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बिना शोर के कैसे बनाई जाती है बड़ी सफलता, राहुल द्रविड से सीखें जीवन के 8 बड़े सबकट्रेंड्स
13 अक्तू॰ 2026, 12:57 pm (45 मिनट पहले)· 0

बिना शोर के कैसे बनाई जाती है बड़ी सफलता, राहुल द्रविड से सीखें जीवन के 8 बड़े सबक

क्रिकेट की दुनिया में बिना किसी हंगामे के अपनी अलग पहचान बनाने वाले राहुल द्रविड के जीवन से अनुशासन, धैर्य और लगातार मेहनत के कई महत्वपूर्ण सबक सीखे जा सकते हैं।

क्रिकेट के मैदान पर हमेशा से ही चौकों-छक्कों की बरसात करने वाले और हवा में शॉट लगाने वाले खिलाड़ियों को ही तालियां और सुर्खियां मिलती रही हैं। इसके बावजूद, खेल में मैदान पर डटे रहकर टीम की नैया पार लगाने वाले खिलाड़ियों का योगदान भी किसी से कम नहीं होता है। भारतीय क्रिकेट इतिहास में इस बात के सबसे बड़े उदाहरण राहुल द्रविड माने जाते हैं, जिन्हें दुनिया प्यार से ‘द वॉल’ यानी दीवार कहकर बुलाती थी। मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी क्रीज पर पैर जमाकर खड़े रहना और पूरी टीम को संकट से बाहर निकालना उनकी पहचान बन चुका था।

साल 2001 के ऐतिहासिक कोलकाता टेस्ट मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेली गई उनकी 180 रनों की यादगार पारी हो, या फिर साल 2003 में एडिलेड के मैदान पर 233 रनों की शानदार पारी खेलकर भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाना, उनके पूरे खेल सफर में अटूट धैर्य और कड़ी मेहनत की कई मिसालें देखने को मिलती हैं। एक शानदार खिलाड़ी से लेकर सफल कोच बनने तक का उनका यह पूरा सफर यह भली-भांति सिखाता है कि जीवन में असली सफलता केवल खुद को आगे बढ़ाने में ही नहीं है, बल्कि अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे बढ़ने का अवसर देने में है।

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1. लगातार मेहनत से ही मिलती है मंजिल

राहुल द्रविड ने जून 1996 में इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर अपना टेस्ट डेब्यू किया था। अपनी पहली ही पारी में उन्होंने बेहतरीन बल्लेबाजी करते हुए 95 रन बनाए थे, लेकिन वह अपने पहले ही मैच में शतक पूरा करने से चूक गए थे। इसके बाद उन्हें अपने करियर के पहले टेस्ट शतक तक पहुंचने के लिए जनवरी 1997 तक का इंतजार करना पड़ा था। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहानिसबर्ग के मैदान पर उन्होंने 148 रनों की शानदार पारी खेलकर अपनी असली क्षमता का परिचय दिया था। उनका यह पूरा सफर हमें यह सिखाता है कि जीवन या करियर की शुरुआत में ही बहुत बड़ी सफलता मिल जाना बिल्कुल जरूरी नहीं है। कई बार अपनी एक खास जगह बनाने के लिए लंबे समय तक चुपचाप संघर्ष और मेहनत करनी पड़ती है। यदि आप भी अपने किसी भी काम में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो तुरंत मिलने वाले नतीजों के पीछे भागने के बजाय अपनी तैयारी को मजबूत करने और काम की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दें।

2. कठिन समय में भी धैर्य बनाए रखना सीखें

साल 2001 में कोलकाता टेस्ट मैच के दौरान भारतीय टीम बहुत मुश्किल स्थिति में थी और उसे फॉलोऑन खेलना पड़ रहा था। ऐसे बेहद विपरीत हालात में राहुल द्रविड और वीवीएस लक्ष्मण ने पांचवें विकेट के लिए मिलकर 376 रनों की एक ऐतिहासिक साझेदारी कर डाली। द्रविड ने इस दौरान 180 रनों की बेहतरीन पारी खेली और भारतीय टीम ने शानदार वापसी करते हुए मैच अपने नाम कर लिया, जो क्रिकेट के इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया। इस एक पारी से मिलने वाली सीख केवल खेल के मैदान तक ही सीमित नहीं है। हमारे निजी जीवन में भी जब कभी हालात हमारे पूरी तरह खिलाफ हो जाएं, तो घबराकर कोई भी गलत फैसला लेने के बजाय शांत दिमाग से अपना अगला कदम सोचना चाहिए। हर एक मुश्किल परेशानी का समाधान तुरंत हाथ नहीं लग जाता, लेकिन शांत स्वभाव और धैर्य आपको हमेशा एक सही निर्णय लेने में मदद जरूर करता है।

