड़ों से मजबूती से जोड़कर रखा। एक समय ऐसा भी आया जब भारत, सूरीनाम, हॉलैंड, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना और फिजी सहित कुल सात अलग-अलग देशों के 11 प्रतिष्ठित गायकों ने एक मंच पर आकर इस गीत को संयुक्त रूप से गाया। इन कलाकारों में उन गिरमिटिया मजदूरों के वंशज भी शामिल थे जिनके पूर्वज कभी रोजी-रोटी की तलाश में अपना देश छोड़कर समुद्र पार चले गए थे। भले ही उनकी कई पीढ़ियां विदेश में ही पैदा हुईं और वहीं बस गईं, लेकिन भारत के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता कभी कमजोर नहीं पड़ा। ‘बटोहिया’ जैसे पारंपरिक गीत हमेशा उन्हें उनके पुरखों की माटी, उनकी अपनी भाषा और उनकी प्राचीन संस्कृति की याद दिलाते रहे हैं।




















