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चित्तौड़गढ़ के अकोला गांव की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग: प्राकृतिक रंगों वाली यह कला कैसे बनी रैंप से लेकर विदेशी बाज़ारों तक की पसंदकल्चर
15 जून 2026, 7:31 pm (45 दिन पहले)· 0

चित्तौड़गढ़ के अकोला गांव की हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग: प्राकृतिक रंगों वाली यह कला कैसे बनी रैंप से लेकर विदेशी बाज़ारों तक की पसंद

चित्तौड़गढ़ के अकोला गांव में लकड़ी के ब्लॉक और प्राकृतिक रंगों से तैयार होने वाली पारंपरिक हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग अब बड़े फैशन डिजाइनरों और विदेशी ग्राहकों तक पहुंच चुकी है। मेवाड़ की यह सदियों पुरानी कला आज सैकड़ों परिवारों की आजीविका और राजस्थान की पहचान दोनों है।

राजस्थान की मिट्टी हमेशा से रंगों, कारीगरी और परंपरा की कहानियां कहती आई है। इन्हीं कहानियों में एक नाम चित्तौड़गढ़ जिले के अकोला गांव का है, जहां हाथों से छपने वाला अकोला प्रिंट तैयार होता है। कभी सिर्फ आसपास के बाज़ारों तक सीमित रही यह कला अब देश की सीमाएं लांघकर विदेशी ग्राहकों और नामी फैशन डिजाइनरों की पसंद बन चुकी है।

क्या है अकोला प्रिंट और क्यों है खास

अकोला प्रिंट दरअसल सूती कपड़ों पर की जाने वाली पारंपरिक हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यही है कि इसमें रासायनिक नहीं, बल्कि प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है। कारीगर लकड़ी के विशेष रूप से बने ब्लॉकों को रंग में डुबोकर कपड़े पर तरह-तरह की आकृतियां और डिज़ाइन उकेरते हैं। हाथ की इसी मेहनत और प्राकृतिक रंगों की वजह से हर कपड़ा एक-दूसरे से थोड़ा अलग और अपने आप में अनूठा बनकर निकलता है।

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पीढ़ियों से जुड़ी विरासत

अकोला के एक व्यापारी बताते हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से इसी काम से जुड़ा हुआ है। गांव के ज़्यादातर परिवार आज भी इसी हुनर के सहारे अपना घर चला रहे हैं। उनके लिए यह महज़ रोज़गार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे वे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक एक समय था जब यह कला सिर्फ स्थानीय बाज़ारों तक ही पहुंच पाती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसकी पहचान और मांग दोनों बढ़ती चली गईं।

देश से लेकर विदेश तक पहुंची मांग

आज हालत यह है कि देश के बड़े शहरों के साथ-साथ विदेशों से भी अकोला प्रिंट के कपड़ों की मांग आ रही है। फैशन की दुनिया में इस प्रिंट को खास जगह मिल रही है। कई नामी फैशन डिजाइनर अपने कलेक्शन में इसे शामिल कर रहे हैं और रैंप वॉक तक पर इसका इस्तेमाल हो रहा है, जिससे इसकी साख और मज़बूत हुई है।

प्राकृतिक और हस्तनिर्मित होने का फायदा

जानकारों का मानना है कि प्राकृतिक रंगों और हाथ से बने उत्पादों की बढ़ती मांग ने ही अकोला प्रिंट को यह नई पहचान दिलाई है। पर्यावरण को लेकर सजग लोग अब उन्हीं चीज़ों को तरजीह दे रहे हैं जो पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से तैयार होती हैं। मेवाड़ क्षेत्र की यह परंपरागत कला आज राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच तक ले जाने का काम कर रही है।

रोज़गार भी, पहचान भी

अकोला प्रिंट सिर्फ स्थानीय कारीगरों के लिए कमाई का ज़रिया भर नहीं है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध कला और शिल्प परंपरा का प्रतीक भी बन चुका है। यही वजह है कि सदियों पुरानी यह कला आज भी अपनी खूबसूरती और खासियत के दम पर लोगों को अपनी ओर खींच रही है।

सवाल-जवाब

अकोला प्रिंट कहां बनाया जाता है?
यह चित्तौड़गढ़ जिले के अकोला गांव में तैयार किया जाता है, जो राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में आता है।
अकोला प्रिंट को बाकी छपाई से अलग क्या बनाता है?
यह सूती कपड़ों पर लकड़ी के विशेष ब्लॉकों और प्राकृतिक रंगों से की जाने वाली पारंपरिक हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग है, जिससे हर कपड़ा अनूठा बनता है।
अकोला प्रिंट की मांग क्यों बढ़ रही है?
प्राकृतिक रंगों और हस्तनिर्मित उत्पादों की बढ़ती मांग तथा फैशन डिजाइनरों के इसे अपनाने की वजह से इसकी लोकप्रियता बढ़ी है।
क्या इस कला से लोगों को रोज़गार मिलता है?
हां, अकोला गांव के ज़्यादातर परिवार आज भी इसी कला के सहारे अपनी आजीविका चला रहे हैं।
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