3. अपनी वास्तविक ताकत पहचानें और नकल से बचें

राहुल द्रविड हमेशा से अपनी मजबूत तकनीक और बेहतरीन डिफेंस के लिए क्रिकेट जगत में मशहूर रहे हैं। उन्हें जो ‘द वॉल’ नाम मिला था, वह इसी वजह से मिला था क्योंकि वह विकेट पर दीवार बनकर खड़े हो जाते थे। उनका खेल कभी भी मैदान पर आते ही ताबड़तोड़ आक्रामक शॉट खेलने के बारे में नहीं हुआ करता था। वह पूरी तरह से अपनी तकनीकी दक्षता, गजब की एकाग्रता और टीम की जरूरत के मुताबिक खुद को ढालने की क्षमता पर ही भरोसा रखते थे। इस बात से हमें यह बड़ी सीख मिलती है कि किसी दूसरे की चमक-दमक या खूबियों को देखकर अपनी मूल पहचान को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इस दुनिया में हर एक इंसान की अपनी खुद की एक ताकत होती है। कोई बातचीत करने में बहुत माहिर होता है, कोई लिखने की कला जानता है, तो कोई कठिन परिस्थितियों को संभालना अच्छे से जानता है। अपनी खुद की खूबियों को पहचानकर उन्हें लगातार बेहतर बनाना ही लंबे समय में सबसे ज्यादा काम आता है।

4. समय आने पर अपनी भूमिका बदलने से न हिचकिचाएं

राहुल द्रविड केवल पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट के ही उम्दा खिलाड़ी नहीं रहे हैं। साल 1999 के वनडे वर्ल्ड कप के दौरान उन्होंने सबसे आगे बढ़कर 461 रन बनाए और टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज बने। इसके बाद के कुछ वर्षों में जब टीम को जरूरत महसूस हुई, तो उन्होंने विकेटकीपिंग की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी बखूबी संभाली। इससे भारतीय टीम को बल्लेबाजी क्रम में एक और अतिरिक्त विकल्प मिल गया। उनके इस पूरे सफर से यह साफ सीख मिलती है कि किसी एक खास काम में माहिर होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने दायरे से बाहर निकलकर कोई नई जिम्मेदारी नहीं संभाल सकते। चाहे कोई दफ्तर हो या आपका खुद का कारोबार, वक्त और जरूरत पड़ने पर नई स्किल सीखना और टीम की भलाई के लिए आगे आना आपके करियर को एक बिल्कुल नई दिशा दे सकता है.

5. बड़े लक्ष्य के लिए लंबे समय तक फोकस रखें

दिसंबर 2003 में एडिलेड टेस्ट मुकाबले की पहली पारी में राहुल द्रविड ने ऑस्ट्रेलिया के गेंदबाजों का सामना करते हुए 233 रनों की विशाल पारी खेली थी। इसके बाद उन्होंने दूसरी पारी में भी नाबाद 72 रनों का योगदान दिया और भारत को मैच में चार विकेट से रोमांचक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इस बड़ी जीत के साथ ही भारतीय टीम ने पूरे 23 साल के लंबे अंतराल के बाद ऑस्ट्रेलिया की धरती पर कोई टेस्ट मैच अपने नाम किया था। उनका यह शानदार प्रदर्शन इस बात को साफ तौर पर साबित करता है कि किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल शुरुआत का अच्छा होना ही काफी नहीं होता है। रास्ते में चाहे कितनी भी रुकावटें और मुश्किलें आएं, आपको अपना पूरा ध्यान हमेशा अपने लक्ष्य पर ही टिकाए रखना पड़ता है। यदि आप अपनी पढ़ाई, नौकरी या फिर किसी भी नए कारोबार में सफलता पाना चाहते हैं, तो नियमित रूप से प्रयास करने और अपनी एकाग्रता को अपनी सबसे बड़ी आदत बना लीजिए।

