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साठ साल से मिट्टी में ढल रही आस्था, राजस्थान के इस गांव के घोड़ों की मांग गुजरात तककल्चर
24 जून 2026, 4:35 pm (46 दिन पहले)· 2

साठ साल से मिट्टी में ढल रही आस्था, राजस्थान के इस गांव के घोड़ों की मांग गुजरात तक

जालौर जिले के हरजी गांव में कुम्हार परिवार करीब 60 साल से हाथों से 'मामाजी के घोड़े' गढ़ रहे हैं, जिन्हें श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर मंदिरों और थानों में चढ़ाते हैं.

राजस्थान के जालौर जिले का हरजी गांव सिर्फ नक्शे पर एक नाम नहीं है, यह मिट्टी और आस्था से गढ़ी एक जीती-जागती विरासत है. आहोर तहसील का यह गांव करीब 60 साल से 'मामाजी के घोड़ों' के लिए पहचाना जाता है. यहां बनने वाले मिट्टी के घोड़े महज एक कलाकृति नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास की निशानी हैं. लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर इन्हें मंदिरों और थानों में अर्पित करते हैं.

गांव में आज भी करीब सात कुम्हार परिवार इस परंपरा को थामे हुए हैं. खास बात यह है कि इन घोड़ों को बनाने में कोई आधुनिक मशीन इस्तेमाल नहीं होती. सिर्फ हाथों की मेहनत और बरसों के तजुर्बे से ये आकार लेते हैं. यही वजह है कि इनकी बनावट और रंग-रूप इन्हें बाकी सब से अलग कर देते हैं. एक घोड़ा तैयार होने में कई दिन लग जाते हैं, और इस पूरे काम में धैर्य और बारीकी दोनों चाहिए.

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कैसे आकार लेते हैं मामाजी के घोड़े

शिल्पकार पुखराज प्रजापत के मुताबिक सबसे पहले मिट्टी लाई जाती है और उसे अच्छी तरह गूंथकर तैयार किया जाता है. इसके बाद गांव के बाहर ले जाकर घोड़ों की नाल बनवाई जाती है. फिर घोड़े के अलग-अलग हिस्से अलग-अलग आकार में गढ़े जाते हैं और उन्हें जोड़कर पूरा घोड़ा खड़ा किया जाता है. इसके बाद इसे अच्छी तरह पकाया जाता है और आखिर में रंग-रोगन होता है. तैयार होने पर दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और घोड़े अपने साथ ले जाते हैं. अलग-अलग इलाकों में इन्हें मामाजी, झुंझारजी या मल्लिनाथजी के नाम से पूजा जाता है और उसी हिसाब से इनका नाम भी तय हो जाता है. पुखराज प्रजापत ने बताया कि एक बार अमेरिका से आए पर्यटक भी यहां से ये मिट्टी के घोड़े अपने साथ ले गए थे, जिससे इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिल गई.

जालौर से गुजरात तक फैली मांग

इन घोड़ों की पहुंच सिर्फ जालौर जिले तक सीमित नहीं है. बाड़मेर, बालोतरा, सिरोही और आसपास के कई इलाकों के साथ-साथ गुजरात से भी श्रद्धालु यहां खिंचे चले आते हैं. लोक देवता मामाजी में आस्था रखने वाले लोग मन्नत पूरी होने पर यहीं से घोड़े खरीदकर अर्पित करते हैं. यही कारण है कि हरजी गांव की यह परंपरा बरसों से लगातार चली आ रही है और आज भी उतनी ही मजबूत है.

पीढ़ियों से संभाली हुई विरासत

शिल्पकार रामलाल बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से यही काम करता आया है. उनके बनाए घोड़े जालौर, बाड़मेर, बालोतरा और सिरोही के अलावा गुजरात तक भेजे जाते हैं. लोग मन्नत मांगते हैं और पूरी होने पर यहां आकर घोड़े ले जाते हैं. यही इस गांव की असली पहचान बन चुकी है. यहां के कारीगरों के लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि उनकी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान भी है. आज जब मशीनों ने कई पारंपरिक कलाओं को पीछे छोड़ दिया है, तब भी हरजी गांव के ये कारीगर अपने हाथ के हुनर से इस विरासत को जिंदा रखे हुए हैं.

सवाल-जवाब

हरजी गांव किस लिए मशहूर है?
जालौर जिले की आहोर तहसील का हरजी गांव करीब 60 साल से मिट्टी के 'मामाजी के घोड़े' बनाने के लिए जाना जाता है.
मामाजी के घोड़े क्यों चढ़ाए जाते हैं?
लोक देवता मामाजी में आस्था रखने वाले लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर ये घोड़े खरीदकर मंदिरों और थानों में अर्पित करते हैं.
ये घोड़े कैसे बनाए जाते हैं?
सबसे पहले मिट्टी गूंथी जाती है, गांव के बाहर नाल बनवाई जाती है, फिर घोड़े के हिस्से अलग-अलग बनाकर जोड़े जाते हैं, उन्हें पकाया जाता है और आखिर में रंग-रोगन किया जाता है.
अभी कितने परिवार यह काम कर रहे हैं?
गांव में आज भी करीब सात कुम्हार परिवार बिना किसी आधुनिक मशीन के यह परंपरा संभाले हुए हैं.
इन घोड़ों की मांग कहां-कहां है?
बाड़मेर, बालोतरा, सिरोही और आसपास के इलाकों के साथ-साथ गुजरात तक से श्रद्धालु यहां घोड़े लेने आते हैं.
इन घोड़ों को किन नामों से पूजा जाता है?
अलग-अलग इलाकों में इन्हें मामाजी, झुंझारजी या मल्लिनाथजी के नाम से पूजा जाता है और उसी हिसाब से इनका नाम तय होता है.
एक घोड़ा बनाने में कितना समय लगता है?
एक घोड़ा तैयार होने में कई दिन लग जाते हैं, क्योंकि पूरे काम में धैर्य और बारीकी दोनों की जरूरत होती है.
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