भारतीय संगीत की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं जिनकी आवाज ने पूरे एक दौर की दिशा बदल दी। ऐसा ही एक चमकता नाम है गौहर जान का, जिन्हें भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार और पहली सेलिब्रिटी गायिका माना जाता है। वह सिर्फ अपनी बेमिसाल गायकी के लिए नहीं, बल्कि अपने शाही अंदाज और बेबाक मिजाज के लिए भी मशहूर थीं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि एक बार किसी रियासत के कार्यक्रम में जाने के लिए उन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ सफर के वास्ते स्पेशल ट्रेन की मांग रख दी थी, और हैरानी की बात यह कि यह मांग मान भी ली गई।
एंजेलिना से गौहर जान बनने का सफर
गौहर जान का जन्म 26 जून 1873 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था और जन्म के समय उनका नाम एंजेलिना योवर्ड था। उनके पिता रॉबर्ट विलियम योवर्ड पेशे से इंजीनियर थे, जबकि मां विक्टोरिया हेमिंग्स को संगीत और नृत्य का गहरा शौक था। बचपन में ही जब माता-पिता अलग हो गए, तो उनकी मां ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया और अपना नाम मलका जान रख लिया। इसी दौरान एंजेलिना का नाम भी बदलकर गौहर जान कर दिया गया। इसके बाद मां और बेटी कोलकाता आ बसीं, जहां गौहर ने उस जमाने के बड़े-बड़े उस्तादों से शास्त्रीय संगीत और कथक की बारीकियां सीखीं। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने दरभंगा राज के दरबार से अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी।
तीन मिनट में सिमटी शास्त्रीय गायकी
20वीं सदी की शुरुआत में जब ग्रामोफोन तकनीक भारत पहुंची, तो साल 1902 में गौहर जान ने अपनी आवाज रिकॉर्ड करवाकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। उस दौर में एक रिकॉर्डिंग का समय महज तीन मिनट का होता था, इसलिए उन्होंने लंबे-लंबे शास्त्रीय गानों को इतने कम समय में समेटने की गजब की कला विकसित की। हर रिकॉर्डिंग खत्म होने पर बड़ी शान से उनका यह कहना कि 'माय नेम इज गौहर जान', उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गया। साल 1902 से 1920 के बीच उन्होंने 10 से ज्यादा भाषाओं में 600 से भी अधिक गाने रिकॉर्ड किए, जो उस जमाने के हिसाब से एक बेहद बड़ा कीर्तिमान था।
पोस्टकार्ड पर तस्वीरें, सम्राट के सामने परफॉर्मेंस
गौहर जान की दीवानगी का आलम यह था कि उस दौर में उनकी तस्वीरें पोस्टकार्डों पर छपा करती थीं और एक ही कार्यक्रम के लिए वह भारी-भरकम फीस लेती थीं। साल 1911 में दिल्ली दरबार में उन्हें ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम के सामने परफॉर्म करने का मौका मिला, जो किसी भी कलाकार के लिए बेहद गर्व की बात थी।
आखिरी दिनों में बनीं दरबारी संगीतकार
जिंदगी के आखिरी पड़ाव में गौहर जान मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ के बुलावे पर वहां की दरबारी संगीतकार बनीं। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनकी सेहत बिगड़ती चली गई और आखिरकार 17 जनवरी 1930 को मैसूर में इस महान गायिका ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।