6. अपनी सफलता से दूसरों के लिए मार्ग तैयार करें

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मैदान से संन्यास लेने के बाद भी राहुल द्रविड ने खेल जगत से कभी दूरी नहीं बनाई। उन्होंने देश के युवा खिलाड़ियों के साथ मिलकर काफी काम किया, इंडिया ए और अंडर-19 टीमों को पूरी निष्ठा के साथ कोचिंग दी और नेशनल क्रिकेट एकेडमी में भी अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साल 2018 में उनकी ही देखरेख और कोचिंग में भारतीय अंडर-19 क्रिकेट टीम ने वर्ल्ड कप अपने नाम किया था। उनका यह पूरा जीवन सफर हमें यह सिखाता है कि आपके पास जो अनुभव है, उसकी असली कीमत तभी बढ़ती है जब आप उस अनुभव का इस्तेमाल करके दूसरों का भी भला करते हैं। यदि आप अपने किसी क्षेत्र में अच्छा अनुभव रखते हैं, तो अपने से छोटे साथियों को सिखाना, किसी की मुश्किल घड़ी में मदद करना और सही मार्गदर्शन देना भी आपकी सफलता का एक अहम हिस्सा होता है।

7. तारीफ और आलोचना के बीच संतुलन बनाकर चलें

राहुल द्रविड हमेशा से अपने शांत और गंभीर स्वभाव के साथ-साथ खेल के प्रति अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाते रहे हैं। अपने लंबे खेल करियर के दौरान उन्होंने एक तरफ जहां बेशुमार तारीफें बटोरीं, वहीं उन्हें कई मौकों पर आलोचनाओं का भी डटकर सामना करना पड़ा। एक पुराने साक्षात्कार में उन्होंने इस बात का जिक्र किया था कि उनके साथी खिलाड़ियों का सम्मान मिलना उनके लिए सबसे ज्यादा मायने रखता था। उन्होंने यह भी माना कि जीवन में तारीफों के साथ-साथ आलोचनाएं भी हर सफर का एक स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। इससे हमें यह सीख मिलती है कि दूसरों की राय को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देना भी ठीक नहीं है और हर एक आलोचना को दिल से लगाकर टूट जाना भी सही नहीं होता है। जो बात आपको एक बेहतर इंसान बना सके, उसे चुपचाप अपना लीजिए और बाकी बातों को अपने आत्मविश्वास पर कभी हावी मत होने दीजिए।

8. सफलता मिलने के बाद भी सीखना बंद न करें

राहुल द्रविड ने नवंबर 2021 में भारतीय सीनियर पुरुष क्रिकेट टीम के मुख्य कोच की जिम्मेदारी संभाली थी। मैदान पर तमाम बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी उन्होंने कभी यह नहीं माना कि अब उन्हें कुछ नया सीखने की जरूरत नहीं है। हमेशा एक छात्र की तरह नए तौर-तरीकों को अपनाना और टीम को आगे ले जाना उनकी आदत में शुमार रहा। यह इस बात का प्रमाण है कि इंसान चाहे कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न पहुंच जाए, अगर वह सीखना बंद कर देता है तो उसकी तरक्की रुक जाती है। जीवन में लगातार आगे बढ़ते रहने के लिए हर दिन कुछ नया सीखने की ललक बनाए रखना सबसे जरूरी शर्त है।

सवाल-जवाब

राहुल द्रविड को क्रिकेट की दुनिया में क्या उपनाम दिया गया था?
राहुल द्रविड को उनकी मजबूत रक्षात्मक बल्लेबाजी और मुश्किल समय में क्रीज पर टिके रहने की क्षमता के कारण ‘द वॉल’ कहा जाता था।
राहुल द्रविड ने अपना टेस्ट डेब्यू किस टीम के खिलाफ और कब किया था?
राहुल द्रविड ने जून 1996 में इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स के मैदान पर अपना टेस्ट डेब्यू किया था।
साल 2001 के कोलकाता टेस्ट में राहुल द्रविड ने किसके साथ रिकॉर्ड साझेदारी की थी?
साल 2001 के कोलकाता टेस्ट में राहुल द्रविड ने वीवीएस लक्ष्मण के साथ मिलकर पांचवें विकेट के लिए 376 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी की थी।
राहुल द्रविड ने भारतीय सीनियर पुरुष क्रिकेट टीम के हेड कोच का पद कब संभाला था?
राहुल द्रविड ने नवंबर 2021 में भारतीय सीनियर पुरुष क्रिकेट टीम के मुख्य कोच की जिम्मेदारी संभाली थी।
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टिप्पणियाँ 2

Priya Sharma@priya-sharma·10 मिनट पहले

साल 2001 का वो कोलकाता टेस्ट और 180 रनों की पारी आज भी याद करके सुकून देती है। असली क्लास वही है जो मुश्किल वक्त में काम आए।

Nyra Kaif@nyra-kaif·9 मिनट पहले

प्रिया, तुम्हारी बात सही है पर सिर्फ मैदान पर डटे रहने से हर बार बात नहीं बनती, कभी-कभी खुलकर खेलना भी जरूरी होता है।

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