बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन की लगभग 19 वर्ष बाद कोलकाता में हुई प्रतीकात्मक घर वापसी का विशेष आयोजन शनिवार, 1 अगस्त 2026 को उस समय विवाद का केंद्र बन गया, जब एक सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान उन्होंने प्रतिष्ठित बांग्ला कवि जॉय गोस्वामी को मंच पर अपने साथ आने का निमंत्रण दिया। जैसे ही साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि दर्शकों के बीच से उठकर मंच की ओर बढ़े, वहां मौजूद श्रोताओं के एक बड़े वर्ग ने इसका तीखा विरोध शुरू कर दिया। देखते ही देखते पूरा प्रेक्षागृह नारेबाजी, तीखी हूटिंग और भारी शोरशराबे से गूंज उठा, जिससे कार्यक्रम की कार्यवाही कुछ समय के लिए पूरी तरह ठप हो गई।
मंच पर अचानक बना तनाव और तसलीमा की शांति अपील
मंच पर अचानक उपजे इस अप्रत्याशित विरोध और हंगामे को देखकर तसलीमा नसरीन कुछ समय के लिए पूरी तरह हैरान रह गईं। वह बिना कुछ कहे शांत भाव से मंच पर खड़ी रहीं, जबकि कार्यक्रम के आयोजक लगातार माइक से दर्शकों से शांति बनाए रखने और संयम बरतने का अनुरोध करते रहे। काफी देर तक चले भारी विरोध और अव्यवस्था के बाद तसलीमा नसरीन ने खुद स्थिति को संभालने का फैसला किया। उन्होंने माइक हाथ में लिया और सभागार में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा, "क्या मैं बोल सकती हूं? कृपया शांत हो जाइए और अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाइए।" लेखिका की इस भावुक और सीधे संवाद की अपील के बाद धीरे-धीरे श्रोताओं का गुस्सा शांत हुआ और बाधित हुआ साहित्यिक कार्यक्रम एक बार फिर आगे बढ़ सका।
कौन हैं कवि जॉय गोस्वामी और क्यों जताई गई आपत्ति?
साहित्यिक जगत में जॉय गोस्वामी का नाम बेहद आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। वह आधुनिक बांग्ला साहित्य के सबसे अग्रणी और लोकप्रिय कवियों में शामिल हैं। उनकी रचनाओं में आम इंसान के जीवन के संघर्ष, सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं का बहुत ही गहरा और जीवंत चित्रण मिलता है। कला और साहित्य में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में से एक, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है।
इसके बावजूद, तसलीमा नसरीन के साथ मंच साझा करने पर दर्शकों के एक वर्ग द्वारा इस तरह का कड़ा विरोध जताया जाना एक पुरानी कड़वाहट और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2007 में कोलकाता में तसलीमा नसरीन की चर्चित किताबों और विचारों के विरोध में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन और सरेराह बवाल हुआ था, जिसके बाद सुरक्षा कारणों से उन्हें अचानक शहर छोड़कर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। तसलीमा नसरीन के समर्थकों और प्रशंसकों का मानना रहा है कि उस बेहद कठिन, संकटपूर्ण और संवेदनशील दौर में जॉय गोस्वामी ने लेखिका के पक्ष में खुलकर आवाज नहीं उठाई थी और न ही उनका पर्याप्त समर्थन किया था। इसके अतिरिक्त, पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ जॉय गोस्वामी की राजनीतिक और सामाजिक नजदीकियों को लेकर भी कुछ लोगों में गहरा असंतोष रहा है। इन्हीं संयुक्त कारणों की वजह से शनिवार के कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों का एक हिस्सा उन्हें तसलीमा के साथ एक ही मंच पर देखने के लिए तैयार नहीं था।
अतीत का पछतावा और स्वीकृति के बाद भी जारी विरोध
शनिवार को सभागार में हुआ यह तीखा विरोध कई साहित्यिक विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों के लिए इसलिए भी आश्चर्यजनक रहा, क्योंकि जॉय गोस्वामी पहले ही सार्वजनिक मंचों से तसलीमा नसरीन के कोलकाता निष्कासन पर गहरा अफसोस जता चुके थे। पूर्व में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान जॉय गोस्वामी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि वर्ष 2007 में जब कट्टरपंथियों के उग्र विरोध के कारण तसलीमा नसरीन को कोलकाता छोड़ना पड़ा था, तब वह एक वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते उनकी आवश्यक मदद करने में असमर्थ रहे थे।
कवि जॉय गोस्वामी ने उस समय अपनी इस विफलता के लिए सार्वजनिक रूप से खुद को दोषी भी ठहराया था और अपने मन की अपराधबोध की भावना को व्यक्त किया था। इसके बावजूद, शनिवार को आयोजित विशेष कार्यक्रम में मौजूद दर्शकों का एक वर्ग अतीत की उन घटनाओं को भूलने के लिए तैयार नहीं दिखा। दर्शकों के इसी वर्ग ने जॉय गोस्वामी के मंच पर कदम बढ़ाते ही अपना भारी विरोध दर्ज कराया, जिसके कारण प्रतिष्ठित साहित्यिक मंच पर कुछ समय के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई।
19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता वापसी और राज्य सम्मान
बांग्लादेश की प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन के लिए यह कार्यक्रम बेहद ऐतिहासिक और भावनात्मक अवसर था, क्योंकि वह करीब दो दशकों या कहें कि पूरे 19 साल के लंबे निर्वासन के बाद कोलकाता की धरती पर वापस लौटी थीं। इस पूरे कार्यक्रम को साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में उनकी प्रतीकात्मक घर वापसी के रूप में मनाया जा रहा था। कोलकाता में आयोजित इस मुख्य साहित्यिक कार्यक्रम से पूर्व, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी राज्य सचिवालय स्थित एक प्रमुख सभागार में तसलीमा नसरीन के स्वागत में एक भव्य नागरिक अभिनंदन समारोह आयोजित किया था, जहां उनका नागरिक अभिनंदन किया गया था।
सभागार में छाए हंगामे के शांत होने के बाद अपने भाषण के दौरान तसलीमा नसरीन बेहद भावुक नजर आईं। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि कोलकाता वापस आना उनके लिए अपनी जिंदगी के उस छूटे हुए हिस्से में लौटने जैसा है, जिसे वर्षों पहले विपरीत परिस्थितियों में पीछे छोड़ने के लिए उन्हें विवश किया गया था। अपने संबोधन में दृढ़ता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, "अन्याय लंबा चल सकता है, लेकिन हमेशा नहीं।" उन्होंने अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक मंच से यह उम्मीद भी जताई कि आने वाले समय में दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी लेखक या विचारक को अपने स्वतंत्र विचार व्यक्त करने की सजा के रूप में अपना घर, शहर या देश छोड़ने के लिए कभी मजबूर न होना पड़े।



















