उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में बिखरी ऐतिहासिक धरोहरें इस क्षेत्र के प्राचीन और समृद्ध अतीत की गवाही देती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के आधिकारिक अभिलेखों में जिले के तीन प्रमुख पुरातात्विक स्थलों को विशेष स्थान दिया गया है। इनमें गोमती नदी के किनारे बसा इटिहवा टीला, ऐतिहासिक इसौली किला और डीह मझगंवा शामिल हैं। ये प्राचीन स्थल न केवल मध्यकालीन स्थापत्य कला की झलक पेश करते हैं, बल्कि अवध क्षेत्र में विभिन्न राजवंशों के उत्थान और सामाजिक संरचना में आए बदलावों को भी रेखांकित करते हैं।
गोमती किनारे ढहा किला और छिपे खजाने की जनश्रुतियां
इटिहवा टीला सुल्तानपुर की पुरातात्विक संरचनाओं में प्रमुख स्थान रखता है। गोमती नदी के तट पर स्थित यह विशाल टीला जनश्रुतियों के अनुसार प्राचीन भर राजवंश के सुदृढ़ दुर्ग का अवशेष है। स्थानीय लोककथाओं में यह मान्यता लंबे समय से प्रचलित रही है कि इस ढहे हुए किले के नीचे भारी मात्रा में प्राचीन खजाना दबा हो सकता है। हालांकि, लंबे समय तक संरक्षण और उचित देखरेख के अभाव के कारण यह किला समय के साथ पूरी तरह ढह गया। आज यह टीला केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गया है, लेकिन इसकी पुरातात्विक महत्ता बनी हुई है।
भर राजवंश का पतन और 'भाले सुलतान' राजपूतों का उदय
कन्नौज के पतन के पश्चात अवध के एक बड़े भूभाग पर भर राजाओं ने अपना शासन स्थापित कर लिया था। कालखंड के साथ पश्चिम दिशा से राजपूतों का आगमन हुआ, जिससे भरों की सत्ता धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। शुरुआत में पश्चिमी राजपूतों ने भर शासकों के यहां नौकरियां कीं और बाद में परिस्थितियों का लाभ उठाकर सत्ता पर अपना अधिकार जमा लिया। इसके अलावा दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने भी भरों पर सैन्य आक्रमण किए। अलाउद्दीन खिलजी ने इसौली के भर राजा को परास्त करने के लिए बैस राजपूतों को सुल्तानपुर भेजा था। बैस राजपूतों ने इस अभियान को सफलता से पूरा किया, जिसके एवज में अलाउद्दीन खिलजी ने उन्हें 'भाले सुलतान' की उपाधि प्रदान की। इसी उपाधि के नाम से सुल्तानपुर के पश्चिमी भाग में भाले सुलतान राजपूत समुदाय आज भी निवास करता है। इसौली के इस किले के स्थान पर वर्तमान में एक मस्जिद बनी है, जिसका पुरातात्विक सर्वेक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जा चुका है।
ग्रामीण टीलों में आज भी सुरक्षित हैं भर सभ्यता के पदचिह्न
सुल्तानपुर जिले के गांवों में भर काल के सांस्कृतिक अवशेष आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। जिले के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह के अनुसार, सुल्तानपुर के ग्रामीण इलाकों में स्थित बड़े मिट्टी के टीलों और डीह क्षेत्रों पर प्राचीन ईंटें बिखरी मिलती हैं। गांव के बुजुर्ग इन पुरातात्विक स्थलों को ऐतिहासिक भरों की गढ़ी और कोट कहकर संबोधित करते हैं। यह भौतिक साक्ष्य दर्शाते हैं कि मध्यकाल में इस पूरे क्षेत्र में भरों की एक सुदृढ़ सभ्यता मौजूद थी, जिसके प्रमाण इटिहवा टीला, इसौली किला और डीह मझगंवा जैसे स्थलों के रूप में ASI के रिकॉर्ड में दर्ज हैं।



















