पारंपरिक उत्सवों, घरेलू बैठकों और इंटरनेट के छोटे वीडियो में अकसर एक लोकगीत गूंजता सुनाई देता है, जिसके बोल सुनते ही लोग मुस्कुराने लगते हैं. मंच पर जब पारंपरिक वाद्यों के साथ गायिका मालिनी अवस्थी अपनी ऊर्जावान शैली में इस अवधी रचना की तान छेड़ती हैं, तो पूरा सभागार तालियों से भर जाता है. हर कोई इसके हल्के-फुल्के अंदाज पर झूम उठता है. लेकिन इस बाहरी आनंद और हास्य रस के भीतर झांकें तो हमारे सामाजिक अतीत का एक बेहद परेशान करने वाला अध्याय सामने आता है. जिस रचना पर श्रोता सहजता से ठहाके लगाते हैं, उसकी मूल प्रेरणा दरअसल एक छोटी उम्र की विवाहिता का असहनीय संताप, उसकी मानसिक बेचैनी और कम उम्र में थोपी गई शादी का दुख है.
सामाजिक यथार्थ का काव्यात्मक दस्तावेज
यह पारंपरिक प्रस्तुति केवल एक सुरम्य कलाकृति नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के देहाती इलाकों में पसरी रही बाल विवाह जैसी प्रथा का प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत करती है. इस कृति का श्रेय किसी समकालीन कलाकार की व्यक्तिगत रचनाधर्मिता को नहीं जाता, बल्कि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही वाचिक परंपरा से विकसित हुई है. उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में स्त्रियां सदियों से अपने अनुभवों को इस लय में ढालती आई हैं.
बीते दौर की सामाजिक बंदिशों के चलते औरतों को अपनी तन्हाई, उलझन या दर्द पर खुलकर बोलने की अनुमति नहीं थी. रूढ़िवादी व्यवस्था की इन बेड़ियों के बीच लोक-साहित्य ने उन्हें अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम सौंपा. स्त्रियों ने चतुराई से व्यंग्य और चुटीली भाषा का आवरण ओढ़कर अपनी सबसे गहरी टीस को गीतों में पिरो दिया. जो शिकायतें सीधे शब्दों में कहना खतरे से खाली नहीं था, उन्हें विनोदपूर्ण पंक्तियों के जरिए समाज की चौखट पर रख दिया गया. इस रचना में भी वही विडंबना साफ झलकती है, जहां एक नवविवाहिता अपने जीवनसाथी के बचपने और नासमझी को उजागर करती है. यह प्रसंग केवल किसी एक दांपत्य की विसंगति तक सीमित नहीं है, बल्कि उस क्रूर दौर पर सीधा प्रहार करता है जब बालिकाओं को गुड़िया खेलने की उम्र में ब्याह दिया जाता था.
चरणबद्ध आयु और असहज दांपत्य का विवरण
रचना के अंतरे एक बालिका के क्रमशः बड़े होने और उसके समानांतर पति की बचकानी हरकतों का खाका खींचते हैं. रचना की शुरुआती पंक्तियों में वधू उल्लेख करती है कि बारह वर्ष की उम्र में उसकी शादी संपन्न हुई थी, मगर उसका हमसफर इतना अबोध बालक था कि गृहस्थी अथवा पत्नी पर ध्यान देने के स्थान पर केवल पतंगबाजी के खेल में मस्त रहता था. खिलौनों और खेलकूद में रमे ऐसे बालक से परिपक्व व्यवहार की उम्मीद व्यर्थ थी.
इसके पश्चात जब वह पंद्रह वर्ष की दहलीज पर पहुंची और उसका विदाई संस्कार यानी गौना पूरा हुआ, तब वह ससुराल में सहचर्य तथा स्नेह के पलों की आस संजोए हुए थी. विडंबना यह रही कि जब उसने निकटता की उम्मीद की, तो उसका पति स्नेहपूर्वक स्पर्श स्वीकार करने के बजाय उसका हाथ झटक कर दूर भाग खड़ा हुआ. सोलह वर्ष का पड़ाव आने पर जब वह युवती के रूप में पूरी तरह ढल चुकी थी, तब भी पति का व्यवहार किसी सहमे हुए बच्चे जैसा ही बना रहा. अंतरंगता अथवा साहचर्य स्थापित करने के स्थान पर वह भयभीत होकर अपनी माता को पुकारने लगता था. इसी अंतर्द्वंद्व और विवशता से घिरी वधू अपनी सखी के सम्मुख प्रश्न रखती है कि बचपन की देहरी पर अटके ऐसे हमसफर के साथ वह अपना भविष्य किस प्रकार संवारे.
विशाल सांस्कृतिक फलक पर पुनर्जीवित होती धरोहर
अवध और पूर्वांचल के दूरदराज गांवों की चौपालों तक सीमित रही इस सांगीतिक धरोहर को मुख्यधारा के श्रोताओं और राष्ट्रीय पटल तक पहुंचाने में गायिका मालिनी अवस्थी की केंद्रीय भूमिका रही है. उन्होंने कोका-कोला स्टूडियो, आईडिया जलसा तथा अपने अनगिनत सार्वजनिक आयोजनों में इस प्रस्तुति को गरिमा के साथ पेश किया. जब वे इस पारंपरिक रचना का गायन करती हैं, तो लोकगीत के भीतर निहित मर्म और व्यंग्यात्मक धार पूरी सजीवता के साथ उभरती है. वे इस बात पर जोर देती हैं कि लोकगीतों को महज सतही आमोद-प्रमोद मान लेना भूल होगी, क्योंकि वे दरअसल हमारे सामूहिक इतिहास, पुरानी व्यवस्थाओं के अंतर्विरोधों और सदियों से दमित नारी मन के सूक्ष्म अहसासों का जीवंत आईना हैं.



















